देश के आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों के करीब 60 जिलों में नक्सलवाद अब भी किसी न किसी रूप में अपनी मौजूदगी समय समय पर दर्ज कराता रहता है। नक्सली अपने जंगलों में बाहरियों के प्रवेश के विरोधी हैं। प्राकृतिक संपत्तियों के व्यावसायिक दोहन से उनका बैर है और उनका मानना है कि जंगलों में आने वाले शहरी लोग न सिर्फ उनके जीवन में जहर घोल रहे हैं, बल्कि उनकी बरसों से चली आ रही पंरपराओं को नष्ट कर रहे हैं। ये नक्सली बरसों तक जंगल में लड़ते रहे, फिर ये शहरों में आकर शहरियों से उनके हिसाब से निपटने की कोशिशें करने लगे।
NAXALBARI ON ZEE5 REVIEW: पार्थो मित्रा ने बहुत सलीके से की नक्सलियों की दुनिया की नई रोमांचक पड़ताल
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जी5 पर प्रसारित नई वेब सीरीज ‘नक्सलबाड़ी’ इन्हीं विचारों के संघर्ष से पानी पाती है। सीरीज का एक्शन आपको बड़े पर्दे का अनुभव देने की कोशिश करता है और इसका कथ्य किसी पक्ष या पाले में खड़े होने की कोशिश नहीं करता, यही इस सीरीज का सबसे बड़ा आकर्षण हैं। जी5 की वेब सीरीज ‘नक्सलबाड़ी’ दरअसल इस ओटीटी पर उपलब्ध तरह तरह की सामग्री का एक नया झरोखा है। मनोरंजन की जितनी विविधता जी5 ने अपने प्लेटफॉर्म पर तकरीबन सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराई है, उसे पाने में नेटफ्लिक्स, प्राइम वीडियो और दूसरे ओटीटी प्लेटफॉर्म को अभी बरसों लगने वाले हैं।
जी5 की सामग्री संकलन मेहनत इसकी वेब सीरीज ‘नक्सलबाड़ी’ में भी दिखती है। सीरीज के लेखकों ने सामूहिक प्रयास से एक ऐसा संसार रचा है जिसे आप शहरों या अपने सुरक्षित घरों में बैठकर नहीं समझ सकते। मैंने छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा, बस्तर के अलावा झारखंड और महाराष्ट्र का भी नक्सलप्रभावित इलाका खुद देखा है और तारीफ करनी होगी जी5 की वेब सीरीज ‘नक्सलबाड़ी’ की कि इस सीरीज को हकीकत के करीब रखने में इसके निर्देशक पार्थो मित्रा ने काफी अच्छी कोशिश की है।
‘नक्सलबाड़ी’ का संघर्ष विचारों के साथ साथ अधिकारों का भी संघर्ष है। एसटीएफ एजेंट राघव जोशी के नजरिये से आगे बढ़ती कहानी छत्तीसगढ़ की उस असल घटना से खाद पानी पाती है, जिसमें एक राजनीतिक दल का पूरा का पूरा नेतृत्व ही साफ कर देने की साजिश रची गई थी। नक्सली टीम के बीनू, पहान, प्रकृति औऱ राघव की टीम के बीच की कशमकश इसके लेखकों पुलकित जोशी, प्रखर विहान, अमित बब्बर, प्रदीप अटलुरी और अंब हाडा ने काफी चुस्त रखी है। सीरीज का संपादन इसकी असली जान है और एजाज गुलाब का एक्शन सीरीज को बहुत सही सहारा देता है।
सीरीज का पूरा ताना बाना ऐसा है कि इसके 30-30 मिनट के एपिसोड आप खटाखट देखते चले जाते हैं और पांच घंटे का वक्त यूं ही निकल जाता है। सीरीज का संगीत भी काफी दिलचस्प है। टाइटल ट्रैक और ‘अंत ही आरंभ है’ को ए आर रहमान को भी सुनना चाहिए और ये समझना चाहिए कि वह ‘रावण’ में कहां चूके थे। फिल्म का तकनीकी रूप से समृद्ध होना ही इसकी असली जीत है।