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Bandish Bandits Review: उम्दा कलाकार, मधुर संगीत लेकिन कहानी में मात खा गई प्राइम वीडियो की नई सीरीज
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डिजिटल रिव्यू: बंदिश बैंडिट्स (Bandish Bandits)
कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, अतुल कुलकर्णी, कुणाल रॉय कपूर, शीबा चड्ढा और राजेश तेलंग के साथ ऋत्विक भौमिक और श्रेया चौधरी
निर्देशक: आनंद तिवारी
ओटीटी: प्राइम वीडियो
रेटिंग: **
देश में हिंदी वेब सीरीज का शौक पाल चुके लोगों के लिए प्राइम वीडियो की नई वेब सीरीज ‘बंदिश बैंडिट्स’ भारतीय संगीत का वह विस्तार है, जिसमें आकर पश्चिम का बड़े से बड़ा संगीतकार एक बार डुबकी जरूर लगाना चाहता है। यशराज फिल्म्स के साथ काम कर चुके अमृतपाल सिंह बिंद्रा ने ‘लव पर स्क्वॉयर फुट’ बना चुके आनंद तिवारी के साथ मिलकर डिजिटल पर संगीत सरिता बहाने की कोशिश की है, लेकिन मामला चित्रलोक टाइप ज्यादा हो गया है। शंकर एहसान लॉय और नसीरुद्दीन शाह के डिजिटल डेब्यू के हाइप पर टेक ऑफ करने वाली ये सीरीज देखना खराब मौसम से गुजर रहे किसी हवाई जहाज में यात्रा करने जैसा है।
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बंदिश बेंडिट्स रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘बंदिश बैंडिट्स’ से उन लोगों को बहुत उम्मीदें रहीं जिन्होंने इसके ट्रेलर बार बार रिवाइंड करके देखे। राजपूताना की आलीशान हवेलियां। संगीत के उस्ताद और शागिर्द के बीच का टकराव। नई पीढ़ी का सुरों की बंदिशों से परे जाकर ऐसी बंदिशें बनाना जिनमें बाहर का जो कुछ भी अच्छा हो समाहित हो सके, चटकीले रंग, भड़कीली प्रस्तुतियां, सब कुछ एक धमाल म्यूजिकल के सेटअप के लिए आदर्श स्थितियां बनाता है।
किसी को इसे लेकर फिल्म ‘सरफरोश’ याद आई तो किसी को ‘हम दिल दे चुके सनम’। सीरीज बनाने वालों को भी इन दोनों फिल्मों की यादें जरूर आई होंगी, और इन दोनों से बचकर निकलने के चक्कर में ही सीरीज बार बार आसपास के माहौल से टकराती है। आइडिया पर डेंट पड़ते हैं और सफर जारी रहता है। अगर आपको कुछ अच्छा संगीत सुनने की इच्छा है तो शंकर महादेवन और जावेद अली जैसे गायकों ने अपनी पूरी मेहनत इस सीरीज का संगीत कर्णप्रिय बनाने में झोंकी है और आपको इसका आनंद भी आएगा, लेकिन कोई भी कहानी सिर्फ गानों के बूते नहीं खिंच सकती। और, कहानी ही ‘बंदिश बैंडिट्स’ की सबसे कमजोर कड़ी है।
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बंदिश बेंडिट्स रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
प्राइम वीडियो की नई वेब सीरीज ‘बंदिश बैंडिट्स’ की कहानी राधे और तमन्ना के बीच के आकर्षण और विकर्षण की कहानी है। राधे की विरासत शास्त्रीय संगीत घराने की है और तमन्ना एक पॉप स्टार है। दोनों मिलते हैं कारोबारी रिश्ते बनाने के लिए लेकिन दोनों के एहसास भावनाओं का एक नया पुल बना लेते हैं। कहानी दोनों सिरों के अपनी अपनी जगह डटे रहने की और इस पुल पर इन दोनों किरदारों से जुड़े दूसरे लोगों की चलकदमी से आगे बढ़ती है। इस कहानी की सबसे कमजोर कड़ी है कहानी में तमाम सारे सेटअप होना लेकिन इनका पेबैक करने में इनके लेखकों को कुछ नया न सूझ पाना। सीरीज की पटकथा आगे के लिए सवाल तो खड़े करती है, लेकिन आगे बढ़ते ही कुछ और नए सवाल दर्शकों के सामने ले आती है। बीत चुकी कहानी के छूटे सवाल वहीं छूटे रह जाते हैं।
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बंदिश बेंडिट्स रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हिंदी सिनेमा की मेकिंग की तरह ही देश में हिंदी ओटीटी की सामग्री भी होती जा रही है। मुट्ठी भर लोग नेटफ्लिक्स से लेकर प्राइम वीडियो, वूट, सोनी लिव और दूसरे ओटीटी पर चक्कर लगाते दिखने लगे हैं। नए खेमे बन रहे हैं। नए समीकरण बन रहे हैं और गनीमत है कि जी5 जैसे ओटीटी अब भी इस ठहरते जा रहे पानी में हलचल पैदा करने में सफल हो रहे हैं। ‘बंदिश बैंडिट्स’ में हालांकि नायक नायिका के किरदार करने वाले कलाकरों ऋत्विक भौमिक और श्रेया चौधरी ने अपनी तरफ से पूरी मेहनत की है दर्शकों से एक रिश्ता बना पाने की। लेकिन, उनके किरदार उतने जटिल हैं नहीं जितने सतह पर नजर आते हैं। दर्शक इस सीरीज में नसीरुद्दीन शाह, अतुल कुलकर्णी और राजेश तेलंग जैसे सीनियर कलाकारों में कुछ बम, पटाखे, फुलझड़ियां तलाशते रहते हैं, इनकी अदाकारी में दम भी दिखता है लेकिन, किरदारों के विस्तार में मामला फुस्स हो जाता है।
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बंदिश बेंडिट्स रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
‘बंदिश बैंडिट्स’ को आप तभी देख सकते हैं जब आपको संगीत की सियासत में पहले से दिलचस्पी रही हो। सीरीज का नाम भी ऐसा है कि हिंदी पट्टी के तमाम दर्शक यही नहीं समझ पाएंगे कि आखिर सीरीज है किस बारे में? प्राइम वीडियो की मार्केटिंग टीम वैसे भी इस बात से अब तक अनजान है कि इंटरनेट का डाटा सबसे ज्यादा खर्च कहां हो रहा है। सीरीज भी उन्हीं की तरह रास्ते से भटकी हुई कहानी है। समय खराब करती है और ऐसा कुछ नहीं दे पाती जो याद रखा जा सके।
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