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बाइस्कोप: 33 साल बाद भी कायम फिल्म ‘पुष्पक’ में दिखा बेरोजगारों का ये दर्द, बिना संवाद की सीधी चोट

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Fri, 11 Sep 2020 01:24 AM IST
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pushpak this day that year series by pankaj shukla 10 September 1987 bioscope kamal hassan amla tinu
पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

सिनेमा की शुरुआत की बातें अक्सर अब भी होती ही रहती हैं। मूक फिल्मों की बात होती है तो पता चलता है कि कैसे थिएटर में पर्दे के आगे बनी कुएं जैसी जगह में साजिंदे बैठकर सीन के हिसाब से बाजा बजाया करते और गायक भी वहीं अगल बगल खड़े होकर गाने गा दिया करते। फिर तस्वीरें बोलने लगीं और एक बार जो इन तस्वीरों ने बोलना शुरू किया तो इनके कलाकारों की अदाकारी को तो मानो पंख ही लग गए। कलाकारों के संवाद उसके बाद उनका अंदाज बनने लगे। अब तो ये अंदाज बनाने के लिए भी संवाद बोले जाने लगे हैं लेकिन हैरानी हुई थी उस वक्त के दर्शकों को जब भरे पूरे सिनेमा के दौर में साल 1987 में निर्देशक संगीतम श्रीनिवास राव को एक ऐसी फिल्म बनाने की सूझी जिसमें संवाद ही न हों। और, ये विचार उनके मन में कौंधा उस फिल्म की शूटिंग के दौरान, जिसमें वह सहायक निर्देशक थे। फिल्म में एक कलाकार को भयभीत होने के भाव अपने चेहरे पर दिखाने थे और उसे संवाद कोई नहीं दिया गया था। कलाकार ने ऐसा करके दिखा भी दिया तो राव इससे बहुत प्रभावित हुए। वह रात दिन बस यही सोचने लगे कि क्या सिर्फ चेहरे के भावों पर भरोसा करके नए जमाने में ऐसी फिल्म बन सकती है, जिसमें संवाद ही न हों? संगीतम श्रीनिवास राव को अपने इस सवाल का जवाब एक दिन नहाते हुए अपने बाथरूम में मिला और सिर्फ दो हफ्ते में उन्होंने उस फिल्म ‘पुष्पक विमान’ की स्क्रिप्ट लिख डाली, हिंदी पट्टी में ये फिल्म ‘पुष्पक’ के नाम से रिलीज हुई और यही फिल्म हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।



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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

संवाद नहीं एक, भाषाएं अनेक
‘पुष्पक विमान’ को सेंसर बोर्ड से कन्नड़ भाषा की फिल्म के तौर पर पास कराया गया। हिंदी में इसे नाम मिला ‘पुष्पक’, तमिल में ‘पेसुम पदम’, तेलुगू में ‘पुष्पका विमानमु’ और मलायलम में ‘पुष्पकविमानम’ नाम से रिलीज किया गया। ये सब उस फिल्म के साथ हुआ है जिसमें कोई संवाद ही नहीं है। 10 सितंबर 1987 के अलावा फिल्म ‘पुष्पक’ की एक रिलीज डेट 27 नवंबर 1987 भी मिलती है। ये फिल्म के हिंदी संस्करण की रिलीज डेट इसलिए मालूम होती है क्योंकि फिल्म के हिंदी संस्करण को सेंसर सर्टीफिकेट ही 17 नवंबर 1987 को जारी हुआ है। फिल्म रिलीज के 25 साल पूरे होने का जश्न हालांकि फिल्म इंडस्ट्री में 10 सितंबर 2012 को ही मनाया गया था। तो मैं बता रहा था कि संगीतम श्रीनिवास राव को बिना किसी संवाद की एक फिल्म बनाने का आइडिया तो काफी पहले आ गया था लेकिन इसकी कहानी सूझने में उन्हें काफी दिन लगे। फिर बाथरूम में मिले ज्ञान पर लिखी गई पटकथा लेकर जब वह कमल हासन के पास गए तो उन्होंने कहानी सुनते ही हां कर दी। फिल्म देख चुके लोगों को याद होगा कि ये वही फिल्म है जिसके लिए कमल हासन ने अपनी ब्रांड बन चुकी मूंछें मुंडवा दी थीं। मूंछों वाले चेहरे के भाव साफ समझ नहीं आते, ऐसा फिल्म निर्देशक संगीतम श्रीनिवास राव का मानना था।

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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता
संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाली फिल्म ‘पुष्पक विमान’ ने दक्षिण भारत में होने वाले फिल्मफेयर पुरस्कारों में भी तीन पुरस्कार जीते। ये पुरस्कार थे, बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट एक्टर। कमल हासन जब फिल्म करने को तैयार हो गए तो राव के सामने पहली समस्या आई कि इसमें पैसा कौन लगाएगा। उस वक्त सिर्फ 35 लाख रुपये की लागत से बनी इस फिल्म में जब कोई पैसा लगाने को तैयार नहीं हुआ तो राव ने खुद ही फिल्म निर्माण करने का फैसला कर लिया। ये बात किसी तरह कन्नड़ अभिनेता श्रृंगार नागराज को पता चली तो उन्होंने राव के फैसले की तारीफ की और खुद भी फिल्म में पैसा लगाने का वादा कर दिया। फिल्म की कहानी ऐसी थी कि इसमें किसी कलाकार को कोई संवाद ही नहीं बोलना था तो राव के पास पूरी छूट थी कि वह इस फिल्म को अखिल भारतीय फिल्म बनाने के लिए हर भाषा के सिनेमा से कलाकार ले सकते थे। कमल हासन के अलावा फिल्म में अमला आईं। भाड़े के हत्यारे के तौर पर संगीतम श्रीनिवास राव की पहली पसंद अमरीश पुरी थे, लेकिन अमरीश पुरी उन दिनों इतने व्यस्त थे कि फिल्म के लिए चाहकर भी तारीखें नहीं निकाल पा रहे थे।

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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

सारिका की सिफारिश पर टीनू की एंट्री
अमरीश पुरी की जब तारीखें नहीं मिल सकीं तो उन दिनों कमल हासन के साथ साये की तरह रहने वाली उनकी पूर्व पत्नी अभिनेत्री सारिका ने फिल्म में तब टीनू आनंद की एंट्री कराई। टीनू आनंद भी ये मानते हैं कि फिल्म ‘पुष्पक’ उन्हें सारिका की सिफारिश पर ही मिली। वह कहते हैं, ‘इस फिल्म में शूटिंग करना मेरे लिए लाइफ चेंजिंग एक्सपीरियंस रहा। हमने फिल्म की शूटिंग शुरू करने से पहले इसकी खूब वर्कशॉप्स कीं। लेकिन शूटिंग के समय हमें निर्देशक कभी बताते नहीं थे कि फ्रेम में कहां से आना है, कहां लाइट पकड़नी है और कहां से एग्जिट लेनी है। सब कुछ बहुत ऑर्गेनिक तरीके से होता था। राव साब कुर्सी डालकर सेट पर चिल किया करते थे और हम सबने बहुत ही मस्ती भरे माहौल में ये फिल्म पूरी की। फिल्म की जो अंतर्धारा है वह इतने साल बाद आज भी नहीं बदली है, और आज भी कोई अगर इस फिल्म का रीमेक करना चाहे तो मैं तो खुशी खुशी तैयार हूं। हां, छूट मुझे वैसी ही मिलनी चाहिए जैसी ओरीजनल फिल्म के निर्देशक ने दी थी।’

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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

बेरोजगारी का दर्द बयां करने वाली फिल्म
फिल्म ‘पुष्पक’  में कमल हासन, अमला, टीनू आनंद के बाद उन दिनों ‘खोपड़ी’ ने नाम से मशहूर हुए सीरियल ‘नुक्कड़’ के कलाकार समीर खक्कर को राव ने साइन किया फिल्म में एक ऐसे रईस आदमी के रोल में जो हमेशा नशे में रहता है और जिसकी बीवी अपने प्रेमी के साथ रंगरेलियां मनाने में व्यस्त रहती है। ये प्रेमी इससे शादी करना चाहता है और इसके लिए रईस आदमी को रास्ते से हटाने के लिए भाड़े के कातिल की सेवाएं लेता है। कहानी के बीच में कमल हासन की एंट्री एक बेरोजगार युवक के तौर पर होती है जो नौकरी तलाशने के लिए यहां वहां भटक रहा है। फिल्म ‘पुष्पक’ एक कालजयी फिल्म है। इसमें दिखाई गई दृश्यावलियां आज भी उतनी ही सामयिक हैं, जितनी 33 साल पहले थीं। फिल्म की ओपनिंग बहुत ही मादकता भरे माहौल में होती है। बिल्डिंग में झाड़ू लगाने वाली बाई के आसपास की ध्वनियों के साथ सामंजस्य बनाने वाले सीन से ही देखने वाले की आंखें और कान फिल्म के वीडियो और ऑडियो के साथ सिंक हो जाते हैं। अपनी बरसाती से इमारत की महिलाओं को ताड़ने वाले बेरोजगार के रोल में कमल हासन इसके बाद कहानी का सिरा पकड़ लेते हैं और इसे आखिर तक घुमाकर इसकी माला बना देते हैं।

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