Movie Review: रात अकेली है (Raat Akeli Hai)
इस हफ्ते एक्टर तिग्मांशु धूलिया का डायरेक्टर तिग्मांशु धूलिया से मुकाबला भी है। डायरेक्टर तिग्मांशु की फिल्म यारा का रिव्यू आप अमर उजाला डिजिटल पर पढ़ चुके हैं। अब बारी एक्टर तिग्मांशु धूलिया की है। तिग्मांशु ने एनएसडी में एक्टिंग ही सीखी। बैंडिट क्वीन के वह ऑफीशियल कास्टिंग डायरेक्टर थे और बाद में कमाल के डायरेक्टर बने। इस महीने मुकेश छाबड़ा के बाद कास्टिंग डायरेक्टर से फिल्म डायरेक्टर बनने वाले दूसरे तकनीशियन हैं, हनी त्रेहन। उनकी डेब्यू फिल्म रात अकेली है, आपको बांधने की कोशिश पूरी करती है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी एक नंबर है, राधिका आप्टे, पद्मावती राव, श्वेता त्रिपाठी, शिवानी रघुवंशी, रिया शुक्ला और इला अरुण की अदाकारी ने फिल्म को दूसरे नंबर पर सपोर्ट किया है, बाकी सब इसके बाद है।
Raat Akeli Hai: निर्देशन में हनी त्रेहन ने पाए पूरे नंबर, देखिए रात अकेली है को मिले कितने स्टार!
तो शुरू करते हैं किस्सा रात अकेली है, का। रात यहां सिर्फ वह रात नहीं है जो धरती के अपनी धुरी पर घूमने से होती है। रात यहां एक ऐसा रूपक अलंकार है जिसके बिंब आपको इस कहानी के हर महिला किरदार पर दिखते हैं। हर चेहरा डरा हुआ। हर चेहरा सहमा हुआ और मर्द सब चौकड़ी भर रहे हैं। बुढ़ापे में घर की लड़कियों पर ही दांव धर रहे हैं। और, लड़के सब अलग ही पिनक में हैं। जिसको देखो खुद को तीसमारखां समझे बैठा है और इन सबके बीच शादी वाले घर में गोली की आवाज भी सुनाई नहीं देती है और मुखिया निपट जाता है। सैक्रेड गेम्स वाली स्मिता सिंह की कलम का कमाल फिल्म में जगह जगह दिखता रहता है।
फिल्म रात अकेली है, कहीं दूर आपको लेकर नहीं जाती। यूं लगता है कि आप कोई जासूसी टाइम का पुराना उपन्यास पढ़ रहे हैं जिसके सारे किरदार आपके जाने पहचाने हैं। अपने बेटे की शादी के लिए परेशान अम्मा हैं। उसके बेटे को शादी लायक लड़कियां इसलिए रिजेक्ट कर रही हैं क्योंकि उसका रंग साफ नहीं है। और, ये बेटा शीशे के पीछे फेयर एंड लवली टाइप की कोई क्रीम भी रखता है। इस एक सीन ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे दमदार किरदार का पूरा असर कहानी में खत्म कर दिया। ये कुछ कुछ वैसा ही सीन है जैसा सैक्रेड गेम्स में गुरुजी के आगोश में गणेश गायतोंडे। ऐसे सीन देखकर लगता है कि जैसे नवाजुद्दीन के नायकत्व का करिश्मा जानबूझकर हल्का करने की कोशिश चल रही है।
फिल्म रात अकेली है की कहानी का सेंटर प्वाइंट राधिका आप्टे हैं। पहली बार वह एक ऐसी कहानी के फोकस में हैं जिसमें बुंदेलखंड से लेकर अवध तक के किरदार अलग अलग चौराहों पर घात लगाए बैठे हैं। जाहिर है ये बोली उनके लिए एलियन है लेकिन राधिका ने खुद को संभाला है और अपनी तरफ से अपने किरदार का रहस्य बनाए रखने और बचाए रखने की कोशिश आखिर तक की है। फिल्म की कहानी में रस है। वह दर्शक को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहती है। हनी त्रेहन के निर्देशन में कसाव है। यूं लगता है कि झील का एक दायरा बांध उन्होंने अपने कलाकारों को कागज की नाव बनाकर इस कहानी में छोड़ दिया है। सब अपने अपने हिसाब से डूब उतरा रहे हैं और हनी अपने सिनेमैटोग्राफर पंकज कुमार के साथ किसी ऊंची जगह पर बैठे इसे शूट कर रहे हैं।
सच पूछा जाए तो फिल्म के शुरू होने पर ये पंकज का कैमरा ही है जो सबसे पहले आपका ध्यान खींचता है। पूरे काले फ्रेम में दूर से दो आंखों सी कार की हेडलाइट चमकती हैं। और, दर्शक को अपनी तरफ खींचकर पूरे ट्रैक पर चूना सा डालते हुए पूरी रिले रेस का मैदान सेट कर देती हैं। फिल्म देखकर लगता नहीं कि हनी पहली बार किसी फिल्म का निर्देशन कर रहे हैं। ये और बात है कि उन्होंने अपने लिए एक सुरक्षित माहौल चुना है। फिल्म मात खाती है तो संगीत के स्तर पर। स्नेहा खानविलकर का रचा संगीत यूपी के माहौल के लिहाज से बेहतर हो सकता था। नवाजुद्दीन सिद्दीकी को भी ये मान लेना चाहिए कि उनका एकसार अभिनय अब दर्शकों को न तो चौंकाता है और ना ही अलर्ट रहने को मजबूर करता है। यूं लगता है कि डायरेक्टर के एक्शन बोलते ही वह मशीन की तरह चलते हैं और अपना काम खत्म करके बंद हो जाते हैं।
फिल्म के दूसरे पुरुष कलाकारों में निशांत दहिया और स्वानंद किरकिरे अपना असर छोड़ने में कामयाब रहते हैं लेकिन एसपी लालजी शुक्ला के रोल में तिग्मांशु कुछ भी नया नहीं करते। एमएलए मुन्ना राजा में आदित्य श्रीवास्तव की कास्टिंग खराब है। हां, श्रीकर प्रसाद ने बड़ी कोशिश की है फिल्म में सब कुछ अपनी टेबल पर ठीक कर देने की, लेकिन ऐसे मामला सेट होता नहीं है। फिल्म रात अकेली है को अमर उजाला मूवी रिव्यू में मिलते हैं ढाई स्टार।
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