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‘बाहुबली’ की नकल में खोया रामकथा का असली मर्म, वेब सीरीज बनी कुणाल कोहली की फिल्म

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 06 May 2021 04:37 PM IST
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Ramyug Review by Pankaj Shukla Kunal Kohli MxPlayer Kabir Duhan Dalip Vivek Aishwarya Mamta Dignath
रामयुग - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

वेब सीरीज रिव्यू: रामयुग


पटकथा, संवाद: कमलेश पांडे
निर्देशककुणाल कोहली
कलाकार: दिगांत मनचले, अक्षय डोगरा, ऐश्वर्य ओझा, विवान भटेना, अनूप सोनी, दलीप ताहिल, टिस्का चोपड़ा और कबीर दुहान सिंह
ओटीटी: एमएक्स प्लेयर
रेटिंग: **

दो साल पहले कुणाल कोहली की फिल्म ‘रामयुग’ का नाम इस संदर्भ में सुनाई दिया था कि ‘हम तुम’ और ‘फना’ जैसी हिंदी की दमदार फिल्में बनाने वाले इस निर्देशक ने पड़ोस के एक देश में एक बड़ा प्रोजेक्ट पूरा कर लिया है। वहां की सुरम्य प्राकृतिक छटा को वह वाल्मीकि की रामायण के सहारे दिखा रहे हैं। कुछ नए चेहरे राम, लक्ष्मण और सीता बने हैं और कुछ अनुभवी अभिनेताओं ने बाकी कथा स्तंभ संभाले हैं। त्रेया युग भारतीय धर्मगाथाओं में तमाम कहानियों के लिए प्रचलित रहा है। राम की कहानी उनमें से एक है। भारतीय परंपरा में मनुष्यों के नाम पर युगों के नाम रखने की प्रथा नहीं है।

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रामयुग - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

‘मस्तराम’ से ‘रामयुग’ तक

कुणाल कोहली की ये कल्पना यहीं पर अपना आकर्षण खो देती है। राम व्यवस्था के प्रतीक हैं। समय के नहीं। वह मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। समय ने उनसे अपनी पत्नी की सार्वजनिक अग्नि परीक्षा कराई और कुणाल कोहली की सीरीज भी इसी घटनाक्रम पर आकर घुटने टेक देती है। कोरोना काल में नई मनोरंजन सामग्री बनाना बहुत मुश्किल हो चला है और ऐसे में रिलीज की राह तकती रहीं फिल्में सीरीज की शक्ल लेकर ओटीटी पर पहुंच रही हैं, ‘रामयुग’ भी इसी कड़ी में एमएक्स प्लेयर पर है। संतोष की बात ये है कि इसी बहाने ये ओटीटी ‘मस्तराम’ से ‘रामयुग’ तक तो आया।

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रामयुग - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

‘बाहुबली’ से नकली नगर

राम की कोई भी कथा अब जब भी परदे पर आती है तो सहज उत्सुकता इसी बात की होती है कि राम कौन बना है, सीता कौन है, बाकी चरित्र परदे पर कौन निभाएगा? कैसे निभाएगा? कुणाल कोहली की राम कथा सोने के हिरण के शिकार से शुरू होती है। मायावी मृग के स्पेशल इफेक्ट्स देखकर मन रमता भी है। लेकिन ‘बाहुबली’ जैसे महल, नगर और हवाई दृश्य जल्द ही इसकी नवीनता के दावे के नकली होने की चुगली करने लगते हैं। विश्वामित्र बने दलीप ताहिल की आवाज ऐसी नहीं है कि वह राम की कथा को सूत्रधार बनकर संभाल सके और फिर राम कथा नाटक नहीं है। ये राम की लीला है जिससे देश का जनमानस तमाम मत मतांतर और भाषा विरोध होने के बावजूद एक जैसा जुड़ा है। जंगल में दाढ़ी वाले राम, लक्ष्मण देख भी कौतुहल जागता है कि कुणाल कुछ अलग करने वाले हैं, लेकिन फिर कुणाल का कौतुक कला बन नहीं पाता।

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रामयुग - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

संवादों में सहजता नहीं

वेब सीरीज ‘रामयुग’ का लेखन इस सीरीज की सबसे कमजोर कड़ी है। धर्म ग्रंथों का ज्ञान होने के साथ साथ  उनकी कहानियों को श्रोता तक सहज, सुगम और सरल तरीके से पहुंचाने के लिए लेखक को तुलसी जैसा निर्मल होना ही चाहिए। संवादों में संदेश भी तभी बिना किसी कपट के दर्शक या श्रोता के मन को ग्राह्य हो जाते हैं। ‘रामयुग’ की कथा रामचरित मानस या रामायण की तरह रैखिक गति से आगे नहीं बढ़ती है। ये सीता हरण से शुरू होकर आगे बढ़ती है और सीता की खोज के क्रम में राम कथा की विभिन्न घटनाओं को छूकर आगे बढ़ती रहती है। कह सकते हैं कि रामकथा देखने का ये पारंपरिक तरीका नहीं है, कुणाल कोहली के इस प्रयोग में शुरू में दम भी दिखता है, लेकिन वह इसे सिनेमाई बनाने से नहीं रोक सके।

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रामयुग - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

कबीर दुहान सिंह की मेहनत

कलाकारों का चयन वेब सीरीज ‘रामयुग’ की बड़ी विडंबना है। दुख होता है देखकर कि कबीर दुहान सिंह जैसे मेहनती कलाकार का निर्देशक ने रावण जैसे कई परतों वाले किरदार में सही प्रयोग नहीं किया। ये ठीक है हर आदमी के भीतर होते हैं दस बीस आदमी, लेकिन रावण के भीतर जो कुछ था, उसे स्पेशल इफेक्ट्स की बजाय उसके व्यहार, अतिचार और अहंकार में दिखाना चाहिए था। वे सब खुद से एक साथ संवाद नहीं कर सकते। एक समय में रावण एक ही चरित्र जीता था।

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