चलिए, आज उस फिल्म का नंबर भी आ गया जिसमें दिखे बाइस्कोप पर मैंने इस कॉलम का नाम रखा, ‘बाइस्कोप’। फिल्म का नाम- रंगीला। निर्देशक- राम गोपाल वर्मा। और, फिल्म के रंगीला राजा रहे आमिर खान। आमिर खान ने भले फिल्म में वाकई रंगीला दिखने के लिए अपने बनाए खास कपड़े पहने हों, कुछ दिन जाकर चॉल और झोपड़पट्टी में बिताए हों, और वहां की टपोरी भाषा सीखने के लिए बड़ी मेहनत की हो, लेकिन फिल्म ‘रंगीला’ का असल फायदा अगर किसी को हुआ तो वह रहीं राम गोपाल वर्मा की उस वक्त की बेहद करीबी दोस्त उर्मिला मातोंडकर। उर्मिला का नंबर इस रोल के लिए श्रीदेवी, मनीषा कोइराला और रवीना टंडन का नाम चर्चा में आने के बाद ही लगा। हालांकि, राम गोपाल वर्मा कहते हैं कि फिल्म ‘द्रोही’ में बिना किसी कोरियोग्राफर के उर्मिला ने जो कमाल का डांस अपने आप किया, उससे प्रभावित होकर उन्होंने उर्मिला को ‘रंगीला’ के लिए कास्ट किया था। फिल्म ‘रंगीला’ ऐसी फिल्म भी है, जिसकी कास्टिंग में अगर राम गोपाल वर्मा की चलती तो इसमें जोड़ी जैकी श्रॉफ और आमिर खान की नहीं बल्कि सलमान खान और शाहरुख खान की बनती। जी हां, शाहरुख खान को इस फिल्म में आमिर खान वाला और सलमान खान को जैकी श्रॉफ वाला रोल ऑफर हुआ था।
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आर्थिक उदारीकरण की झलक
साल 1995 हिंदी सिनेमा में मोहब्बत का एक नया दौर शुरू करने वाला साल रहा है। ये वो साल है जिसमें रिलीज हुई फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में सिमरन को अकेले विदेश में सैर करते दिखाया गया। और, ‘रंगीला’ में दिखाया गया कि मिली अकेले मोहल्ले के एक टपोरी टाइप के लड़के के साथ भी घूमने चली जाए तो परिवार में किसी को दिक्कत नहीं है। यहां मुन्ना घर में घुलमिल जाता है, वहां राज भी आकर घरवालों से घुलमिल जाता है। ये पी वी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह के सपनों का भारत है, जो आर्थिक उदारीकरण में बदले सपनों में हिलोरें ले रहा है। दुनिया खुल रही है। मां-बाप ने बच्चों के आसपास जकड़ी बेड़ियों भी खोल दी हैं। बच्चे सपने देख रहे हैं। गानों में ख्वाहिशें बदल रही हैं। लेकिन, आम आदमी यानी मुन्ना अब भी ब्लैक में सिनेमा की टिकटें बेचकर ही गुजारा कर रहा है। और, पुलिस वाला जब उसे पकड़ता है तो वह ताना भी मारता है कि बड़े बड़े घोटाले करने वालों को कोई नहीं पकड़ता एक आम आदमी का मेहनत करने भी जीना मुश्किल है।
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ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा का सतरंगी संस्करण
गौर करके देखेंगे तो फिल्म ‘रंगीला’ एक तरह से ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा का सतरंगी संस्करण है। वही आम जिंदगी की सपनीली हसरतें। इन हसरतों के पीछे भागती आम जिंदगी। फिल्म में सब कुछ अच्छा अच्छा है। मिली अच्छी है। मुन्ना अच्छा है। राज कमल भी तो अच्छा ही है। कोई विलेन नहीं है फिल्म में। ये बात जब आमिर खान ने फिल्म की कहानी के बाद पकड़ी तो फिल्म के लेखक निर्देशक राम गोपाल वर्मा को बहुत अच्छा लगा। उन्होंने आमिर खान को फिल्म की अंतर्धारा समझाई और आमिर पहली ही बार में उस रोल के लिए मान गए जिसके लिए शाहरुख खान कहते हैं कि कई बैठकों के बाद भी अपना मन नहीं बना पाए। आमिर खान का अपने किरदारों के साथ प्रयोग करने का सिलसिला उनके फिल्म ‘रंगीला’ के किरदार मुन्ना से ही माना जाता है। ये बात और है कि फिल्म में इतने जानदार अभिनय के बाद भी जब उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट एक्टर अवार्ड नहीं मिला तो उसके बाद से ही आमिर खान ने फिल्म पुरस्कार समारोहों में जाना बंद कर दिया। वैसे गुस्सा आमिर को ‘रंगीला’ से पहले फिल्म ‘जो जीता वही सिकंदर’ के लिए भी पुरस्कार न मिलने का भी रहा था। लेकिन, ‘रंगीला’ में उनकी मेहनत की उपेक्षा किए जाने ने उनका दिल तोड़ दिया।
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सिनेमा की हर तकनीक का उम्दा इस्तेमाल
कहानी, निर्देशन, संगीत, संवाद, सिनेमैटोग्राफी और एडीटिंग के लिहाज से देखेंगे तो ‘रंगीला’ किसी टेक्स्ट बुक फिल्म से कम नहीं है। सिनेमा की पढ़ाई करने वालों को भी ये फिल्म दिखाई जाती है। ये फिल्म राम गोपाल वर्मा का हिंदी सिनेमा में ऐलानिया आगमन है। ‘शिवा’, ‘द्रोही’ और ‘रात’ के बाद राम गोपाल वर्मा ने बनाई थी फिल्म ‘रंगीला’। पहले की तीन फिल्मों से उन्होंने उस वक्त की बागी टाइप की युवा पीढ़ी को अपने साथ जोड़ ही लिया था, बस युवा जोड़ों को उन्हें थोड़ा और भरमाना था और ये काम ‘रंगीला’ ने कर दिया। उस वक्त की सामाजिक परिस्थितियों के सारे सपने इस फिल्म ने एक बार में ही दिखा दिए। झोपड़पट्टी में रहने वाला जिस लड़की से प्यार करता है, वह लड़की हीरोइन बनने के सपने देखती है, देश के सबसे बड़े सुपरस्टार राज कमल को वह पसंद आती है। लेकिन, मुन्ना और राजकमल जब पहली बार एक छत के नीचे होते हैं, तो वहां से हिंदुस्तान के दो पालों में बंटी तस्वीर भी साफ नजर आ ही जाती है। एक तरह है सपने देखता भारत और दूसरी तरफ है इन सपनों में रहता भारत। मुन्ना और राज कमल आर्थिक उदारीकरण की एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जिसमें दोनों तरफ के चित्र रंगीन हैं, बस जिंदगी हसीन होना एक का ही नसीब है।
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मुन्ना को चाहिए हर किसी की तवज्जो
‘रंगीला’ उन गिनती की हिंदी फिल्मों में से है जिनको हॉलीवुड में फिर से बनाया गया। इस फिल्म की रीमेक हॉलीवुड में ‘विन ए डेट विद टैड हैमिल्टन’ के नाम से बनी है। बाद में एक हिंदी फिल्म ‘ब्रेक के बाद’ की कहानी भी बहुत कुछ मिली और मुन्ना जैसी ही है। मुन्ना और मिली दोनों उस वक्त के समाज के दो ऐसे पहलू हैं जिन्हे राम गोपाल वर्मा ने अपनी कहानी का आदर्श बनाकर पेश किया है। मुन्ना गरीब है लेकिन दिल का राजा है। जहां भी पहुंचता है, चाहता है कि लोग उसे देखें। रेस्तरां में जाता है तो एसी घुमाने के लिए बोलता है। पिक्चर देखने जाता है तो पैर हटाने को बोलने वाले को भी टांग देता रहता है। वह आकर्षण का भूखा है। दिक्कत ये है कि तब ट्विटर, इंस्टाग्राम और फेसबुक नहीं हैं। वह अपना सोशल मीडिया खुद ही है। यही आदत आज 25 साल बाद देश के हर उस इंसान में देखी जा रही है जिसे सोशल मीडिया की रत्ती भर भी लत लग चुकी है। वह हर रोज सुबह उठकर एसी घुमाने को बोल ही देता है।
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