डिजिटल रिव्यू: बार्ड ऑफ ब्लड (वेब सीरीज)
नेटफ्लिक्स पर अमेरिका में लगी साढ़े साती का असर भारत तक पहुंच रहा है। पहले सेक्रेड गेम्स का दूसरा सीजन दर्शकों ने नकार दिया। अब बारी शाहरुख खान के प्रोडक्शन हाउस की पहली वेब सीरीज बार्ड ऑफ ब्लड की है। ओटीटी की दुनिया में जहां जी5 देशी कहानियों पर फिल्में और सीरीज बनाकर अपनी बढ़त बना रहा है। प्राइम वीडियो पहले ब्रीद और अब फैमिली मैन के जरिए देश के भीतर इलाकों में पैठ बना रहा है, नेटफ्लिक्स का पुरानी किताबों से मोह उसके लिए खतरे की घंटी बन रहा है।
Bard of Blood Review: इमरान हाशमी की नेटफ्लिक्स पर बोहनी को बट्टा, ये हैं सीरीज की 5 कमजोर कड़ियां
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शाहरुख खान इस सीरीज को लेकर लगातार पाकिस्तानी दर्शकों के निशाने पर रहे हैं। शायद इसी के चलते इस सीरीज में न वह आईएसआई का नाम खुलकर ले पाए और ना भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का। इनके नामों में फेरबदल जैसी ये पूरी सीरीज ही नकली लगती है। न इसकी पटकथा में दम है और न ही किरदारों में। सब कुछ बेवजह एक ऐसा तनाव बनाने की कोशिश में दिखता है, जिसका अंत कैसा भी हो, दर्शकों को फर्क नहीं पड़ता।
बार्ड ऑफ ब्लड इसी नाम के चार साल पुराने उपन्यास पर बनी है, जिसे बिलाल सिद्दीकी ने लिखा। सीरीज की चर्चा से पहले इसके बारे में गिनती के लोगों को ही पता रहा होगा। लेकिन, एक और जैक रयान बनाने के मोह में नेटफ्लिक्स ने अधकचरी सीरीज बना डाली। सीरीज की कहानी है कबीर आनंद की जो रॉ का एजेंट रह चुका है, और एक मिशन में नाकाम होने के बाद कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ा रहा है। रॉ को उसकी जरूरत आ गई है क्योंकि उसके कुछ और एजेंट बलूचिस्तान में फंस गए हैं।
मॉडल टाइप दिखने वाली एक एजेंट के साथ वह भेष बदलकर सीमा पार पहुंचता है। वहां पहले से मौजूद एक और एजेंट के साथ वह मिशन शुरू करता है। उसका पुराना प्यार रास्ते में टकराता है और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के लोगों को उसका पता भी चल जाता है।
बार्ड ऑफ ब्लड की पटकथा में बहुत झोल हैं। पहले तो तमाम सारे नकली संगठनों के नाम इसका मजा पहले ही एपीसोड में खराब कर देते हैं। आगे बढ़ती कहानी में क्वेटा और केच लूप मोड में चलने लगते हैं। बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई लड़ रहे लोगों तक पहुंचते पहुंचते कहानी हांफने लगती है।
सीरीज में पूरे समय इमरान हाशमी गुस्से में क्यों बने रहते हैं, इसकी कोई वजह समझ नहीं आती। शोभिता का किरदार सीरीज में सबसे कमजोर गढ़ा गया है। हां, कीर्ति कुल्हारी और विनीत सिंह के किरदारों के चलते सीरीज को आखिर तक देखने का दम दर्शक में जरूर बना रहता है। निर्देशन, संगीत, एक्शन के साथ साथ सीरीज का संपादन भी बहुत कमजोर है। नेटफ्लिक्स के लिए हिंदी वेब सीरीज का ये साल का दूसरा बड़ा सबक है, बहुत संभव है कि इसके कर्ताधर्ता बार्ड ऑफ ब्लड का हश्र देख किताबों के मोह से निकलें और कहानियों पर ज्यादा देना शुरू करें।