मुंबई में कोकिलाबेन अस्पताल के पास बनी एक इमारत की लिफ्ट में निर्देशक रमेश सिप्पी अक्सर अंदर जाते या बाहर निकलते वक्त टकराते हैं। कभी दुआ सलाम होती है, कभी वह अपनी पत्नी किरण जुनेजा से बातें करते बाहर निकल जाते हैं और कभी मैं इमारत के वॉचमैन से दुआ सलाम करते हुए अंदर चला जाता हूं। रमेश सिप्पी के आसपास न अब लोग होते हैं, न प्रशंसक उनके पीछे भागते हैं। वह खुद भी सिनेमा से धीरे धीरे दूर ही हो गए। उनकी निर्देशित अब तक की आखिरी फिल्म 'शिमला मिर्ची' लंबे समय तक रिलीज की राह तकने के बाद इसी साल की शुरूआत में रिलीज हुई। लेकिन, समय हमेशा ऐसा नहीं था, कभी उनके आसपास सितारों का मेला लगता था। और, इसकी शुरूआत हुई थी हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्म शोले से, जिसका तिलिस्म आज तक अनसुलझा है। फिल्म में सिक्का उछालकर फैसला करने वाला जय का स्टाइल बाद में क्रिस्टोफर नोलन जैसे निर्देशक ने अपनी फिल्म 'डार्कनाइट बिगिन्स' में इस्तेमाल किया। इस तिलिस्म पर एक आलेख मैंने 'अमर उजाला' की फिल्म मैगजीन 'रंगायन' में 19 साल पहले लिखा था। आज उसे बाइस्कोप के पाठकों के लिए फिर से ले आया हूं।
बाइस्कोप: 'शोले' का अनसुलझा तिलिस्म, जब जय और वीरू की जोड़ी को समलैंगिक बताने की हुई थी कोशिश
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शायद नौ साल की उम्र किसी फिल्म के विश्लेषण के लिए बहुत कम या कहें कि नाकाफी होती है। लेकिन, 'शोले' जब रिलीज हुई तो मैं इतना ही बड़ा था। तब किशोरवय रही पीढ़ी आज जवानी के आखिरी दौर से गुजर रही है और उस समय जवान रहे लोग अब सिर से उड़ते बालों और रोजमर्रा को जरूरतों को पूरा करने की उलझनों में गिरफ्तार होकर रह गए हैं। लेकिन, अपनी रिलीज के पच्चीस साल बाद (2001 में) भी शोले का तिलिस्म टूटा नहीं है। फिल्म की वितरक कंपनी राजश्री पिक्चर्स के दफ्तरों में आज भी इस फिल्म की बुकिंग धड़ल्ले से होती है और कई बार ऐसा भी हो चुका है कि इस फिल्म ने नई रिलीज फिल्मों से ज्यादा कारोबार अपने पुन: प्रदर्शन पर किया है। शोले का जादू ही ऐसा है। यह इसका जादू ही तो है कि इस फिल्म की रिलीज के बाद से लगातार किताबें लिखी जा रही हैं और यह सिलसिला नई सहस्राब्दी के शुरू हो जाने के बाद भी थमा नहीं है।
फिल्म के निर्देशक रमेश सिप्पी मानते हैं कि शोले की सफलता में इसके ध्वनि प्रभावों का मुख्य हाथ रहा। वह बताते हैं, 'जय द्वारा उछाले गए सिक्के का चट्टान पर गिरकर खनकना, ठाकुर की हवेली में लगे झूले की किरकिराहट, रेल इंजन से निकली भाप का बंदूक की गोली की आवाज से साम्य और गब्बर सिंह के परदे पर आगमन के समय आती सियारों के रोने सी आवाज, ये सब चीजें मिलकर एक अलग प्रभाव पैदा करती हैं।' सिप्पी मानते हैं कि यह ध्वनि प्रभाव ही था जिसने 'शोले' को मुंबई के मिनर्वा सिनेमाघर से लगातार पांच साल तक उतरने नहीं दिया। मालती सहाय व विमल दिसानायके ने 'शोले: ए कल्चरल रीडिंग' में 'शोले' का पोस्टमार्टम किया था, हालांकि वे दोनों फिल्म की सफलता में महती भूमिका निभाने वाले किसी स्पष्ट कारक तक पहुंचने में तो सफल नहीं रहे, पर वहीं से नींव पड़ी थी इस कालजयी फिल्म को हिट कराने में काम आए तत्वों की खोज करने की। यह खोज आज भी जारी है।
कुछ समीक्षकों का मानना है कि 'शोले' में रमेश सिप्पी ने अकीरा कुरोसावा की फिल्ममेकिंग में वेस्टर्न स्टाइल का घालमेल किया था, जो उस समय के हिंदी सिनेमा के लिए कतई नया था। लेकिन, इस बात से भी सहमत नहीं हुआ जा सका क्योंकि फिल्म में अमिताभ बच्चन द्वारा निभाए गए जय के किरदार के अलावा किसी अन्य का चित्रण वेस्टर्न स्टाइल में नहीं हुआ। अपनी गिरफ्तारी से बेफिक्र जय का ट्रेन में वीरू के सामने बैठे पुलिस अफसर से होती गप्पों से कोई वास्ता नहीं होता। न ही उसे इस बात की फिक्र है कि उसका दोस्त पानी की टंगी पर चढ़कर आत्महत्या करने को उतारू है। वह अपने में मगन है और प्लेट में चाय की चुस्कियां लेता रहता है। नायक की यह मस्तमौला छवि पश्चिमी फिल्मों की देन कही जा सकती है।
'शोले' के कथासार के बारे में नसरीन मुन्नी कबीर की किताब 'टॉकिंग फिल्म्स' में एक जगह फिल्म के सह पटकथा लेखक जावेद अख्तर कहते हैं कि 'शोले' की कहानी दो दिग्गजों के टकराव पर आधारित है। पहला एक खूंखार डाकू गब्बर सिंह, जिसके आतंक से बच्चे भी रात को डरकर सो जाते हैं और दूसरा वृद्ध व रिटायर्ड पुलिस अफसर ठाकुर, जो अपने परिवार के सामूहिक कत्ल का बदला लेना चाहता है। सत्तर के दशक की शुरुआत में लोगों का जब प्रजातंत्र से विश्वास उठ रहा था तो उन्हीं दिनों यह फिल्म रिलीज हुई थी। गौर करने वाली बात है कि फिल्म में एक अपाहिज ठाकुर अपने गांव के लिए कहर बन गए खूंखार डाकू गब्बर सिंह से मुकाबले के लिए पुलिस के पास मदद मांगने नहीं जाता। वह पुलिस के पास जाता है तो दो छुटभैये अपराधियों की खोज के लिए जिनका कि इस्तेमाल वह गब्बर के मुकाबिल करने वाला है। पुलिस इस काम में उसकी मदद करती भी है।