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The Disciple Review: असल कलाकारों की असली मुंबई दिखाती ‘डिसाइपल’, तम्हाणे की एक और चैतन्य फिल्म
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मूवी रिव्यू: द डिसाइपल
कलाकार: आदित्य मोदक, अरुण द्रविड़, दीपिका भिडे भागवत, किरण यज्ञोपवीत और सुमित्रा भावे।
लेखक, निर्देशक: चैतन्य तम्हाणे
संगीत: अनीश प्रधान
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: ****
ये विदेशी ओटीटी भी एक रहस्य ही हैं। ‘अजीब दास्तान्स’ जैसी सीरीज के प्रचार के लिए आपको कहीं भी ढूंढ निकालेंगे। लेकिन जब एक दमदार और अद्भुत फिल्म ‘द डिसाइपल’ रिलीज होगी, तो उनकी पूरी पीआर मशीनरी सांस तक नहीं लेती। यही नहीं आप नेटफ्लिक्स पर लॉग इन करिए। ये फिल्म आपको होम पेज पर दिखेगी ही नहीं। यहां तक कि मराठी सिनेमा कैटेगरी के होमपेज पर भी ये नहीं दिखती। वजह नेटफ्लिक्स में इंडियन ओरीजनल्स देखने वाले ही जानें लेकिन नेटफ्लिक्स को अपनी इस इमेज से बाहर आना जरूरी है। लंबी दौड़ में उनका साथ चैतन्य तम्हाणे जैसे निर्देशक ही देने वाले हैं, करण जौहर जैसे निर्माताओं की कंपनियां तो ‘सर्चिंग फॉर शीला’ ही थमा सकती हैं।
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द डिसाइपल
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
चैतन्य तम्हाणे ने अपनी दूसरी फिल्म ‘द डिसाइपल’ के लिए एक ऐसी कहानी चुनी है जो हिंदी कमर्शियल सिनेमा की सी कहानी लगती है। सलमान खान और विक्रम गोखले फिल्म के पहले सीन से ही याद आने लगते हैं। लेकिन, यहां न तो वह वैभव है, न वह रंगबाज़ी है और न ही वह चेहरों का नकलीपल जो एक गायक का किरदार करने के लिए सलमान या विक्रम को ओढ़ना पड़ा होगा। यहां तो खालिस कलाकार हैं। दोनों दिल से गाने वाले। गायन उनकी मूल पहचान है। अभिनय यहां वह इफरात में कर रहे हैं। एक एक सुर जो सुनाई देता है, वह उनके कंठ और होठों के कंपन से निकला मालूम देता है।
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द डिसाइपल
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘द डिसाइपल’ मराठी की फिल्म है। देश विदेश में इसका बड़ा डंका बजा है। तमाम इनाम इकराम समेटने के बाद इसकी रिलीज सीधे ओटीटी पर हुई है। देश के सबसे महंगे ओटीटी पर। लेकिन, फिल्म की मार्केटिंग और प्रचार बहुत सस्ता रहा। फिर भी फिल्म में जान है। और, जानदार फिल्में मार्केटिंग का इंतजार नहीं करतीं। वे दर्शकों के मुख प्रचार से खाद पाती हैं। फिल्म ‘द डिसाइपल’ की कहानी भी ऐसी ही है। जैसे फिल्म के हीरो को मुंबई के फ्लाईओवर से गुजरते एक आवाज संगीत का असल मर्म समझाती है, वैसे ही ये फिल्म दर्शक को जीवन का रस समझाती है। पुराने ऑडियो टेप को सीडी में बदलने का काम करने वाला शरद को ‘माई’ की आवाज समझाती है कि संगीत क्या है। क्यों पैसे, परिवार और प्रसिद्धि की चाहत रखने वालों को सिर्फ भाव गीत और फिल्मी गीत ही गाने चाहिए और क्यों शास्त्रीय संगीत की राह पर चलने के लिए सब कुछ छोड़ देना होता है। क्योंकि, यह संगीत साधना है। उसे पाने की जिसे पाने में 10 जनम भी व्यर्थ हो जाते हैं।
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द डिसाइपल
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘द डिसाइपल’ को कोई सलमान खान, आमिर खान, शाहरुख खान यहां तक कि देश भर में रैपर ढूंढ रहे रणवीर सिंह का भी समर्थन नहीं मिला है। पर ये फिल्म अपना समर्थन आप है। 10 मिनट बाद ही फिल्म दर्शक को अपने में समा लेती है। इसके राग, बंदिशें, ख्याल सब जादू हैं। एक अलग दुनिया का एहसास। अपनी पिछली फिल्म ‘कोर्ट’ में चैतन्य ने वीरा साथीदार को स्टार बना दिया था। एक लोक कलाकार को फिल्म में लेना और उससे ऐसा काम करा लेना बिरले ही देखने को मिलता है। लेकिन, चैतन्य ने फिल्म ‘द डिसाइपल’ में भी यही किया। उनके दोनों प्रमुख कलाकार शास्त्रीय गायक हैं। कास्टिंग की जीत ही चैतन्य के सिनेमा की जीत है। साथीदार अब हमारे बीच नहीं है। फिल्म में ‘माई’ की आवाज बनी सुमित्रा भावे भी जग छोड़ चुकी हैं।
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द डिसाइपल
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
नीयत साफ हो तो बाकी सब अपने आप हो जाता है, चैतन्य को ये सीख उनके इस फिल्म के पथप्रदर्शक ऑस्कर विजेता फिल्मकार अल्फांसो कुआरॉन ने दी। रॉलेक्स मेंटॉर एंड प्रोटीजी आर्ट्स इनीशिएटिव में चार पांच साल पहले दोनों मिले थे। उन्होंने ही चैतन्य को फिल्म के सिनेमैटोग्राफर माइकल सोबोसिन्सकी तक पहुंचाया। माइकल ने फिल्म ‘द डिसाइपल’ का पूरा लुक ठीक वैसा ही रखा है जैसा मूड उस मुंबई का होता है जिसके बीच जाने के लिए आपको खुद को भुलाना होता है। मुंबई में संगीत की दो धाराएं बहती हैं। एक जिनका रास्ता बड़े बड़े शोज और कंसर्ट को जाता है। और, दूसरा तो दरअसल रास्ता ही नहीं है। वहां किसी को कहीं जाना नहीं है। वहां हर गायक या वादक को बस खुद को ही पा लेना है। इसी के चलते अनीश प्रधान का नाम फिल्म के संगीतकार के रूप में देखकर हैरानी बिल्कुल नहीं होती है। हां, चैतन्य तम्हाणे जैसे फिल्मकार अगर उन तक न पहुंच पाते तो जरूर हैरानी होती। फिल्म देखिएगा जरूर..!
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