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Torbaaz Movie Review: कमाल कहानी पर बनी बेअसर फिल्म रही तोरबाज, नेटफ्लिक्स का एक और गलत सेलेक्शन

Sun, 13 Dec 2020 01:16 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 13 Dec 2020 01:16 PM IST
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Torbaaz Movie Review by Pankaj Shukla Sanjay Dutt Girish Malik Rahul nargis fakhri Netflix india
तोरबाज - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला

Movie Review: तोरबाज़


कलाकार: संजय दत्त, राहुल देव, नरगिस फखरी, गेवी चहल, राहुल मित्रा, कुंवरजीत चोपड़ा, प्रियंका वर्मा, वंश सयानी आदि।
निर्देशक: गिरीश मलिक
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: **

संजय दत्त जब पिछली बार जेल से रिहा हुए तो हर फिल्म निर्माता एक और ‘खलनायक’ बनाने के फेर में जुट गया। निर्माता संदीप सिंह ने ‘भूमि’ बनाई। राहुल मित्रा ने ‘साहब बीवी और गैंगस्टर 3’ बनाई। ये फ्लॉप हुई तो संजय दत्त ने ‘तोरबाज’ को भी हाशिये पर डाल दिया। इसके बाद आईं ‘कलंक’, ‘प्रस्थानम’, ‘पानीपत’ और ‘सड़क 2’ सब फ्लॉप रहीं। लोगों को इन फिल्मों में संजय दत्त पसंद आए लेकिन संजय दत्त की शख्सियत का सही फायदा ये फिल्में उठा नहीं पाईँ। आधा दर्जन फ्लॉप फिल्मों के बाद संजय दत्त कैंसर का इलाज कराते रहे। सुर्खियां बटोरते रहे और इन सुर्खियों का फायदा मिला फिल्म ‘तोरबाज’ के निर्माताओं को। दो साल से रिलीज की बाट जोह रही फिल्म को नेटफ्लिक्स ने अपने प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने के लिए खरीद लिया। 
 

Torbaaz Movie Review by Pankaj Shukla Sanjay Dutt Girish Malik Rahul nargis fakhri Netflix india
तोरबाज - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म ‘तोरबाज’ संजय दत्त के करियर की बतौर हीरो आखिरी फिल्म हो सकती है। आगे का उनका फिल्मों का लाइन अप खलनायक विशेष होने जा रहा है। यहां जिस फिल्म की चर्चा हो रही है वह गिरीश मलिक ने निर्देशित की है। ‘तोरबाज’ के मुनाफे में भी उनकी हिस्सेदारी है। फिल्म की शूटिंग तीन चार साल पहले जब शुरू हुई थी तो इसका बड़ा हल्ला था। किरगिस्तान के इलाके बिशकेक में शूट हुई ये पहली भारतीय फिल्म बनी। और भी तमाम सुर्खियां फिल्म समय समय पर बटोरती रही। लेकिन, अब दो घंटे 13 मिनट की ये फिल्म रिलीज हुई तो वो सारी बातें लोग भूल चुके हैं। थोड़ी हमदर्दी फिल्म में संजय दत्त को लेकर रहती है लेकिन फिल्म के क्लाइमेक्स में हीरो कोई और हो जाता है, ये फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है।

Torbaaz Movie Review by Pankaj Shukla Sanjay Dutt Girish Malik Rahul nargis fakhri Netflix india
तोरबाज - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में हीरो बनने के लिए खूब धक्के खाने के बाद गिरीश मलिक ने इस सदी की शुरूआत में बहुत ही जानदार फिल्म बनाई, ‘जल’। फिल्म चूंकि सामाजिक समस्याओं की बात करती है लिहाजा भारतीय दर्शकों ने इसे दिल से लगाया नहीं। उस फिल्म के बाद गिरीश को दूसरा मौका मिला था फिल्म ‘तोरबाज’ में कुछ कर दिखाने का। फिल्म की कहानी बेशक लाजवाब है। पृष्ठभूमि है शरणार्थियों के एक कैंप की। जहां आतंकवाद से तबाह परिवारों के बच्चे हैं। अपने अतीत से परेशान फौज का एक डॉक्टर यहां आता है और यहां के बच्चों में सुकून पाता है। उसका सपना इन बच्चों को लेकर एक क्रिकेट टीम बनाने का है। लेकिन, हर अच्छे काम में मुसीबतें तो आती ही हैं। यहां भी आती हैं। डॉक्टर क्रिकेट कोच बन जाता है। आतंकवादियों के सरगना को ये पसंद नहीं आता। उसका एक खास बच्चा जो एक इशारे पर खुद को उड़ाकर आसपास के लोगों को तबाह कर दे, वह क्रिकेट खिलाड़ी बन जाए, उसे मंजूर नहीं। बस, यहीं से फिल्म का तापमान बढ़ना शुरू होता है।

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तोरबाज - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

पूरी दुनिया इस समय आतंकवाद से जूझ रही है। आतंकवाद ने तमाम बड़े देशों के सामाजिक ताने बाने को बर्बाद कर दिया है। पड़ोस में रहने वालों को ही लोग अब शक की नजर से देखते हैं। फिल्म ‘तोरबाज’ में गिरीश मलिक ने बतौर लेखक एक बहुत ही संवेदनशील विषय को छुआ और इस पर काफी मेहनत से एक अच्छी कहानी भी लिखी। लेकिन, पटकथा लेखन और निर्देशन में वह मात खा गए। निर्देशक जब अपने निर्माता को सिर्फ इसलिए एक्टर बनाने को राजी हो जाए कि वह फिल्म में पैसा लगा रहा है तो उसकी मजबूरी समझी जा सकती है। निर्देशन विषय के प्रति समर्पण की कला है। यह समझौतों के बीच निखर नहीं सकती। गिरीश मलिक का दृष्टिकोण विशाल है, उतने विशाल निर्माता भी आगे चलकर उन्हें मिले तो वह विश्वसिनेमा में अपनी धमक छोड़ सकते हैं। लेकिन, यहां उनकी सोच पचास फीसदी भी पर्दे पर नहीं उतर पाई।

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Torbaaz Movie Review by Pankaj Shukla Sanjay Dutt Girish Malik Rahul nargis fakhri Netflix india
तोरबाज - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

अभिनय के लिहाज से ये फिल्म इसमें काम करने वाले बच्चों की फिल्म है। गिरीश मलिक ने इन बच्चों से जितना बेहतर काम लिया, उतना प्रभावशाली काम संजय दत्त और राहुल देव नहीं कर पाए हैं। संजय दत्त के चेहरे पर उम्र दिखने लगी हैं और वह लंबे सीन करने पर थके थके से भी दिखने लगते हैं। उनकी चिर परिचित ऊर्जा अब कैमरे के सामने नजर नहीं आती। राहुल देव को अब इस तरह के किरदारों से तौबा कर लेनी चाहिए। बार बार ऐसे किरदार करना उनकी आर्थिक मजबूरी हो सकती है लेकिन बतौर अभिनेता ऐसा करके वह अपने करियर पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। नरगिस फखरी को फिल्म में जिस काम के लिए रखा गया, वह उन्होंने बखूबी कर दिया, उससे ज्यादा की उनसे उम्मीद भी नहीं रही होगी।

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