भाजपा, कांग्रेस और सपा-बसपा गठबंधन लोकसभा चुनाव 2019 में अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क हैं। पार्टियों के रणनीतिकारों ने साफ लकीर खींच दी है कि किसी भी ऐसे प्रत्याशी को टिकट नहीं मिले, जिसकी छवि आम जनता के बीच खराब है। इस सख्ती ने चुनाव लड़ने को आतुर पूर्वांचल के करीब आधा दर्जन बाहुबलियों के सपने तोड़ दिए हैं। आइए जानते हैं किन-किन बाहुबलियों के अरमानों पर पानी फिर गया।
यूपी: बड़े दलों की बेरुखी से बाहुबलियों के सपने टूटे, अरमानों पर यूं फिरा पानी
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मुख्तार अंसारी
मुख्तार अपने बेटे अब्बास को बसपा से चुनाव लड़ाना चाहते थे। लेकिन बसपा अपने कोटे की घोसी सीट से अतुल राय और गाजीपुर से मुख्तार के बड़े भाई अफजाल अंसारी को प्रत्याशी घोषित कर चुकी है।
विजय मिश्रा
2012 में सपा और 2017 में भदोही से निर्बल इंडियन शोषित हमारा अपना दल (निषाद पार्टी) से विधायक हैं। भदोही सीट निषाद पार्टी के खाते में आती तो यहां से मैदान में उतरने की तैयारी में थे।
विनीत सिंह
बसपा एमलएसी रहे विनीत चंदौली से उतरने की तैयारी में थे। सीट सपा के खाते में गई तो विनीत सुभासपा, निषाद दल और भासपा से भी संपर्क में थे। लेकिन विनीत के समीकरण फेल हो गए।
अभय सिंह
सपा विधायक रहे अभय अकबरपुर से कमर कस रहे थे। सपा से ही टिकट की चाहत थी, लेकिन अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इनकार कर दिया। कुछ छोटे दलों को भी पकड़ा, पर बात नहीं बनी।