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'वो एक धार्मिक रूढ़िवादी, कट्टर उपदेशक थीं'

Sun, 04 Sep 2016 03:25 PM IST
सौतिक बिस्वास/बीबीसी
सौतिक बिस्वास/बीबीसी Updated Sun, 04 Sep 2016 03:25 PM IST
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mother teresa critics
- फोटो : BBC

कोलकाता में गरीबों के लिए काम करने वाली रोमन कैथोलिक नन मदर टेरेसा को रविवार को संत घोषित किया जा रहा है। इसके साथ ही उनके आलोचक इस बात पर तकरार करेंगे कि यह विज्ञान और तर्क पर आस्था की जीत है।



नोबेल पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा का निधन 87 साल की उम्र में 1997 में हुआ था। उन्होंने 1950 में मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की थी। इस संगठन से दुनिया भर में तीन हजार से ज्यादा नन जुड़ी हुई हैं। मदर टेरेसा ने कई आश्रम, गरीबों लिए किचन, स्कूल, कुष्ठ रोगियों की बस्तियां और अनाथ बच्चों के लिए घर बनवाए। शहर की गंदी बस्तियों में काम करने की वजह से उन्हें 'गटर की संत' (सेंट ऑफ गटर्स) भी कहा जाता था।

लेकिन इन सब के बावजूद भी उनके कई आलोचक भी रहे हैं। ब्रिटेन में जन्मे और स्वतंत्र विचारों के लेखक क्रिस्टोफर हिचेंस उन्हें कुछ इस तरह से बयां करते हैं, "वो एक धार्मिक रुढ़िवादी, एक राजनीतिक गुप्तचर, एक कट्टर उपदेशक और दुनिया भर की धर्मनिरपेक्ष ताकतों की साथी थीं।"

मिशनरीज ऑफ चैरिटी के प्रचार पुस्तिका पर बात करते हुए नन की आलोचना में हिचेंस इसे 'दु:ख का संप्रदाय' कहते हैं। वो आरोप लगाते हैं कि मदर टेरेसा ने गोद लिए हुए अपने शहर को नरक की तरह पेश किया और अधिनायकों से दोस्ती की। हिचेंस ने मदर टेरेसा को संदेह में खड़ा करते हुए एक डॉक्यूमेंट्री 'हेल्स एंगेल' भी बनाई है।

कई साल बाद 2003 में लंदन के स्थित डॉक्टर अरूप चटर्जी ने, मिशनरीज ऑफ चैरिटी से जुड़े 100 लोगों का इंटरव्यू करने के बाद, मदर टेरेसा की तीखी आलोचना करते हुए एक लेख प्रकाशित किया। उनके मुताबिक, उनके बनवाए घरों में बाकी चीजों के अलावा स्वच्छता के बदतर हालात, सीरिंज में एक ही सूई का बार-बार इस्तेमाल और देखभाल की घटिया व्यवस्था होती है।

आलोचना करने वाले कुछ और भी लोग हैं

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- फोटो : BBC
मदर टेरेसा की आलोचना करने वाले कुछ और भी लोग हैं। मियामी के हेमली गोंदालेथ ने साल 2008 में कोलकाता में गरीबों के लिए बनवाए गए टेरेसा के एक घर में दो महीने तक काम किया था। उनके मुताबिक, "मुझे यह देखकर हैरत हुई कि चैरिटी किस भयानक लापरवारी के साथ काम करता है। यह लोगों के मन में चैरिटी के काम को लेकर जो विचार था, उसके ठीक विपरीत था"।

गोंदालेथ ने मुझे बताया, "लोगों की देखभाल की ठोस योजना, उपकरणों को आधुनिक बनाना और मदद के लिए हजारों चीजों से कोसों दूर, मदर टेरेसा गरीबों की दोस्त नहीं, बल्कि गरीबी को बढ़ावा देने वाली थीं"। फिलहाल गोंदालेथ मदर टेरेसा की आलोचना करते हुए एक फेसबुक पेज चलाते हैं और दान दाताओं को, जिन्हें ज्यादा पता नहीं होता है, उन्हें इस संगठन की जानकारी देते हैं। हाल के वर्षों में सनल एदमारुकु जैसे भारतीय रेशनलिस्टों ने उन चमत्कारों पर सवाल उठाए हैं, जिनके लिए मदर टेरेसा को संत की उपाधि दी गई।

उनके मुताबिक, "वेटिकन की नजर में एक संत बनने के लिए, किसी चमत्कार को, किसी की मौत के बाद उनके लिए की जाने वाली प्रार्थना से जोड़ दें। असल में किसी घटना को चमत्कार मानने से पहले, सबूतों के साथ उन घटनाओं की जांच की जानी चाहिए। अक्सर यह सब बीमारियों के ठीक होने की ऐसी घटनाएं होती हैं, जिनकी कोई चिकित्सीय व्याख्या नहीं की जा सकती"।

मदर टेरेसा की मौत के पांच साल बाद पोप जॉन पॉल द्वितीय ने उनके एक चमत्कार को स्वीकार किया था। एक बंगाली आदिवासी महिला मोनिका बेसरा को पेट का अल्सर था, जो ठीक हो गया। कहा गया कि यह मदर टेरेसा के अलौकिक ताकत की वजह से हुआ। इसी घटना की वजह से टेरेसा को 2003 में 'धन्य' (बिटिफिकेशन) घोषित किया गया। उसके बाद पोप फ्रांसिस ने 2015 में उनके दूसरे चमत्कार को अपनी स्वीकृति दी, जब साल 2008 में ब्राजील के एक आदमी का ब्रेन ट्यूमर ठीक हो गया।
 

सवाल उठाते हैं, तो आपको गरीब विरोधी माना जाएगा

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- फोटो : MEA
सनल एदमारुकु टेरेसा के पहले चमत्कार पर कहते हैं कि किसी महिला के पेट पर किसी नन की तस्वीर रख देने से वो ठीक कैसे हो सकती है, जबकि सबूत यह दिखा रहे थे कि उनका इलाज दवाओं से हुआ है। वो कहते हैं, "ज्यादातर लोग मदर टेरेसा का विरोध नहीं करना चाहते, क्योंकि उनकी छवि गरीबों के लिए काम करने वालों की है।

अगर आप मदर टेरेसा पर सवाल उठाते हैं, तो आपको गरीब विरोधी माना जाएगा। मेरे मन में उनके खिलाफ कुछ भी नहीं है, लेकिन किसी चमत्कार को बेचना अवैज्ञानिक सोच है।" इस मुद्दे पर अरूप चटर्जी उत्तेजित होकर कहते हैं, "ये कथित चमत्कार बहुत बेकार और बचकानी बात है और इसे तो चुनौती भी दी जा सकती है।"

इस मसले पर ताजा चुनौती जागरूक लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक ग्रुप ने पेश की है। इन लोगों ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से वैटिकन में रविवार को होने वाले मदर टेरेसा के उपाधि समारोह में शामिल होने के फैसले पर फिर से विचार करने का आग्रह किया है।

इस याचिका में कहा गया है, "जिस देश का संविधान अपने नागरिकों से वैज्ञानिक सोच रखने को कहता है, उसकी विदेश मंत्री का चमत्कारों के आधार पर मिली किसी उपाधि समारोह में जाना, उनकी बुद्धि पर संदेह पैदा करता है।" लेकिन अंत में समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन कहते हैं, "सबूत और आस्था अलग अलग चीजें हैं।"

वो कहते हैं, "कई तरह के सवाल अब भी मौजूद हैं। हम में से कई लोगों में विज्ञान के इतिहास और इसके दर्शन की समझ नहीं होती है। ईसाइत का भी विज्ञान के साथ लंबी लड़ाई का इतिहास है। तर्कवादी भी कभी-कभी अति कर देते हैं और हर समय सबूत मांगने लगते हैं"। साफ है कि जूरी अब भी गटर की इस संत पर खामोश है, इसलिए हमारे पास कोई जवाब नहीं है।
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