UP: जहां सीखा था राजनीति का ककहरा, अब वहीं की सियासी पिच पर हुई एंट्री; विनोद तावड़े की कहानी कितनी दिलचस्प?
जहां विनोद तावड़े ने 80 के दशक में विद्यार्थी परिषद के जरिए राजनीति का ककहरा सीखा, करीब तीन दशक बाद अब वहीं उन्हें भाजपा ने बड़ी जिम्मेदारी दी है। गोरखपुर, जौनपुर, बलिया और वाराणसी जैसे इलाकों में संगठन का काम कर चुके तावड़े अब उत्तर प्रदेश की सियासी पिच पर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले लौटे हैं। लेकिन सवाल है कि पुराने अनुभव के साथ उनकी नई पारी कितनी सफल होगी? क्या है उनका कहानी और उनका इतिहास? आइए, विस्तार से जानते हैं...
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विस्तार
भाजपा के महामंत्री और राज्यसभा सदस्य विनोद तावड़े की उत्तर प्रदेश में नई भूमिका इसलिए खास है, क्योंकि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में इसी प्रदेश में संगठन का काम सीखा था। 80 के दशक में वह पूर्वी उत्तर प्रदेश में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रभारी रहे। अब करीब तीन दशक बाद उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रभारी के रूप में उनकी वापसी हुई है। उनके सामने 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को लगातार तीसरी बार सत्ता में पहुंचाने की बड़ी जिम्मेदारी है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में तावड़े ने क्या काम किया था?
तावड़े उस दौर में गोरखपुर, जौनपुर, बलिया और वाराणसी समेत एक दर्जन से अधिक जिलों में विद्यार्थी परिषद का काम देखते थे। उन्होंने कई छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया। इसी दौरान संगठन के स्तर पर उनकी पहचान एक संघर्षशील युवा नेता के रूप में बनी। उत्तर प्रदेश में शुरुआती संगठनात्मक अनुभव ने उनके राजनीतिक सफर को मजबूत आधार दिया और आगे चलकर उन्होंने भाजपा में बड़ी जिम्मेदारियां संभालीं।
महाराष्ट्र में तावड़े का राजनीतिक सफर कैसे आगे बढ़ा?
मराठा समुदाय से आने वाले तावड़े 90 के दशक में महाराष्ट्र की राजनीति में सक्रिय हुए। 1995 में उन्हें महाराष्ट्र प्रदेश भाजपा का महासचिव बनाया गया। इसके बाद 1999 में वह मुंबई भाजपा के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने। 2014 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और भाजपा सरकार में 2014 से 2019 तक कैबिनेट मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने राज्य की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।
2019 में टिकट कटने के बाद क्या बदला?
2019 के विधानसभा चुनाव में मुंबई के पश्चिमी उपनगर की बोरिवली सीट से तावड़े का टिकट कट गया। इसके बाद उन्होंने चुनावी राजनीति से दूरी बनाकर संगठन के काम को अपनी ताकत बनाया। उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू की चुनाव प्रबंधन समिति के सह संयोजक के रूप में जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद हरियाणा और बिहार भाजपा प्रभारी के रूप में भी उन्होंने संगठन और चुनाव प्रबंधन का अनुभव हासिल किया।
राष्ट्रीय राजनीति में कैसे मजबूत हुई भूमिका?
तावड़े ने विद्यार्थी परिषद से शुरू हुए अपने सफर में धीरे-धीरे भाजपा के राष्ट्रीय संगठन तक जगह बनाई। वह भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बने और अलग-अलग राज्यों में पार्टी संगठन की जिम्मेदारियां संभालीं। हरियाणा और बिहार में प्रभारी के रूप में काम करने के बाद अब उन्हें उत्तर प्रदेश जैसी बड़ी राजनीतिक जमीन की जिम्मेदारी मिली है। उत्तर प्रदेश में संगठन, सामाजिक समीकरण और चुनावी प्रबंधन की उनकी क्षमता की बड़ी परीक्षा होगी।
2027 में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव तावड़े के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है। भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में लाने के लिए संगठन को मजबूत रखना, चुनावी रणनीति को जमीन तक पहुंचाना और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच पार्टी की पकड़ बनाए रखना उनके सामने प्रमुख चुनौती होगी। हालांकि, उत्तर प्रदेश में उनके पुराने संगठनात्मक अनुभव को इस जिम्मेदारी में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब देखना होगा कि दशकों पहले सीखा संगठन का ककहरा वह मौजूदा राजनीतिक माहौल में कितनी प्रभावी तरह से इस्तेमाल कर पाते हैं।