दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर नकदी मिलने के मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को रिपोर्ट सौंप दी है। न्यायमूर्ति उपाध्याय ने घटना के संबंध में साक्ष्य और जानकारी एकत्र करने के लिए आंतरिक जांच प्रक्रिया शुरू की थी और शुक्रवार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम रिपोर्ट की जांच करेगा और आगे की कार्रवाई शुरू करेगा।
Justice Yashwant Verma: क्यों विवादों में जस्टिस यशवंत वर्मा? HC के मुख्य न्यायाधीश ने CJI को सौंपी रिपोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, जस्टिस यशवंत वर्मा (56) ने 8 अगस्त 1992 को वकील के रूप में नामांकन कराया था। 13 अक्तूबर 2014 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। 2016 में स्थायी न्यायाधीश बने।
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हाईकोर्ट में नहीं की सुनवाई
मुद्दा दिल्ली हाईकोर्ट में भी उठा। मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय ने दुख जताया। जस्टिस वर्मा ने हाईकोर्ट में शुक्रवार को कोई सुनवाई नहीं की।
अक्तूबर 2021 में इलाहाबाद से दिल्ली हाईकोर्ट आए थे
दिल्ली हाईकोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, जस्टिस यशवंत वर्मा (56) ने 8 अगस्त 1992 को वकील के रूप में नामांकन कराया था। 13 अक्तूबर 2014 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। 2016 में स्थायी न्यायाधीश बने।
- 11 अक्तूबर 2021 को दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचे।
- जस्टिस वर्मा वर्तमान में बिक्री कर, जीएसटी, कंपनी अपील और मूल पक्ष की अन्य अपीलों के मामलों से निपटने वाली खंडपीठ का नेतृत्व कर रहे हैं।
- वह 2006 से अपनी पदोन्नति तक इलाहाबाद हाईकोर्ट में विशेष वकील रहे। 2012 से अगस्त 2013 तक यूपी सरकार के मुख्य स्थायी वकील रहे।
ऐसे हटाए जा सकते हैं हाईकोर्ट के जज
- 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार व अनियमितताओं के मामलों से निपटने के लिए दिशा-निर्देश तय किए थे, जिसके तहत-
- सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आंतरिक जांच के बाद संबंधित न्यायाधीश से जवाब मांगेंगे। जवाब संतोषजनक न होने या आगे जांच की जरूरत होने पर सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की समिति बनाई जाएगी।
- समिति की रिपोर्ट में गंभीर अनियमितताएं पाए जाने पर मुख्य न्यायाधीश संबंधित जज को इस्तीफा देने के लिए कह सकते हैं।
- न्यायाधीश के इस्तीफा देने से इन्कार करने पर मुख्य न्यायाधीश सरकार को पत्र लिखकर अनुच्छेद 124(4) के तहत संसद में महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू करने के लिए कह सकते हैं।
महाभियोग से अब तक किसी जज को नहीं हटाया गया
देश के इतिहास में किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग के जरिये नहीं हटाया गया है। कुछ न्यायाधीशों को महाभियोग की कार्यवाही का सामना करना पड़ा लेकिन इसके पूरी होने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
उन्नाव दुष्कर्म मामले की भी कर रहे सुनवाई
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा, जज साहब के घर से इतनी भारी नकदी की बरामदगी का मामला बेहद संगीन है, तबादले मात्र से इसे रफा-दफा नहीं किया जा सकता। जस्टिस वर्मा उन्नाव दुष्कर्म मामले सहित कई गंभीर मामलों की सुनवाई कर रहे थे। न्यायपालिका में देश का विश्वास बनाए रखने के लिए ये पता लगाया जाना जरूरी है कि ये पैसा किसका है और जज साहब को क्यों दिया गया। न्याय की देवी की आंखों से पट्टी हटाते हुए एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि कानून अंधा नहीं है, ये सबको बराबरी की नजर से देखता है। इस मामले में यह बात साबित भी होनी चाहिए।
तबादला कोई समाधान नहीं, इस्तीफा देने को कहा जाना चाहिए : कानूनी विशेषज्ञ
कानूनी विशेषज्ञों ने जस्टिस यशवंत वर्मा के कथित स्थानांतरण पर कॉलेजियम के फैसले पर सवाल उठाए और उनके इस्तीफे की मांग की।
मामला बेहद गंभीर
वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने मामले को बहुत गंभीर बताया और कहा कि न्यायाधीश को इस्तीफा देने के लिए कहा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश से पूरी तरह से निष्पक्ष होने की उम्मीद की जाती है। यह एक ऐसा पेशा है, जहां शून्य सहनशीलता होनी चाहिए। मुझे लगता है कि ऐसे मामले में तबादला कोई समाधान नहीं है।
खुद स्पष्टीकरण दें जज
वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को आंतरिक जांच करानी चाहिए और न्यायाधीश को अपनी बात कहने का अवसर देकर सभी तथ्यों का पता लगाना चाहिए। वैसे भी जज की अच्छी प्रतिष्ठा है, इसलिए उन्हें नकदी के बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए। यह ऐसा मामला नहीं है जिसे दबा दिया जाए।
कॉलेजियम पूरी जानकारी दे : इंदिरा जयसिंह
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि आश्चर्यजनक है कि 14 मार्च को हुई घटना की जानकारी 21 मार्च को सामने आई। इसलिए, कॉलेजियम के काम करने के तरीके पर सवाल उठ रहे हैं। कॉलेजियम पर दायित्व है कि जब मामले के तथ्य संज्ञान में आएं तो उनका पूर्ण, स्वतंत्र और स्पष्ट खुलासा करे। वहीं, अधूरी जानकारी के आधार पर न्यायाधीश की आलोचना करना उचित नहीं है।
देखना होगा, कॉलेजियम क्या फैसला लेता है
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि जो रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से सामने आई है, अगर वह सही है तो यह बहुत गंभीर मामला है। रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मामले का संज्ञान लिया है। इसलिए हमें इंतजार करना चाहिए और देखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम इस मामले में क्या फैसला लेता है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने की जरूरत
न्यायपालिका के अंदर भ्रष्टाचार का मुद्दा बहुत गंभीर है। वरिष्ठ वकीलों ने इसे कई बार उठाया है। अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर विचार करे। न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है।
- कपिल सिब्बल, राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील
महाभियोग की सिफारिश होनी चाहिए थी : पूर्व जस्टिस ढींगरा
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसएन ढींगरा ने कहा कि जब हाईकोर्ट के न्यायाधीश के घर से धनराशि बरामद हुई थी तो सुप्रीम कोर्ट को धनराशि का खुलासा करना चाहिए था और एफआईआर का आदेश देना चाहिए था। धन के स्रोत का पता लगाने के लिए आंतरिक जांच का आदेश देना चाहिए था। उन्होंने कहा कि इसके बाद संसद से महाभियोग की कार्यवाही की सिफारिश की जानी चाहिए थी। यह सही कदम होना चाहिए था। स्थानांतरण समाधान नहीं है।
इन पर भी लग चुके हैं आरोप
नकदी से जुड़े हालिया मामलों में, पंजाब हाईकोर्ट की न्यायाधीश निर्मल यादव पर बैग में करोड़ों रुपये की नकदी मामले में आरोप लगाया गया था। दिल्ली की एक अदालत की न्यायाधीश रचना तिवारी लखनपाल रिश्वतखोरी के मामले में निलंबित हैं। सीबीआई ने उनके घर से बेहिसाब नकदी बरामद होने का आरोप लगाया है।