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Cyclospora Outbreak: साइक्लोस्पोरा संक्रमण ने बढ़ाई टेंशन, मरीजों को हो रही ये दिक्कतें: कैसे रहें सुरक्षित?

Thu, 16 Jul 2026 05:33 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Thu, 16 Jul 2026 05:33 PM IST
सार

अमेरिका में साइक्लोस्पोरा संक्रमण के मामले सामने आने के बाद इसको लेकर लोगों में कई तरह का डर देखा जा रहा है। जानिए क्या है यह फूडबोर्न पैरासाइट और इसके लक्षण? इस खतरे को कैसे कम किया जा सकता है?

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साइक्लोस्पोरा संक्रमण को लेकर अलर्ट - फोटो : Amarujala.com/AI

देश में मानसून की शुरुआत के साथ दूषित जल और भोजन के कारण होने वाली बीमारियों को लेकर लोगों को अलर्ट किया जा रहा है। बारिश के दिनों फूड पॉइजनिंग का खतरा काफी बढ़ जाता है, जिससे गंभीर उल्टी-दस्त और डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है। इसके लिए साल्मोनेला, ई. कोलाई और लिस्टेरिया जैसे रोगाणुओं को प्रमुख कारण माना जाता है। गंभीर स्थितियों में रोगियों को अस्पताल में भर्ती होने तक की जरूरत हो सकती है।



इन्हीं लक्षणों के साथ अमेरिका में इन दिनों साइक्लोस्पोरा परजीवी के कारण होने वाली साइक्लोस्पोरियासिस बीमारी का मामला बढ़ता देखा जा रहा है। ये मुख्य रूप से छोटी आंत का संक्रमण है जो पेट में ऐंठन और मतली के साथ गंभीर दस्त का कारण बनता है। फूड पॉइजनिंग की ही तरह ये भी दूषित भोजन और पानी के कारण होने वाला संक्रमण है। खबरों के मुताबिक अब तक करीब 3000 लोग इसका शिकार हो गए हैं, जिसके कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर भी लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है। 

साइक्लोस्पोरियासिस कितना खतरनाक है और इससे बचाव के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं, आइए इस बारे में समझ लेते हैं।

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साइक्लोस्पोरा का बढ़ता खतरा - फोटो : Adobe Stock Photos

फूड पॉइजनिंग जैसे लक्षणों वाली बीमारी साइक्लोस्पोरियासिस 

अमेरिका में साइक्लोस्पोरा नामक फूडबोर्न पैरासाइट संक्रमण ने स्वास्थ्य अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है। यह संक्रमण किसी वायरस या बैक्टीरिया से नहीं बल्कि साइक्लोस्पोरा कैटेनेन्सिस नाम के सूक्ष्म परजीवी से होता है। आमतौर पर यह संक्रमण दूषित सब्जियों, फलों और संक्रमित पानी के जरिए फैलता है। गर्मियों और बरसात के मौसम में इसके मामले बढ़ने की आशंका अधिक रहती है।
 

  • साइक्लोस्पोरा संक्रमण की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण सामान्य फूड पॉइजनिंग जैसे ही दिखाई देते हैं। लगातार कई दिनों तक पानी जैसे दस्त, पेट में ऐंठन, मतली और कमजोरी होने पर लोग इसे सामान्य संक्रमण समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। 
  • समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी कई सप्ताह तक बनी रह सकती है। 
  • कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और क्रॉनिक बीमारी वाले मरीजों में इसके कारण डिहाइड्रेशन के कारण खतरा अधिक हो सकता है।
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संक्रमण के कारण होने वाली दिक्कतें - फोटो : Freepik.com

कैसे करें साइक्लोस्पोरा संक्रमण की पहचान?

साइक्लोस्पोरा संक्रमण के कारण पानी जैसे दस्त होना सबसे आम है। संक्रमण होने के लगभग 2 से 14 दिन बाद लक्षण दिखाई देना शुरू हो सकते हैं। कई मरीजों में दस्त कई सप्ताह तक आते-जाते रहते हैं। कुछ लोगों में इलाज न मिलने पर लक्षण एक महीने या उससे भी अधिक समय तक बने रह सकते हैं।
 

  • इसके अलावा पेट में ऐंठन, पेट दर्द, गैस, अत्यधिक थकान, कमजोरी, मतली-उल्टी, भूख कम लगना, वजन घटने और हल्का बुखार भी हो सकता है। 
  • बार-बार दस्त होने से शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाती है, जिससे डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। 
  • बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों में यह स्थिति अधिक गंभीर हो सकती है।
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आहार पर दें ध्यान - फोटो : Freepik.com

साइक्लोस्पोरियासिस से बचाव कैसे करें?

साइक्लोस्पोरा संक्रमण से बचाव के लिए साफ भोजन और स्वच्छ पानी का उपयोग सबसे जरूरी है। 
 

  • फल और सब्जियों को खाने से पहले बहते साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए।
  • हाथों की स्वच्छता भी बेहद महत्वपूर्ण है। खाना बनाने, खाने और शौचालय के बाद साबुन और पानी से कम से कम 20 सेकंड तक हाथ धोना संक्रमण के जोखिम को कम करता है। 


गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ सलहाब कहते हैं, भोजन को अच्छी तरह से पकाना रोगाणुओं को खत्म करने का सबसे भरोसेमंद तरीका है। संक्रमण के दौर में फ्रोजजन या डिब्बाबंद खाना सुरक्षित हो सकता है। डॉ. सलहाब कहते हैं, अगर आपके शहर पर इस संक्रमण का प्रकोप है और आप संक्रमित हो जाते हैं तो इसके लक्षणों पर ध्यान दें। भरपूर मात्रा में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स लेते रहना जरूरी है।




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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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