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Holi Health Alert: रंग-गुलाल की मस्ती कहीं अस्थमा अटैक का न बढ़ा दे खतरा? सांस के मरीज किन बातों का रखें ध्यान

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Tue, 03 Mar 2026 05:37 PM IST
सार

Holi me Asthma Attack Se Kaise Bache: सांस की बीमारी-अस्थमा के मरीजों को होली के उत्सव के दौरान विशेष सतर्कता बरतने की आवश्यकता होती है। रंगों में लेड-मेटल और रसायन हो सकते हैं जो श्वास नली में दिक्कतें बढ़ा देते हैं। आइए जानते हैं कि अस्थमा अटैक से कैसे बचा जा सकता है?

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होली के दौरान सांसों की समस्या - फोटो : Adobe Stock

देशभर में होली की धूम देखी जा रही है। मिठाइयों-पकवान, धूमधाम-आनंद वाला ये त्योहार कई मामलों में खास होता है। होली में लोग एक दूसरे से गले मिलते हैं, पकवान खिलाते हैं और रंग-गुलाल लगाकर त्योहार की खुशियां मनाते हैं।



ये त्योहार जितने उमंग और उत्साह से भरा होता है, हमें इस दौरान सेहत को लेकर भी उतनी ही सावधानी बरतते रहने की जरूरत होती है। आपकी थोड़ी सी भी लापरवाही रंग में भंग डालने वाली हो सकती है।

अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया कि किस तरह से होली के दौरान खान-पान में गड़बड़ी डायबिटीज के मरीजों के लिए दिक्कतें बढ़ाने वाली हो सकती है? इतना ही नहीं जिन लोगों को पहले से सांसों से संबंधित दिक्कतें हैं उन्हें भी होली खेलते समय सावधानी से रंग-गुलाल का इस्तेमाल करना चाहिए। रंगों को लेकर बरती गई असावधानियां सांस की दिक्कतों-अस्थमा को ट्रिगर करने वाली हो सकती है।

तो फिर सांस के मरीजों को होली उत्सव के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? आइए इस बारे में विशेषज्ञ से जान लेते हैं।

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होली के रंग और गुलाल से हो सकता है अस्थमा अटैक - फोटो : Adobe

होली में बढ़ सकती हैं सांस की दिक्कतें

होली के दौरान अस्थमा अटैक के खतरे को कम करने, सांस की समस्याओं से बचे रहने के लिए श्वसन रोग विशेषज्ञ डॉ रितु आचार्य ने कुछ जरूर सलाह दी हैं जिसके बारे में सभी लोगों को जानना जरूरी है।

डॉक्टर कहती हैं, हवा में उड़ते सूखे रंग, कैमिकल युक्त गुलाल, धूल और धुआं सांस के मरीजों के लिए परेशानी बढ़ा सकते हैं। खासतौर पर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एलर्जिक राइनाइटिस या क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) से पीड़ित मरीजों को इसके कारण सांस फूलने, सीने में जकड़न और अस्थमा अटैक का खतरा बढ़ सकता है।


रंग-गुलाल की सावधानी से करें इस्तेमाल

जिन लोगों को पहले से सांस की बीमारी है उन्हें होली के उत्सव के दौरान विशेष सतर्कता बरतने की आवश्यकता होती है।
 

  • सूखे गुलाल-रंग हवा की गुणवत्ता को खराब कर देते हैं, जिससे सांस की दिक्कत बढ़ सकती है।
  • आमतौर पर बाजार में बिकने वाले रंगों में लेड-मेटल और रसायन हो सकते हैं जो श्वास नली में दिक्कतें बढ़ा देते हैं।
  • महीन कण सांस के रास्ते फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं और  वायुमार्ग में सूजन और संकुचन पैदा कर सकता है।
  • इससे सीटी जैसी आवाज, खांसी और सांस लेने में कठिनाई हो सकती है। 
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सांस की समस्या और अस्थमा अटैक का खतरा - फोटो : Adobe Stock

होली के दौरान क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

डॉक्टर कहते हैं, ड्राई कलर और सिंथेटिक गुलाल के संपर्क में आने से श्वसन नलिकाओं में सूजन की समस्या बढ़ सकती हैं, जिससे घरघराहट, खांसी और सांस फूलने की समस्या हो सकती है। अस्थमा रोगियों को होली से पहले अपनी दवाएं नियमित रूप से लेनी चाहिए और डॉक्टर द्वारा बताए गए इनहेलर को साथ रखना चाहिए। 

डॉ. रितु कहती हैं, अस्थमा मरीजों के लिए बचाव ही सबसे बड़ा इलाज है। सूखे रंगों और केमिकल वाले गुलाल से दूरी बनाना चाहिए, क्योंकि ये कण फेफड़ों में जाकर एलर्जिक रिएक्शन बढ़ा सकते हैं।
 

  • भीड़भाड़ और धूलभरे माहौल से बचना बेहतर है। अगर बाहर जाना जरूरी हो तो मास्क पहनकर जाएं।
  • घर लौटकर तुरंत स्नान करें और कपड़े बदलें, ताकि त्वचा और श्वसन मार्ग पर जमे कण हट जाएं। 
  • पर्याप्त पानी पिएं ताकि डिहाइड्रेशन न होने पाए। इस वजह से भी सांस की दिक्कतें बढ़ सकती हैं।
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सांस की दिक्कत होने पर क्या करें? - फोटो : Freepik.com

अस्थमा अटैक होने पर तुरंत क्या करें?

होली के दौरान अगर किसी को अस्थमा अटैक हो जाए या सांस लेने में तकलीफ हो रही हो तो तुरंत उपचार उपलब्ध कराना जरूरी है।
 

  • अस्थमा अटैक के दौरान मरीजों को अचानक सांस लेने में कठिनाई, सीने में जकड़न, तेज घरघराहट और लगातार खांसी होती है, ऐसे लक्षणों की पहचान करें। 
  • सांस की दिक्कतों में इनहेलर का प्रयोग करें जिससे दिक्कतों को बढ़ने से रोका जा सके।
  • मरीज को सीधा बैठाकर रखें, टाइट कपड़े ढीले करें और ताजी हवा वाली जगह पर ले जाएं।
  • यदि इनहेलर लेने के बाद भी 10–15 मिनट में राहत न मिले, बोलने में दिक्कत हो या होंठ नीले पड़ रहे हों तो तुरंत डॉक्टर के पास लें जाएं।





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नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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