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Hearing loss: क्या ठीक हो सकता है बहरापन? जानिए सुनने की क्षमता में कमी के कारण और इसे सुधारने के तरीके

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Sun, 01 Mar 2026 08:01 PM IST
सार

World Hearing Day 2026: लाइफस्टाइल और खान-पान की गड़बड़ी ने कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं के खतरे को बढ़ा दिया है। इसका असर कानों की सेहत पर भी देखा जा रहा है। ईयरफोन के बढ़ते इस्तेमाल के कारण बहरेपन का खतरा हो सकता है। क्या बहरेपन को फिर से ठीक किया जा सकता है?

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युवाओं में बढ़ती बहरेपन की समस्या - फोटो : Adobe stock photos

उम्र बढ़ने के साथ शरीर के जिन अंगों पर सबसे ज्यादा असर होता है, कान उनमें से एक हैं। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है, हमारे सुनने की क्षमता भी कम होती जाती है। पर कानों से संबंधित इस दिक्कत को अब सिर्फ उम्र बढ़ने से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। कम उम्र में, यहां तक कि बच्चों में भी कम सुनाई देने और बहरेपन की दिक्कत बढ़ती जा रही है।



लंबे समय तक तेज आवाज में गाने सुनने, कान में संक्रमण, ज्यादा वैक्स जमा होना, सिर या कान में चोट और कुछ दवाओं के साइड-इफेक्ट के कारण आपके सुनने की शक्ति कमजोर हो सकती है। समय रहते इसपर ध्यान न दिया जाए तो बहरापन भी हो सकता है। अमर उजाला में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट में हमने बताया था कि किस तरह से हाई शुगर की समस्या भी आपमें बहरेपन के खतरे को बढ़ाने वाली हो सकती है।

क्या एक बार बहरापन हो जाने के बाद फिर से कानों की सुनने की शक्ति वापस आ सकती है? क्या बहरेपन को ठीक किया जा सकता है? आइए इस बारे में समझते हैं।

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कम सुनाई देने की समस्या - फोटो : Adobe Stock Images

बहरेपन का क्या कारण है?

सुनने की क्षमता में कमी और दुनियाभर में बढ़ते बहरेपन के खतरे को कम करने को लेकर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 3 मार्च को वर्ल्ड हियरिंग डे मनाया जाता है। कई मामलों को जल्दी पता लगने, सही देखभाल और सुनने की सुरक्षित आदतों को अपनाने से हमेशा के लिए होने वाले बहरेपन के खतरे को कम किया जा सकता है।

बहरेपन को ठीक किया जा सकता है या नहीं? इस बारे में जानने से पहले ये जान लेना जरूरी हो जाता है कि आखिर बहरेपन की वजह क्या-क्या हैं?
 

  • उम्र बढ़ने के साथ कान के अंदर के हिस्से का धीरे-धीरे खराब होने लगते हैं और रक्त संचार कम हो जाता है जिससे सुनने की समस्या हो सकती है।
  • लंबे समय तक तेज आवाज जैसे डीजे, अचानक धमाके से कान के अंदर की नाजुक कोशिकाओं को नुकसान होता है।
  • कान के इंफेक्शन, खसरा भी सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
  • कुछ लोगों में जन्मजात और जेनेटिक कारणों से भी कम सुनाई देने की समस्या हो सकती है।
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बहरेपन का खतरा - फोटो : Freepik.com

कम सुनाई देने से बढ़ जाती हैं कई दिक्कतें

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में डेढ़ अरब से ज्यादा लोगों को कम सुनाई देने या कानों की क्षमता में कमी की समस्या हो सकती है।

कान की सामान्य समस्या का समय रहते इलाज न किया जाए तो यह स्थायी बहरेपन में बदल सकती है। 
 

  • कम सुनाई देने का मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है।
  • लंबे समय तक कम सुनाई देने या बहरेपन के शिकार लोगों में डिप्रेशन का खतरा हो सकता है।
  • लगातार 85 डेसिबल से अधिक तेज आवाज कान के अंदरूनी हिस्से को नुकसान होता है और ये बहरेपन का खतरा बढ़ाने वाली हो सकती है।
  • मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां भी जोखिम बढ़ाती हैं।
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कम सुनाई देने की समस्या - फोटो : Freepik.com

क्या बहरेपन को ठीक किया जा सकता है?

अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि क्या एक बार बहरपन हो जाए तो इसे ठीक किया जा सकता है?
 

  • डॉक्टर कहते हैं, यदि बहरेपन स्थाई नहीं है और ये समस्या कान में वैक्स जमा होने या संक्रमण के कारण है तो दवाओं से सुनने की क्षमता वापस आ सकती है। 
  • यदि कान की  अंदरूनी  कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं तो इसे पूरी तरह ठीक करना संभव नहीं होता। 
  • ऐसे मामलों में हियरिंग एड जैसे उपकरण मददगार साबित होते हैं। 
  • नवजात शिशुओं की सुनने की समस्या या बहरेपन का पता जल्दी चल जाए तो कुछ कुछ स्थितियों में इसे ठीक किया जा सकता है।
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बहरेपन को ठीक करने वाली दवा - फोटो : Adobe stock

एक इंजेक्शन से लौट सकती है सुनने की क्षमता

साल 2025 में एक इंजेक्शन को लेकर खूब चर्चा हुई थी। स्वीडन स्थित कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने बताया कि जीन थेरेपी से जन्मजात बहरेपन या सुनने में गंभीर कमी वाले बच्चों की समस्या ठीक हो सकती है। नेचर मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट में पाया गया कि एक इंजेक्शन की मदद से मरीजों की सुनने की क्षमता में सुधार हुआ।

इस अध्ययन में चीन के पांच अस्पतालों के 1 से 24 साल के दस मरीज शामिल थे। इन सभी को OTOF नाम के जीन में म्यूटेशन की वजह से जेनेटिक रूप से बहरापन या सुनने में गंभीर दिक्कत थी। इन म्यूटेशन की वजह से प्रोटीन ओटोफर्लिन की कमी हो जाती है, जो कान से दिमाग तक सुनने के सिग्नल भेजने में जरूरी भूमिका निभाता है। थेरेपी के माध्मय से इन लोगों की सुनने की शक्ति में सुधार देखा गया था। हालांकि इसका बड़े स्तर पर ट्रायल होने बाकी हैं।





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नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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