करीब एक दशक पहले तक हृदय रोगों को उम्र बढ़ने के साथ होने वाली समस्या के तौर पर जाना जाता था, हालांकि अब कम उम्र के लोग भी इसके शिकार पाए जा रहे हैं। कार्डियोवस्कुलर रोग (सीवीडी) दुनियाभर में बढ़ती मृत्युदर का प्रमुख कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दुनियाभर में हृदय की बीमारियों से होने वाली युवाओं की मौत में अकेले भारत से 20 फीसदी मामले सामने आते हैं।
बड़ी कामयाबी: आपमें हृदय रोगों का जोखिम है या नहीं? इस टेस्ट से आसानी से कर सकेंगे पता, जानिए विस्तार से
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हृदय रोगों के खतरे की जांच
नेक्सट जेनरेशन सीक्वेसिंग के आविष्कार के साथ अब रोगी के जीन्स में होने वाले बदलाव की जांच के लिए पूरी जेनेटिक सीक्वेसिंग की जा सकती है। इस तकनीक से सीवीडी जैसी आम तौर पर होने वाली बीमारियों का जेनेटिक आधार समझने में मदद मिलती है। सीवीडी जैसे रोग, अपनी प्रकृति के अनुसार पॉलिजेनिक (कई जीन्स) का नतीजा होते हैं। इसकी जांच के लिए पॉलिजेनिक रिस्क स्कोर (पीआरएस) का तरीका अपनाकर किसी खास रोग के लिए किसी व्यक्ति के जेनेटिक जोखिम का पता लगाया जाता है। यानि कि अब इस बात का अंदाजा लगाया जा सकेगा कि आपमें आनुवांशिक तौर पर हृदय रोगों का खतरा कितना है?
पॉलिजेनिक रिस्क स्कोर क्या होता है?
पॉलिजेनिक रिस्क स्कोर मानव जीनोम में कई बदलाव को एकीकृत करता है। इसमें उन लोगों का पता लगाने की क्षमता होती है, जिसमें हृदय रोग जैसी बीमारियों के पनपने का खतरा होता है। हाल ही में कई केंद्रों पर की गई स्टडी से यह पता चला है कि दक्षिण एशियाई लोगों में कोरोनरी धमनी के रोगों का खतरा काफी होता है। इसमें शोधकर्ताओं ने पाया कि अन्य देशों की तुलना में भारतीय लोगों में हृदय और रक्त की धमनियों से संबंधित रोग होने की आशंका तीन गुना ज्यादा होती है।
कार्डियोजेन टेस्ट से पता चलेगा हृदय रोगों का खतरा
मेडजेनोम के जीन्ससेंस द्वारा जारी कार्डियोजेन टेस्ट व्यक्ति को भविष्य में होने वाले हृदय संबंधी रोगों के लिए जीन्स के जोखिम का पता लगाने वाला टेस्ट है। डॉ. वेदम रामप्रसाद (वैज्ञानिक और सीईओ, मेड जीनोम लैब) बताते हैं, यह किसी मनुष्य के डीएनए में 6 मिलियन से ज्यादा साइट्स को एकीकृत करता है और उसे यह बताता है कि उसे दिल के दौरों का खतरा कितना है?
इसे कार्डियोजेन रिस्क स्कोर (केआरएस) कहा जाता है, जिससे 90 फीसदी की सटीकता के साथ हृदय संबंधी रोग होने के खतरे की भविष्यवाणी की जा सकती है। केआरएस के आधार पर यह पहचाना जा सकता है कि भविष्य में किस व्यक्ति को दिल के दौरे पड़ने की ज्यादा आशंका है, किसे हल्के दौरे पड़ने और किसे इसकी औसत आशंका है।
पहले ही जान सकेंगे अपना जोखिम
विशेषज्ञों का कहना है कि इस परीक्षण के आधार पर अपने जोखिम कारकों को जानकर बचाव किया जा सकता है। इससे हृदय रोगों के कारण मृत्यु के जोखिम को कम करने में भी मदद मिल सकेगी। हालांकि दिल के रोगों के विकास का खतरा क्लिनिकल कारकों, जैसे रक्तचाप, कोलेस्ट्रोल और धूम्रपान के स्तर पर भी निर्भर करता है। क्लिनिकल जोखिम और केआरएस के मिश्रण से मरीज को दिल के रोगों के संभावित जोखिम का पता चलता है। कार्डियोजेन टेस्ट की सुविधा का लाभ मरीज घर बैठे उठा सकते हैं। कार्डियोजेन टेस्ट को 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोग एक ही बार कराके भविष्य में हृदय रोगों के जोखिम का पता लगा सकते हैं।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सुझाव के आधार पर तैयार किया गया है।
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