बीते दशकों में बढ़ी कई प्रकार की क्रॉनिक बीमारियां वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का कारण बनी हुई हैं। इनमें सिर्फ डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी शारीरिक स्वास्थ्य की समस्याएं भर नहीं हैं, मानसिक स्वास्थ्य की दिक्कतें भी खतरा बढ़ाती जा रही हैं। भारतीय आबादी पर द लैंसेट की हालिया रिपोर्ट इसी तरह की गंभीर चिंताओं को लेकर है।
Lancet study: तीन दशकों में 123% तक बढ़े इस बीमारी के मामले, कहीं आप भी तो नहीं हैं लिस्ट में?
भारत में 1990 के बाद एंग्जायटी से जुड़े मामलों में 123 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। यह केवल मानसिक परेशानी नहीं बल्कि शरीर, व्यवहार, नींद, हार्मोन और दिल की सेहत तक को प्रभावित करने वाली गंभीर स्थिति बनती जा रही है। कहीं आप भी तो इस समस्या का शिकार नहीं हैं?
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मेंटल हेल्थ की समस्याओं का बढ़ता खतरा
इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के साथ किए गए इस अध्ययन के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 1.2 अरब लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के साथ जी रहे हैं।
- यह संख्या 1990 की तुलना में लगभग दोगुनी है।
- साल 2023 में सभी देशों में मानसिक विकारों के कारण स्वास्थ्य पर एक बड़ा बोझ पड़ा है, चाहे वहां स्वास्थ्य संसाधन कितने भी उपलब्ध क्यों न हों।
- मानसिक विकार अब विश्व स्तर पर विकलांगता का सबसे बड़ा कारण बन गए हैं।
- मेंटल हेल्थ की समस्याओं ने अब हृदय रोग, कैंसर और मस्कुलोस्केलेटल (मांसपेशियों और हड्डियों से संबंधित) दिक्कतों को भी पीछे छोड़ दिया है।
एंग्जाइटी के साथ कई अन्य समस्याएं भी बढ़ रहीं
भारतीयों में एंग्जाइटी के अलावा भी कई अन्य मानसिक विकारों के मामले भी तेजी से बढ़ते जा रहे हैं।
- साल 1990 में प्रति एक लाख लोगों पर सिजोफ्रेनिया के 316 मामले थे, जो 2023 में बढ़कर 321 हो गए।
- मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर के मामले भी 1990 में हर प्रति लाखों लोगों पर 2,147 से बढ़कर 2,799.6 हो गए।
- डिस्थीमिया (लंबे समय तक रहने वाला डिप्रेशन) के मामले 1990 में हर एक लाख लोगों पर 902 से बढ़कर 2023 में 948 हो गए हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कोविड-19 के बाद एंग्जायटी और डिप्रेशन के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है। इसके अलावा पर्यावरणीय स्थितियों, बदलती जीवनशैली और बढ़ती जागरूकता के कारण अब मामलों की रिपोर्टिंग बेहतर हुई है। इस वजह से भी संख्या बढ़ गई है।
क्यों बढ़ रहे हैं एंग्जाइटी के मामले?
क्वींसलैंड सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ रिसर्च के एसोसिएट प्रोफेसर औरअध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. डेमियन सैंटोमौरो कहते हैं, कोविड महामारी से जुड़े तनाव के लंबे समय तक बने रहने के साथ गरीबी, असुरक्षा, दुर्व्यवहार, हिंसा और घटते सामाजिक जुड़ाव जैसे कारणों ने एंग्जाइटी और मानसिक स्वास्थ्य समस्या के मामलों को काफी बढ़ाया है।
इस बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए मानसिक स्वास्थ्य प्रणालियों में लगातार निवेश, लोगों तक देखभाल तक बेहतर पहुंच बनाने और ज्यादा जोखिम वाली आबादी को बेहतर सहायता देने पर जोर देना बहुत जरूरी है।
निष्कर्षों से पता चलता है कि मानसिक समस्याओं का बोझ 15-19 वर्ष की आयु के लोगों में सबसे ज्यादा देखा जा रहा है।
कहीं आप भी तो नहीं हैं शिकार?
एंग्डाइटी की स्थिति, स्ट्रेस यानी तनाव के प्रति शरीर की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। इसमें बहुत ज्यादा डर, घबराहट और शारीरिक तनाव जैसी भावनाएं महसूस होती हैं, भले ही सामने कोई वास्तविक खतरा न हो।
- अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन के अनुसार एंग्जायटी में दिमाग लगातार अलर्ट मोड में रहता है। इससे व्यक्ति को हर समय खतरे का एहसास हो सकता है।
- कई बार मरीजों को सांस फूलना, सीने में दर्द, दिल की धड़कन तेज होने के साथ नींद की समस्या भी महसूस हो सकती है।
- पढ़ाई का दबाव, करियर की चिंता, सोशल मीडिया, साइबर बुलिंग युवाओं में एंग्जाइटी की समस्या बढ़ाती जा रही है।
- विशेषज्ञों के अनुसार नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और पर्याप्त नींद मानसिक स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए जरूरी हैं। सोशल मीडिया और स्क्रीन टाइम सीमित करना भी आवश्यक है।
अगर आपको भी एंग्डाइटी के कोई भी लक्षण महसूस हो रहे हैं तो तुरंत मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
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स्रोत:
The burden of mental disorders across the states of India: the Global Burden of Disease Study 1990–2017
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