बेली फैट यानी पेट पर बढ़ती चर्बी को स्वास्थ्य विशेषज्ञ कई बीमारियों का घर मानते हैं। ये सिर्फ आपके लुक को ही नहीं खराब करती है, आपको कई तरह की जानलेवा बीमारियों का शिकार भी बना देती है। अगर आपके पेट पर भी चर्बी बढ़ने लगी है तो सावधान हो जाइए, ये आपको गंभीर मुसीबतों में डालने वाली हो सकती है।
Sarcopenic Obesity: कहीं जानलेवा न बन जाए पेट की बढ़ती चर्बी? आप भी तो नहीं है सारकोपेनिक ओबेसिटी का शिकार
पेट की चर्बी सिर्फ दिखने में खराब नहीं लगती, बल्कि यह आंतरिक रूप से सबसे खतरनाक मानी जाती है। इसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है क्योंकि यह बिना स्पष्ट लक्षणों के धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है। विशेषज्ञों की टीम सारकोपेनिक ओबेसिटी को लेकर अलर्ट कर रही है, आइए इसके खतरे को समझते हैं।
सारकोपेनिक ओबेसिटी की समस्या हो सकती है खतरनाक
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, सारकोपेनिक ओबेसिटी एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जिसमें शरीर की चर्बी (मोटापा) तो अधिक हो जाती है पर मांसपेशियों में कमी आने लगती है। यह समस्या मुख्य रूप से बुजुर्गों में ज्यादा होती है, जिससे शारीरिक कमजोरी, हृदय रोग, मेटाबॉलिज्म संबंधी रोगों और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। जिन लोगों में शारीरिक सक्रियता कम होती है और पोषण भी ठीक नहीं रहता, ऐसे लोगों में सारकोपेनिक ओबेसिटी का खतरा अधिक देखा जाता रहा है।
- अध्ययन में पाया गया कि इस खतरनाक स्थिति की पहचान महंगे मेडिकल टेस्ट के बिना, साधारण मापों के जरिए भी हो सकता है।
- इसका मतलब है कि लोगों में इस जोखिम को शुरुआती चरणों में पहचाना जा सकता है।
- समय रहते इसकी पहचान और इलाज हो जाए तो जानलेवा खतरों को कम किया जा सकता है।
यूएफएसकार के जेरोंटोलॉजी विभाग के प्रोफेसर टियागो दा सिल्वा अलेक्जांद्रे के अनुसार इस बीमारी की पहचान के लिए किसी मानक की कमी के कारण इसे समय पर पहचानना और इलाज करना मुश्किल रहा है। हालांकि, अध्ययन ने दिखाया कि सरल तरीकों से भी इसकी शुरुआती पहचान संभव है। इससे बुजुर्गों को पोषण और व्यायाम को बढ़ावा देकर समस्याओं को कम किया जा सकता है।
आसानी से हो सकती है इसकी पहचान
आमतौर पर सारकोपेनिक ओबेसिटी की पहचान के लिए एमआरआई, सीटी स्कैन, बायोइम्पीडेंस या डेंसिटोमेट्री जैसे महंगे परीक्षणों की जरूरत होती है, जो हर किसी के लिए सुलभ नहीं हैं।
- इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि कमर की माप और लीन मास का अनुमान लगाने जैसे सरल उपायों से भी इस स्थिति की पहचान की जा सकती है।
- उम्र, लिंग, वजन और लंबाई जैसे क्लिनिकल पैरामीटर को ध्यान में रखकर बनाए गए समीकरणों के जरिए मांसपेशियों के द्रव्यमान का अनुमान लगाया जा सकता है।
- इससे शुरुआती स्क्रीनिंग आसान हो जाती है।
क्यों माना जाता है सारकोपेनिक ओबेसिटी को खतरनाक
अध्ययन की लेखिका वालडेटे रेजिना ग्वांडालिनी के मुताबिक जब शरीर में अतिरिक्त फैट और मांसपेशियों में कमी एक साथ मौजूद होती हैं, तो यह एक खतरनाक चक्र बना देती हैं।
- अतिरिक्त फैट शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) को बढ़ाती है, जो मेटाबॉलिक बदलावों को ट्रिगर करती है और मांसपेशियों के टूटने की प्रक्रिया को तेज कर देती है।
- वहीं फैट मांसपेशियों के भीतर प्रवेश कर उनकी जगह लेने लगता है, जिससे मांसपेशियों की संरचना और कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
- यह सूजन मांसपेशियों की मेटाबॉलिक, एंडोक्राइन, इम्यूनोलॉजिकल और फंक्शनल क्षमता को भी कमजोर कर देती है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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