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अडल्ट्री कानून: बदले बदले सरकार नजर आते हैं, घर की बर्बादी के आसार नजर आते हैं

Sun, 30 Sep 2018 11:21 AM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Sun, 30 Sep 2018 11:21 AM IST
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Adultery law in India: Adultery Not A Crime, Husband Not Master of Wife
एक पुरानी कहावत है- 'देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जी (जीव)', मगर यहां बात रूखी-सूखी रोटी की नहीं बल्कि पत्नी की हो रही है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले से पति परमेश्वर की गुलामी से निजात दिला दी है! जाने कब से अपनी अकल और दूसरे की ब्याहता सर्वश्रेष्ठ समझने वालों की कमी नहीं रही है। इसीलिए शादी के बाद परपुरुष के साथ रमण को पाप ही नहीं, अपराध भी समझा जाता रहा है।


बाइबिल में जो दस महा आदेश (कमांडमेंट) दर्ज हैं, उनमें एक अडल्ट्री को गर्हित वर्जित आचरण में शुमार करता है। हिंदू परंपरा में पातिव्रत धर्म की बड़ी महिमा है पर ईसाई और मुसलमान, यहूदी आदि भी इस 'दुराचरण' को दंडनीय अपराध मानते रहे हैं।
Adultery law in India: Adultery Not A Crime, Husband Not Master of Wife
'सेवेंथ सिन' से लेकर 'सिलसिला' तक जैसी फिल्मों की कहानी बेवफाई की दास्तान का ही बखान करती हैं। कमांडर नानावती का पुरदर्द अनुभव भी अपनी पत्नी के 'विश्वासघात' से ही उसके प्रेमी की हत्या तक पहुंचाने वाला सिद्ध हुआ। कुछ लोगों को लगता है कि भारत के पूर्व वायसराय माउंटबेटन की पत्नी की नेहरू के साथ घनिष्ठता इस हसीन गुनाह की सीमारेखा के बहुत पास फिसलती रही थी। विडंबना यह है कि आला अदालत के इस फैसले तक इस जुर्म की शिकायत सिर्फ आहत पति या पत्नी ही कर सकते थे। बाकी हाल वही था- 'जब मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी?'

वैसे हकीकत यह थी कि बेचारी पत्नी या पति कुछ भी करने में असमर्थ रहते थे अगर उनके जीवनसाथी को किसी ताकतवर प्रेमी ने रिझा लिया हो। 'मेरी बीबी को उसके प्रेमी से बचाओ!' की गुहार लगाने के अलावा वह कर भी क्या सकते थे?

अच्छे दिन आएंगे?

Adultery law in India: Adultery Not A Crime, Husband Not Master of Wife
अच्छे दिन आएंगे?
जब मीरा ने गाना शुरू किया 'कुल की कानि...', 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई' तब राणा बिस का प्याला भेज कर भी लाचार ही रहे और जब कृष्ण कन्हैया की मुरली की धुन सुन मगन भई गोपियां आधी रात घर से स्वजनों को छोड़ निकल पड़ती तब यह तय करना असंभव हो जाता था कि उनका आकर्षण शारीरिक था या आध्यात्मिक।

भारत के मिथकों पुराणों में ऐसे आख्यानों का अभाव नहीं जिनमें दंड निर्दोष छली गई पत्नी को ही दिया जाता है। इंद्र जब पति का रूप धर अहिल्या को भ्रमित कर सहचरी बनाता है, ऐसा ही प्रसंग है।जाहिर है कि अब तक अंधे कानून का पलड़ा पुरुष की तरफ ही झुका था और स्त्रियों के समानता के अधिकार का हनन होता था, पर क्या सुप्रीम कोर्ट की इस दहाड़ से पलक झपकते उनके अच्छे दिन आ जाएंगे?
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फैसले में साफ कहा गया है कि पत्नी के शरीर पर पति का मालिकाना हक नहीं। सरकार की यह दलील खारिज कर दी गई कि इस 'दुराचरण' को दंडनीय जुर्म नहीं रखा गया तो 'विवाह की पवित्र संस्था' खतरे में पड़ जाएगी। विवाह सभी धर्मों में इसे पवित्र बंधन नहीं, एक करार अनुबंध समझा जाता है। यह तर्क धर्मनिरपेक्ष समाज में अकाट्य नहीं समझा जा सकता। इसके साथ-साथ यह जोड़ने की जरूरत है कि एक तरक्की पसंद अदालती फैसले से पितृसत्तात्मक संस्कारों की दकियानूस बेड़ियां ख़ुद ब ख़ुद नहीं टूटने वाली।

जिस तरह वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंधों को अब भारत में जुर्म नहीं माना जाता, उसी तरह विवाहेतर शारीरिक संबंध अब निजता के बुनियादी अधिकार के सुरक्षा कवच का संरक्षण प्राप्त कर चुके हैं।
 
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क्या अतिआशावादी उतावली नादानी है?
सोचने की बात यह है कि कितने बुनियादी या मानव अधिकार उन सभी नागरिकों की पहुंच में हैं, जो इनके उल्लंघन के शिकार होते हैं? जहां कन्या शिशु की भ्रूण हत्या, बलात्कारों से लेकर अंतर्जातीय-अंतर सांप्रदायिक प्रेम विवाह 'ऑनर किलिंग' तक जैसे जघन्य अपराधों को समाज सहज भाव से स्वीकार कर लेता है और इनके अभियुक्तों को सजा दिलाने में सरकार की नाकामी हमें यही सोचने को मजबूर कर रही है कि अतिआशावादी होने की उतावली नादानी है।

यह तरक़्की पसंद फैसला शादी की बुनियाद को निश्चय ही कमजोर करने वाला है। यह कहना ठीक है कि जब मन ही नहीं मिल रहे तब जबरन बदन मिलाते रहने का क्या तुक है? परंतु अगर इसी तर्क को शीर्षासन करा दें तो यह भी सुझा सकते हैं कि बदन तो गौण हैं, मन मिला रहे तो जन्म-जन्म का साथ निभाते रहना चाहिए।तन, बदन और मन को इतनी आसानी से अलग किया जा सकता है क्या? अंग्रेजी मुहावरा में जिसे सातसाली खुजली कहा जाता है वह वैवाहिक जीवन की ऊब को दूर करने की लंपट छटपटाहट ही तो है।

 
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