बच्चे कच्चे घड़े के समान होते हैं। जिन्हें हम जैसे चाहे सिखा सकते हैं। अच्छी आदतों को सिखाने से भविष्य में वहीं बच्चे एक अच्छे इंसान साबित होते हैं। बचपन से ही पैसे की अहमियत बताने से बच्चों को आगे चलकर दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता है। कम उम्र में सोच-समझकर पैसे खर्च और बचत करने की सीख उन्हें भविष्य की फिजूल खर्ची से बचाती है। क्या आप भी अपने बच्चों को मनी मैनेजमेंट की सीख दे रही हैं?
बच्चों को सिखाएं किस तरह से करें पैसे की बचत,भविष्य को उज्जवल बनाने का है आसान तरीका
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12 साल के अथर्व को स्कूल का एक प्रोजेक्ट तैयार करना था। मां ने कुछ पैसे दिए और वह अपनी जरूरत का सामान लेकर आ गया, लेकिन दो दिन बाद उसने फिर अपनी मां से कुछ पैसे मांगे, थोड़ा सोचने के बाद मां सुजाता ने अथर्व को एक पिगी बैंक लाकर दे दिया और कहा कि अब से तुम रोजाना जो कुछ पैसे बचे इस गुल्लक में डालते जाना, फिर देखना तुमको मुझसे पैसे लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
सुजाता अथर्व को रोजाना कुछ जेब खर्च देती थी। पिगी बैंक में पैसे डालने की आदत अथर्व को इनती अच्छी लगी कि वह अब खुद अपने बेवजह के खर्च कम कर बचे पैसे पिगी बैंक में डाल देता है। महीने भर बाद जब उसने पिगी बैंक का ताला खोला तो देखा कि उसने काफी पैसे जमा कर लिए। सुजाता चाहती तो अथर्व को प्रोजेक्ट के पैसे देने से मना भी कर सकती थी, लेकिन कहा जाता है कि हर एक बात को कहने का एक तरीका होता है। पैसे बचाने की सीख को जब अथर्व ने अपनी असल जिंदगी में लागू किया तो उसे पैसे का न सिर्फ महत्व समझ आया, बल्कि वह मितव्ययी भी हो गया।
कई बार बचपन के लाड़ प्यार में हम बच्चों को पैसों के महत्व और मनी मैनेजमेंट के बारे में बताना ही भूल जाते हैं, सही मायने में दस साल की उम्र के बाद से ही बच्चों को मनी मैनेजमेंट के बारे में बताना शुरू कर देना चाहिए। एम्स की बाल रोग मनोचिकित्सक डॉ. शेफाली गुलाटी कहती हैं कि आठ से दस साल की उम्र के बीच बच्चे सबसे अधिक दूसरों से अपनी तुलना शुरू कर देते हैं, जैसे दोस्तों के पास महंगी चीजें हैं तो उसके पास क्यों नहीं, आदि। यह एक चुनौती भरा समय होता है, जब माता-पिता को बच्चे के मानसिक विकास पर सबसे अधिक ध्यान देना होता है। ऐसे में वह अपनी बाकी चीजों के साथ ही अपने खर्चों को भी खुद ही नियंत्रित करेगा तो उसे बेहतर मनी मैनेजमेंट सिखाया जा सकता है। दूसरा वह तुरंत ही दोस्तों से अपनी तुलना करना भी बंद कर देगा। ऐसा सभी माता-पिता को करना चाहिए। सही मायने में देखा जाए, तो अधिक धन के प्रवाह में बचपन बीतने से कहीं अधिक जरूरी है कि बच्चे का बचपन स्वाभाविक रूप से बीते, जो बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास, दोनों के लिए बेहतर है।
मेडस्केप इंडिया की डॉ. सुनीता दुबे कहती हैं कि जब समझदार होते ही बच्चों को अलग कमरा दिया जा सकता है तो फिर पैसे से जुड़े मामलों में उन्हें क्यों नहीं शामिल किया जा सकता। अधिकांश माता-पिता यह गलती करते हैं कि वह बच्चों से कहते हैं कि आपको जो चाहिए, हमें बताइए, हम आपको लाकर देंगे, जबकि मूलभूत खर्च (स्कूल फीस, कपड़े, भोजन आदि) के अलावा बच्चों के पॉकेट मनी से उन्हें बेहतर मनी मैनजमेंट सिखाया जा सकता है। जब उन्हें अपनी ही बचत का पैसा खर्च करना पड़ेगा, तब ही वह सोच-समझकर खर्च करना सीखेंगें। डॉ. सुनीता कहती हैं कि बचत करने के छोटे प्रयास से बच्चों की माता-पिता पर निर्भरता भी कम होगी। माता-पिता चाहें तो बचत का एक लक्ष्य निर्धारित कर और लक्ष्य को हासिल करने के बाद बच्चों को छोटा गिफ्ट या उपहार भी दे सकते हैं। लेकिन भूलकर भी बच्चों की महंगी से महंगी डिमांड पूरी करने की आदत न डालें।