Parenting Tips: स्वस्थ और सुरक्षित समाज के लिए हर एक नागरिक को प्रयास करना चाहिए। शुरुआत घर से करें। माता पिता खुद अच्छा आचरण रखें, साथ ही बच्चों को अच्छी परवरिश दें। कई बार माता पिता बेटे और बेटी के लिए अलग-अलग नियम बना लेते हैं। अक्सर बेटियों को सिखाया जाता है कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। बेटियों को इज्जत समझा जाता है, जिसकी सुरक्षा के लिए कई बार बेटियों पर ही रोकटोक और प्रतिबंध लगते हैं।
Parenting Tips: लड़कों को दें अच्छी परवरिश, बेटों को बचपन से ही सिखाएं ये बातें
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भेदभाव न करें
अभिभावक बच्चों की परवरिश करते समय बेटे या बेटी के बीच भेदभाव न करें। लड़की को क्या करना चाहिए और लड़के को क्या करना चाहिए, इस तरह से उन्हें दायरे में न बांधें। जब बेटा बचपन से माता पिता को उनके और बहन के बीच भेदभाव करते देखता है तो वह लिंग असमानता को महसूस करता है। बेटे को महसूस होता है कि लड़के लड़कियों से अधिक बेहतर या उच्च होते हैं।
बेशक लड़के शारीरिक तौर पर बलवान हो सकते हैं, लेकिन वह लड़कियों से तुलना करते हुए खुद को स्ट्रांग मानकर घमंड करते हैं। ऐसे में वह हमेशा लड़कियों को कम समझते हैं। वही बेटा बड़ा होकर जब पुरुष बनता है तो अपनी शारीरिक शक्ति या तेज आवाज से महिलाओं को दबाने का प्रयास करता है। इसलिए बचपन से उन्हें समझाएं कि लड़कियां कमजोर नहीं होती हैं और लड़के होने का अर्थ महिलाओं की तुलना में उच्च व अधिक बलशाली होना नहीं है।
सम्मान करना सिखाएं
हर माता पिता को अपने बेटे को दूसरों का सम्मान करना सिखाना चाहिए। जिस तरह से बेटियों को बचपन से मां सिखाती हैं कि उन्हें विनम्रतापूर्वक धीमी आवाज में बात करनी चाहिए, उसी तरह से बेटों को भी बताएं कि उन्हें विनम्र, मधुर भाषी और सभी का सम्मान करना चाहिए। बेटियों को लज्जा और शर्म के बारे में बताते समय बेटों को भी बताएं कि नजरों में हर किसी के लिए सम्मान होना चाहिए। जेंडर पर घमंड न करके दूसरों की मदद करना और दया भाव रखना हर बेटे को आना चाहिए।
भावनाएं व्यक्त करना सिखाएं
'लड़के रोते नहीं, कमजोर हो क्या, लड़कियों की तरह डर क्यों रहे हो' आदि बाते बोलकर अक्सर बेटे को उनकी भावनाएं व्यक्त करने से रोका जाता है। बचपन से बेटे को सिखाते हैं कि रोना, डरना कमजोरी है। उसे महसूस कराया जाता है कि यह कमजोरी बेटी में हो सकती है लेकिन बेटे में नहीं। बचपन में लड़के को भावनाएं दबाना सिखाकर माता पिता उन्हें कठोर बना देते हैं। इस तरह की सीख उन्हें दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए प्रेरित करती है। वह इमोशनली स्ट्रॉन्ग नहीं बनते बल्कि भावनात्मक रूप से बिगड़ जाते हैं। बेटों को दर्द या दुख जाहिर करने पर रोके नहीं, बल्कि अपनी भावनाएं व्यक्त करना सिखाएं। इस से वह दूसरों की भावनाओं की भी कद्र करेंगे और किसी दूसरे के रोने या दुख को महसूस कर पाएंगे।
अक्सर माता घर के कामों में बेटी की मदद लेती हैं। बेटियों को समझदार होते ही घर परिवार की जिम्मेदारियां सिखाना शुरू कर दिया जाता है। हालांकि लड़कों को यह सीख कम ही दी जाती है। जब तक बहुत जरूरत न हो, बेटे घर के या रसोई के कामों में माता का हाथ नहीं बंटाते हैं।
इस कारण जब वह बड़े होते हैं तो उन्हें लगता है कि घर के काम उनकी नहीं बल्कि महिलाओं की जिम्मेदारी है। बेटों को गृहस्थी के काम की इज्जत नहीं होती और न ही उस काम को करने वाली अपनी मां, बहन व पत्नी के प्रति सम्मान होता है। इसलिए बचपन से बेटों को जिम्मेदारी दें, घर के कामों में उनकी मदद लें।