एक स्वतंत्रता सेनानी के बारे में सोचें जो एक वीर सैनिक, एक वीर योद्धा, एक महान सेनापति, कुशल राजनीतिज्ञ भी था , तो सबसे पहले हमारे सामने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का चेहरा ही आता है। उनके व्यक्तित्व के बारे में जितना कुछ भी कहा जाए वो कम है। नेताजी ने भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए क्या कुछ नहीं किया। आजाद हिंद फौज के गठन से लेकर हर भारतीय को आजादी का महत्व बताने तक हर एक काम नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने किया। तो चलिए आज हम आपको नेताजी के जीवन के बारे में कुछ खास बातें बताते हैं।
Subhas Chandra Bose Jayanti 2021: सुभाष चंद्र बोस थे 14 भाई-बहन, जानें कैसे बीता था नेताजी का जीवन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक संपन्न बंगाली परिवार में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता जी का नाम प्रभावती देवी था, जिनके कुल 14 बच्चे थे। इसमें से 8 बेटे और 6 बेटियां थी। नेताजी अपने माता-पिता की नौवी संतान और पांचवे बेटे थे। अपनी शुरुआती पढ़ाई उन्होंने कटक के ही रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल से की, जिसके बाद नेताजी ने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में साल 1913 में दाखिला लिया, जिसके बाद 1915 में उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा को प्रथम श्रेणी में पास किया। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस के माता-पिता ने उन्हें इंडियन सिविल सर्विस यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया।
अंग्रेजों के जमाने में किसी भारतीय का इस परीक्षा में पास होना तो दूर, इसमें भाग लेना तक कठिन होता था। इस सबके बावजूद नेताजी ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। 1921 में भारत में राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगीं। ये खबर मिलते ही नेताजी भारतीय प्रशासनिक सेवा को बीच में ही छोड़कर भारत लौट आए और फिर वो बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। जहां महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, तो वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। इसलिए नेताजी गांधी जी के विचार से सहमत नहीं थे। हालांकि, दोनों का मकसद सिर्फ और सिर्फ एक था कि भारत को आजाद कराया जाए।
साल 1938 में नेताजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित किए गए, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। 1939 के कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी के समर्थन से खड़े पट्टाभी सीतारमैया को हराकर विजय प्राप्त की। इस पर गांधी और बोस के बीच अनबन बढ़ गई, जिसके बाद नेताजी ने खुद ही कांग्रेस को छोड़ दिया। इसी बाच दूसरा विश्व युद्ध छिड़ा और नेताजी ने अंग्रेजों का विरोध करना तेज कर दिया, जिसके बाद उन्हें उन्हीं के घर में नजरबंद कर दिया गया। हालांकि, वो बीच में ही जर्मनी भाग गए। यहां उन्होंने विश्व युद्ध को बड़े ही करीब से देखा।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने साल 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। दोनों की एक बेटी अनीता हुई, और वर्तमान में वो जर्मनी में अपने परिवार के साथ रहती हैं। अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को 'आजाद हिंद सरकार' की स्थापना करते हुए 'आजाद हिंद फौज' का गठन किया। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस अपनी फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा (अब म्यांमार) पहुंचे। यहां उन्होंने नारा दिया 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।' लेकिन 18 अगस्त 1945 को सुभाष चंद्र बोस ने हमेशा-हमेशा के लिए दुनिया क अलविदा कह दिया। तथ्य बताते हैं कि सुभाष चंद्र बोस 18 अगस्त 1945 को हवाई जहाज में सवार होकर मंचुरिया जा रहे थे, लेकिन इसके बाद वो अचानक कहीं लापता हो गए, और आज तक उनकी मौत एक अनसुलझी गुत्थी बनी हुई है।