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Day Dreaming: क्या होता है डे ड्रीमिंग? जानिए इसके फायदे और नुकसान

Fri, 11 Apr 2025 05:58 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवानी अवस्थी Updated Fri, 11 Apr 2025 05:58 PM IST
सार

दिन में सपने देखे आपने। थोड़ी देर बाद आपके सपने उलझ से गए। अगर आपके साथ ऐसा बार-बार हो रहा है तो आप ‘डे-ड्रीमर’ हैं। यह आपको मानसिक उलझन में भी डाल सकता है और आपको हकीकत से दूर ले जा सकता है। ‘डे-ड्रीमिंग’ हमेशा पॉजिटिव नहीं होती

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What Is Daydreaming Negative Effects in Hindi
डे ड्रीमिंग क्या है - फोटो : adobe stock

यशा माथुर



Daydreaming Negative Effects: कई बार आप परिवार के साथ होती हैं, दोस्तों से घिरी होती हैं, लेकिन कहीं दूर अपने ही ख्यालों में उड़ान भर रही होती हैं। दिल में दबा कोई सपना होता है, जिसे असल जिंदगी से दूर आप ख्वाबों की दुनिया में जी जाती हैं। उस क्षण भर के सपने की दुनिया में आप सितार वादक होती हैं, ब्यूटी कंपटीशन की चैंपियन होती हैं या फिर ऊंची-ऊंची चोटियों को फतह करने वाली महिला। खुली आंखों से देखे गए इन क्षण भर के सपनों को मनोवैज्ञानिक ‘डे-ड्रीमिंग’ कहते हैं।

डे-ड्रीमिंग यानी दिन में सपनों की सैर पर चले जाना, अपनी कल्पना को उड़ान देना और किसी नई सोच की नींव डालना। इस दौरान आप पढ़ाई करते हुए, ऑफिस में बैठे हुए या किसी अन्य गतिविधि में व्यस्त होकर भी खुली आंखों से उन सपनों में खो जाती हैं, जो अधूरे रह गए या जिनको आप इस जिंदगी में ही पूरा करने की चाह रखती हैं। आप जैसे ही उन ख्वाबों की दुनिया से लौटती हैं, फोन उठाकर नेट पर उसे कैसे पूरा किया जाए, यह जानने के लिए सर्च करती हैं। आप कोशिश करती हैं कि सारी जानकारी इकट्ठी कर ली जाए, ताकि सपना हकीकत बन सके। असल में, डे-ड्रीमिंग आपको खुली आंखों से देखे गए सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन डे-ड्रीमिंग हमेशा सकारात्मक हो, यह जरूरी नहीं।

कल्पना का संसार

यह दिन का सपना है, जो आगे बढ़ने और कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित कर सकता है और पूरा नहीं होने पर घोर निराशा या अवसाद में भी धकेल सकता है। डे-ड्रीमिंग कुछ क्षण चले तो फायदेमंद साबित हो सकती है, लेकिन आप हर वक्त ख्वाबों में रहने लगें तो बीमारी में भी तब्दील हो सकती है। दरअसल, अपने ही बुने ख्वाबों में खो जाना आम बात है। दिन में जागती आंखों से सपना तो हर कोई देखता है, लेकिन अगर आप देर तक सपने बुनती रहेंगी तो यह एक तरह का मानसिक डिसऑर्डर बन जाएगा, जिसमें उलझकर आप हकीकत पर नहीं, बल्कि काल्पनिक दुनिया पर विश्वास करने लगेंगी। मनोवैज्ञानिक इसे ‘फैंटेसी डिसऑर्डर’ भी कहते हैं।

आप सपनों में कठिन लक्ष्य को चुनती हैं और जब खुद को उन्हें पूरा करते हुए पाती हैं तो आपको बेहद खुशी महसूस होती है, आपका मूड अच्छा हो जाता है। लेकिन यह वास्तविक खुशी नहीं है, बस उसकी कल्पना मात्र है। लेकिन जब आप उसे पूरा नहीं कर पाती हैं तो डे-ड्रीमिंग अवसाद का कारण बन सकती है। इसे ‘मैलाडैप्टिव डे-ड्रीमिंग’ यानी अनुपयुक्त दिवास्वप्न के नाम से जाना जाता है। अध्ययन बताते हैं कि डे-ड्रीमिंग के शिकार लोग तरह-तरह की कल्पनाओं में खोए रहते हैं और अपना कीमती समय इन काल्पनिक सपनों के फेर में बर्बाद कर देते हैं।

नए आइडिया मिल जाते हैं

कभी-कभी दिन में देखे ख्वाब कामयाबी की कठिन राह पार करने का हौसला देते हैं और प्रॉडक्टिव भी साबित होते हैं। अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुई एक स्टडी बताती है कि डे-ड्रीमिंग से न सिर्फ आपकी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता बढ़ती है, बल्कि सेहत पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। डे-ड्रीमिंग से मस्तिष्क की कार्यक्षमता में सुधार होता है। स्टडी कहती है कि डे-ड्रीमिंग को किसी बीमारी की तरह देखना सही नहीं है। जब कहीं बैठे-बैठे दिमाग में किसी पुरानी खूबसूरत याद के मंजर सामने आने लगते हैं या आपका ध्यान दिमाग में घुमड़ रहे सपनों की ओर चला जाता है तो आप वास्तविक माहौल से कट जाती हैं। अपने सोचे हुए संसार में चले जाती हैं।

हार्वर्ड के मनोचिकित्सकों ने बताया कि दिन में बैठे-बैठे ख्वाब बुनने के दौरान मस्तिष्क में ‘न्यूरोप्लास्टिसिटी’ विकसित हो जाती है और मस्तिष्क किसी भी बदलाव को स्वीकार लेता है। उन्होंने यह भी पाया कि इससे सीखने की क्षमता और याददाश्त में भी बढ़ोतरी होती है। अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में हुए एक अन्य अध्ययन में अध्ययनकर्ताओं ने डे-ड्रीमिंग को इस प्रकार परिभाषित किया- “डे- ड्रीमिंग में लोग नकारात्मक सोच में डूबने के बजाय कल्पना की सुंदर दुनिया में खो जाते हैं, जिससे कई बार नए आइडियाज और कठिन सवालों के जवाब मिल जाते हैं।

फिल्मकार रजनी गुप्ता कहती हैं, “जब अचानक मेरे सामने कोई विशेष परिस्थिति आती है और मैं उसे अपने सपने में कल्पना करके देख लेती हूं तो इससे मुझे एक आइडिया मिल जाता है कि मैं उसे किस तरह विकसित करूं और क्या विजुअल लूं कि मेरी एक स्क्रिप्ट तैयार हो जाए।” जब डे-ड्रीमिंग से रजनी अपने मतलब की कथा बुन लेती हैं तो उनके लिए डे-ड्रीमिंग एक वरदान बन जाती है।
 

What Is Daydreaming Negative Effects in Hindi
sleep - फोटो : adobe stock

मानसिक विकारों की आहट

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स की एक रिपोर्ट कहती है कि पूरी दुनिया में करीब 20 करोड़ लोग डे-ड्रीमर हैं। दरअसल, आप जब किन्हीं नकारात्मक भावों से संघर्ष कर रही होती हैं तो उनसे दूर भागते हुए अपनी ही एक ऐसी दुनिया बना लेती हैं, जिसमें हर चीज अपने मन-माफिक देखती हैं। अब यही दुनिया आपको अच्छी लगने लगती है और आप एक तरह से जिंदगी की असलियत से बचने लगती हैं, लक्ष्य से भटक जाती हैं। स्टूडेंट हैं तो पढ़ाई पर फोकस नहीं कर पातीं, कामकाजी हैं तो काम में मन नहीं लगता, गृहिणी हैं तो ठीक से घर नहीं संभाल पातीं। जब आप मजेदार सपनों के संसार में ज्यादा खोई रहती हैं तो अचानक सामने आई हकीकत आपको झटका देती है और आपकी बेचैनी बढ़ जाती है। इसके बाद अवसाद और ओसीडी यानी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर जैसे मानसिक विकारों के पनपने का खतरा बढ़ जाता है।

ऐसा क्यों होता है?

ये सब तो ठीक है, लेकिन हद से ज्यादा ख्वाबों की दुनिया में खोए रहना मानसिक स्वास्थ्य को बिगाड़ सकता है। मगर अब प्रश्न उठता है कि खूबसूरत सपनों की दुनिया बीमार हकीकत में क्यों बदल जाती है? इसके कई कारण हो सकते हैं। अगर आपने बचपन में कठिन समय देखा है और उसने आपके दिमाग के किसी कोने में जगह बना ली है तो आप हर वक्त उसी के बारे में सोचेंगी। ऐसे में नकारात्मक विचार आपको बंदी बना लेंगे और तनाव बढ़ जाएगा, जिससे मन अशांत रहने लगेगा। यदि आपकी निजी जिंदगी में कोई समस्या है या कार्यस्थल पर मुश्किलें हैं और आप उन्हें किसी से बांट नहीं पा रही हैं तो अपनी खुशी इन मीठे ख्वाबों में ही खोजने की कोशिश करेंगी। अगर आप अपनी सेहत से परेशान रहती हैं तो स्वस्थ दिखाने वाले सपने प्रिय लगने लगेंगे। इस स्थिति में आप सच्चाई से भागने लगेंगी। वास्तव में, किसी भी मानसिक विकार के पीछे आपका कोई बुरा अनुभव ही होता है, अन्यथा सकारात्मक सपने आपको आगे बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं।

महिलाएं हैं आगे

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की एक स्टडी के अनुसार, महिलाएं डे-ड्रीमिंग के मामले में पुरुषों से आगे हैं। डे-ड्रीमिंग यानी कल्पना और विचारों में खो जाना, महिलाओं के मस्तिष्क में रचनात्मकता और सोचने की क्षमता को बढ़ावा देता है। यह क्षमता उन्हें विभिन्न मुद्दों पर नए और अनोखे दृष्टिकोण अपनाने में मदद करती है, जो उन्हें अधिक रचनात्मक बनाती है और समस्या हल करने की क्षमता में वृद्धि करती है। लेकिन कहते हैं न कि अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती, इसलिए जीवन की सच्चाई को स्वीकार करें। इसके लिए ध्यान, योग और व्यायाम की मदद लें। अगर इसके बाद भी आपको लगता है कि डे-ड्रीमिंग आपके लिए परेशानी का सबब बन रही है तो इसकी पहचान कर मनोवैज्ञानिक से परामर्श करें।


अगर आप ज्यादा सोचती हैं...

आर्यभट्ट कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वर्षा सिंह कहती हैं,  मस्तिष्क की यह चमत्कारिक योग्यता है कि आप किसी भी चीज की कल्पना कर उस क्षण का मजा उठा सकती हैं। इससे आपको अच्छा महसूस होता है और खुशी का हार्मोन ‘डोपामाइन’ का स्तर बढ़ता है। असल में, दिन में सपने देखना एक आम प्रक्रिया है, जो सभी में होती है। सभी लोग दिन में ख्वाब देखते हैं। इसके कई फायदे हैं। कई बार आप सोचते-सोचते, कल्पना करते-करते अपनी समस्या का समाधान कर लेती हैं या फिर दिल से खुश हो जाती हैं। दिन में सपने देखना रचनात्मक भी होता है, जैसे आपको सोचते-सोचते अचानक कोई बेहतरीन आइडिया आ जाए।

इसके अतिरिक्त यह तनाव को कम करने में भी मदद करता है, एंग्जायटी को कम करता है। लेकिन जैसा कि कहते हैं कि किसी भी चीज की अति खराब होती है तो आप अगर ज्यादा ही सपने देखने लग जाती हैं तो यह स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। अगर आप ज्यादा सोचती हैं तो आपको एंग्जायटी हो सकती है। विशेष रूप से सोशल एंग्जायटी। यह आपके दिन भर के कामों को प्रभावित कर सकता है। आप कक्षा में हैं, किसी जरूरी मीटिंग में हैं और सपने देख रही हैं तो आप जहां हैं, आपका मन वहां नहीं लगेगा और जरूरी बातें आप सुन भी नहीं पाएंगी। दिन में सपने देखने पर आपको कोई मानसिक रोग हो, इसकी संभावना कम ही है, लेकिन हकीकत में जीना सबसे जरूरी है।

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