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इंदौर के शक्ति स्थल: 98 साल से बंगाली समाज मना रहा सार्वजनिक दुर्गा उत्सव, नवलखा में होता है मुख्य कार्यक्रम
सार
शुरुआती दिनों में बंगाली समाज की नगर में विशेष पहचान नहीं थी। इस उत्सवी परंपरा को सार्वजानिक रूप से मनाए जाने के कारण गैर बंगाली लोगों को भी सम्मिलित किया गया। जो नगर के बहुत ही प्रतिष्ठित लोग थे।
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इंदौर में बंगाली समाज 106 वर्ष से दुर्गा उत्सव मना रहा है।
- फोटो : अमर उजाला
इंदौर में बंगाली समाज 106 वर्ष से दुर्गा उत्सव मना रहा है। हालांकि, इस समाज द्वारा सार्वजनिक रूप से नवदुर्गा उत्सव मनाए जाने का यह 98 वां वर्ष है। बंगाली समाज का दुर्गा उत्सव पांच दिवसीय रहता है और सिंदूर खेला के साथ संपन्न होता है। इन पांच दिनों में विभिन्न कार्यक्रम होते हैं, जिसमें बंगाली समाज के लोग एकत्र होते हैं।
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बंगाली समाज का दुर्गा उत्सव पांच दिवसीय रहता है
- फोटो : अमर उजाला
1918 में मना पहला दुर्गा उत्सव
बंगाली परिवारों का धीरे-धीरे नगर में आगमन होता गया और इन्हीं परिवारों द्वारा इंदौर में 1918 में अपने क्षेत्र में नवदुर्गा उत्सव मनाया जाने लगा। यह उत्सवी परंपरा बंगाली क्लब के बैनर तले 1928 में सार्वजनिक रूप से शुरू हुई। तब तक नगर में 125 से अधिक बंगाली परिवार आ गए थे। इन्हीं परिवारों ने सार्वजनिक रूप से शारदीय नवरात्र उत्सव मनाना आरंभ किया। इसके प्रेरणा स्रोत थे, गोपाल चंद्र मुखर्जी, जेएन बनर्जी, भूपेंद्रनाथ बसु और हेमचंद्र डे।
अन्य समाज का भी सहयोग रहा
शुरुआती दिनों में बंगाली समाज की नगर में विशेष पहचान नहीं थी। इस उत्सवी परंपरा को सार्वजानिक रूप से मनाए जाने के कारण गैर बंगाली लोगों को भी सम्मिलित किया गया। जो नगर के बहुत ही प्रतिष्ठित लोग थे। इनमें प्रमुख नाम पंडित मुकुंदराम भवानी शंकर त्रिवेदी, सेठ मोतीलाल, पंडित ख्यालीराम द्विवेदी, कैप्टन कृष्णलाल, पंडित रामचंद्र शर्मा और शंभूनाथ त्रिपाठी प्रमुख थे।
कहां आयोजित हुआ था पहला कार्यक्रम
1928 से सार्वजनिक नवदुर्गा उत्सव समिति का कार्यक्रम आयोजित होने के बाद इसे किसी अन्य स्थान पर भव्य रूप से आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए वर्तमान में सरवटे बस स्टैंड के सामने स्थित सेठ टीकमचंद मूलचंद की धर्मशाला वाले स्थान पर पहला कार्यक्रम आयोजित किया गया था। उस समय धर्मशाला निर्मित नहीं थी और खुला मैदान था।
बंगाली परिवारों का धीरे-धीरे नगर में आगमन होता गया और इन्हीं परिवारों द्वारा इंदौर में 1918 में अपने क्षेत्र में नवदुर्गा उत्सव मनाया जाने लगा। यह उत्सवी परंपरा बंगाली क्लब के बैनर तले 1928 में सार्वजनिक रूप से शुरू हुई। तब तक नगर में 125 से अधिक बंगाली परिवार आ गए थे। इन्हीं परिवारों ने सार्वजनिक रूप से शारदीय नवरात्र उत्सव मनाना आरंभ किया। इसके प्रेरणा स्रोत थे, गोपाल चंद्र मुखर्जी, जेएन बनर्जी, भूपेंद्रनाथ बसु और हेमचंद्र डे।
अन्य समाज का भी सहयोग रहा
शुरुआती दिनों में बंगाली समाज की नगर में विशेष पहचान नहीं थी। इस उत्सवी परंपरा को सार्वजानिक रूप से मनाए जाने के कारण गैर बंगाली लोगों को भी सम्मिलित किया गया। जो नगर के बहुत ही प्रतिष्ठित लोग थे। इनमें प्रमुख नाम पंडित मुकुंदराम भवानी शंकर त्रिवेदी, सेठ मोतीलाल, पंडित ख्यालीराम द्विवेदी, कैप्टन कृष्णलाल, पंडित रामचंद्र शर्मा और शंभूनाथ त्रिपाठी प्रमुख थे।
कहां आयोजित हुआ था पहला कार्यक्रम
1928 से सार्वजनिक नवदुर्गा उत्सव समिति का कार्यक्रम आयोजित होने के बाद इसे किसी अन्य स्थान पर भव्य रूप से आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए वर्तमान में सरवटे बस स्टैंड के सामने स्थित सेठ टीकमचंद मूलचंद की धर्मशाला वाले स्थान पर पहला कार्यक्रम आयोजित किया गया था। उस समय धर्मशाला निर्मित नहीं थी और खुला मैदान था।
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धुनुची नृत्य करते हुए माता की आराधना की।
- फोटो : अमर उजाला
फिर नवलखा में जमीन खरीदी
बंगाली क्लब की नवलखा स्थित जमीन 1963 में क्रय की गई और यहां दुर्गा उत्सव की परंपरा शुरू हुई। इस स्थान पर अब पांच दिवसीय दुर्गा पूजा का कार्यक्रम आयोजित होता है। प्रवेश द्वार और देवी की भव्य मूर्ति बंगाली कारीगरों द्वारा बनाई जाती है। इस वर्ष जयपुर के महल की आकृति का द्वार निर्मित किया गया है। बंगाली क्लब परिसर में अस्सी के दशक में देवी कालका का भव्य मंदिर का निर्माण किया था। क्लब द्वारा स्कूल भी संचालित किया जाता है।
अब विस्तृत हुआ दायरा
अब बंगाली समाज के लोग नगर के विभिन्न क्षेत्रों में रहने लगे हैं। इसके बाद दुर्गा पूजा उत्सव वर्तमान में कई स्थानों पर होने लगा है। विजय नगर, बंगाली कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड समेत अन्य क्षेत्रों में बंगाली समाज नवदुर्गा उत्सव आयोजित करता है।
बंगाली क्लब की नवलखा स्थित जमीन 1963 में क्रय की गई और यहां दुर्गा उत्सव की परंपरा शुरू हुई। इस स्थान पर अब पांच दिवसीय दुर्गा पूजा का कार्यक्रम आयोजित होता है। प्रवेश द्वार और देवी की भव्य मूर्ति बंगाली कारीगरों द्वारा बनाई जाती है। इस वर्ष जयपुर के महल की आकृति का द्वार निर्मित किया गया है। बंगाली क्लब परिसर में अस्सी के दशक में देवी कालका का भव्य मंदिर का निर्माण किया था। क्लब द्वारा स्कूल भी संचालित किया जाता है।
अब विस्तृत हुआ दायरा
अब बंगाली समाज के लोग नगर के विभिन्न क्षेत्रों में रहने लगे हैं। इसके बाद दुर्गा पूजा उत्सव वर्तमान में कई स्थानों पर होने लगा है। विजय नगर, बंगाली कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड समेत अन्य क्षेत्रों में बंगाली समाज नवदुर्गा उत्सव आयोजित करता है।

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