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इंदौर के शक्ति स्थल: 98 साल से बंगाली समाज मना रहा सार्वजनिक दुर्गा उत्सव, नवलखा में होता है मुख्य कार्यक्रम

Kamlesh Sen कमलेश सेन
Updated Tue, 30 Sep 2025 06:01 AM IST
सार

शुरुआती दिनों में बंगाली समाज की नगर में विशेष पहचान नहीं थी। इस उत्सवी परंपरा को सार्वजानिक रूप से मनाए जाने के कारण गैर बंगाली लोगों को भी सम्मिलित किया गया। जो नगर के बहुत ही प्रतिष्ठित लोग थे।

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Indore's Shakti Sthal: The Bengali community has been celebrating the public Durga festival for 98 years
इंदौर में बंगाली समाज 106 वर्ष से दुर्गा उत्सव मना रहा है। - फोटो : अमर उजाला
इंदौर में बंगाली समाज 106 वर्ष से दुर्गा उत्सव मना रहा है। हालांकि, इस समाज द्वारा सार्वजनिक रूप से नवदुर्गा उत्सव मनाए जाने का यह 98 वां वर्ष है। बंगाली समाज का दुर्गा उत्सव पांच दिवसीय रहता है और सिंदूर खेला के साथ संपन्न होता है। इन पांच दिनों में विभिन्न कार्यक्रम होते हैं, जिसमें बंगाली समाज के लोग एकत्र होते हैं।


दरअसल, शहर में सूती कपड़ा उद्योग के कारण देश के अलग-अलग राज्यों से लोग इन मिलों में काम के लिए इंदौर आए थे और फिर यहीं के होकर रह गए। कपड़ा मिलों में कार्य के अलावा उससे जुड़े भी कई कार्य थे, जो अलग-अलग क्षेत्रों में होते थे। होलकर रियासत में बाहरी लोगों के लिए शहर के द्वार खुले थे। इसी का परिणाम है कि नगर का उद्योग-व्यवसाय देश ही नहीं वरन संपूर्ण विश्व में अपनी अलग पहचान रखता है। विभिन्न राज्यों से आए नागरिकों ने अपने अलग समूहों में अपने राज्य के त्योहार मनाए जाने का क्रम आरंभ किया।

कब आए इंदौर बंगाली समाज के लोग 
1830 के आरंभ में चंदन नगर पश्चिम बंगाल से गणेश चंद्र दास और भगवान चंद्र दत्त इंदौर आए और यहीं बस गए। इसके बाद नगर में बंगालियों के आगमन का सिलसिला आरंभ हुआ। कहा जाता है कि जहां पांच बंगाली परिवार एकत्र हो जाते हैं, वहां देवी की स्थापना हो जाती है क्योंकि बंगालियों का शक्ति आराधना में देवी पूजन प्रमुख पर्व है।

 
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बंगाली समाज का दुर्गा उत्सव पांच दिवसीय रहता है - फोटो : अमर उजाला
1918 में मना पहला दुर्गा उत्सव 
बंगाली परिवारों का धीरे-धीरे नगर में आगमन होता गया और इन्हीं परिवारों द्वारा इंदौर में 1918 में अपने क्षेत्र में नवदुर्गा उत्सव मनाया जाने लगा। यह उत्सवी परंपरा बंगाली क्लब के बैनर तले 1928 में सार्वजनिक रूप से शुरू हुई। तब तक नगर में 125 से अधिक बंगाली परिवार आ गए थे। इन्हीं परिवारों ने सार्वजनिक रूप से शारदीय नवरात्र उत्सव मनाना आरंभ किया। इसके प्रेरणा स्रोत थे, गोपाल चंद्र मुखर्जी, जेएन बनर्जी, भूपेंद्रनाथ बसु और हेमचंद्र डे।

अन्य समाज का भी सहयोग रहा 
शुरुआती दिनों में बंगाली समाज की नगर में विशेष पहचान नहीं थी। इस उत्सवी परंपरा को सार्वजानिक रूप से मनाए जाने के कारण गैर बंगाली लोगों को भी सम्मिलित किया गया। जो नगर के बहुत ही प्रतिष्ठित लोग थे। इनमें प्रमुख नाम पंडित मुकुंदराम भवानी शंकर त्रिवेदी, सेठ मोतीलाल, पंडित ख्यालीराम द्विवेदी, कैप्टन कृष्णलाल, पंडित रामचंद्र शर्मा और शंभूनाथ त्रिपाठी प्रमुख थे।



कहां आयोजित हुआ था पहला कार्यक्रम 
1928 से सार्वजनिक नवदुर्गा उत्सव समिति का कार्यक्रम आयोजित होने के बाद इसे किसी अन्य स्थान पर भव्य रूप से आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए वर्तमान में सरवटे बस स्टैंड के सामने स्थित सेठ टीकमचंद मूलचंद की धर्मशाला वाले स्थान पर पहला कार्यक्रम आयोजित किया गया था। उस समय धर्मशाला निर्मित नहीं थी और खुला मैदान था।

 
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Indore's Shakti Sthal: The Bengali community has been celebrating the public Durga festival for 98 years
धुनुची नृत्य करते हुए माता की आराधना की। - फोटो : अमर उजाला
फिर नवलखा में जमीन खरीदी
बंगाली क्लब की नवलखा स्थित जमीन 1963 में क्रय की गई और यहां दुर्गा उत्सव की परंपरा शुरू हुई। इस स्थान पर अब पांच दिवसीय दुर्गा पूजा का कार्यक्रम आयोजित होता है।  प्रवेश द्वार और देवी की भव्य मूर्ति बंगाली कारीगरों द्वारा बनाई जाती है। इस वर्ष जयपुर के महल की आकृति का द्वार निर्मित किया गया है। बंगाली क्लब परिसर में अस्सी के दशक में देवी कालका का भव्य मंदिर का निर्माण किया था।  क्लब द्वारा स्कूल भी संचालित किया जाता है।

अब विस्तृत हुआ दायरा 
अब बंगाली समाज के लोग नगर के विभिन्न क्षेत्रों में रहने लगे हैं। इसके बाद दुर्गा पूजा उत्सव वर्तमान में कई स्थानों पर होने लगा है। विजय नगर, बंगाली कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड समेत अन्य क्षेत्रों में बंगाली समाज नवदुर्गा उत्सव आयोजित करता है।
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