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Mahakal Holi 2026: सबसे पहले बाबा महाकाल के आंगन में होलिका दहन, भक्तों ने लगाए जयकारे, उड़ाया गुलाल

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: Dinesh Sharma Updated Mon, 02 Mar 2026 07:44 PM IST
सार

महाकालेश्वर मंदिर में फाल्गुन पूर्णिमा पर सबसे पहले होलिका दहन कर होली उत्सव की शुरुआत की जाती है। परंपरा अनुसार पूरे उज्जैन में इससे पहले होली नहीं जलाई जाती। अग्नि की विभूति से अगले दिन भस्म आरती में भगवान महाकाल का श्रृंगार कर भक्तों की आस्था प्रकट होती है।

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Mahakal Holi 2026: Holika Dahan Begins First in Ujjain Mahakaleshwar Temple Courtyard
महाकाल के आंगन में होलिका दहन - फोटो : अमर उजाला
वैसे तो पूरे देश में त्योहार पंचांग के हिसाब से मनाए जाते हैं, लेकिन बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन की बात ही कुछ अलग है। यहां हर उत्सव की शुरुआत सबसे पहले भगवान के आंगन से ही होती है। सोमवार को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भी पूरी दुनिया से पहले महाकाल मंदिर के परिसर में होलिका दहन किया गया। 


यहां की परंपरा इतनी खास है कि जब तक महाकाल के दरबार में होली की अग्नि नहीं जलती, तब तक पूरे उज्जैन में कहीं और होलिका नहीं जलाई जाती। इसके पीछे लोगों की गहरी आस्था तो है ही, साथ ही यह महादेव की सहजता को भी दिखाता है कि वे ही इस पूरी सृष्टि के स्वामी हैं और हर खुशी की शुरुआत उन्हीं से होनी चाहिए।

राजाधिराज के दरबार से शुरुआत
उज्जैन में महाकाल को वहां का राजा माना जाता है। पुरानी परंपरा के अनुसार, प्रजा अपने राजा के घर उत्सव मनाने के बाद ही अपने घरों में त्योहार मनाती है। यही वजह है कि होलिका दहन के दिन सबसे पहले मंदिर में विशेष पूजा और संध्या आरती हुई। इसके बाद पुजारियों के मंत्रोच्चार के साथ मंदिर प्रांगण की होली जलाई जाती है। माना जाता है कि महाकाल की अग्नि में आहुति देने से पूरे नगर की नकारात्मक शक्तियां दूर होने की संभावना बढ़ जाती है। इस पावन अग्नि के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं।

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महाकाल के आंगन ऐसे सजी थी होली - फोटो : अमर उजाला
शिव और शक्ति का अटूट विश्वास
महाकाल मंदिर की होली केवल लकड़ियों का जलना नहीं है, बल्कि यह शिव और शक्ति के प्रति अटूट विश्वास का पर्व है। मंदिर में होने वाले इस आयोजन में सबसे पहले गुलाल बाबा को अर्पित किया जाता है। जहां दुनिया भर में लोग भद्रा या सूतक को लेकर मन में आशंका पालते हैं। वहीं, महाकाल के भक्त उनकी शरण में आकर हर डर से मुक्त हो जाते हैं। बाबा की कृपा ऐसी है कि वे अपने भक्तों के हर दुख को दूर कर देते हैं। इस उत्सव का संचालन मंदिर समिति और पुजारी बड़ी ही भव्यता के साथ करते हैं।

विभूति से श्रृंगार और दिव्य भस्म आरती
महाकाल की नगरी में होली का उत्सव तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक बाबा अपने भक्तों के साथ भस्म और गुलाल न खेलें। फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को मंदिर परिसर में होलिका दहन के पश्चात, उस पवित्र अग्नि की राख यानी विभूति को अत्यंत श्रद्धा के साथ एकत्रित किया जाता है। अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली विशेष भस्म आरती में इसी ताजी राख से भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार किया जाता है। भक्तों के मन में यह गहरी आस्था है कि इस पावन भस्म को धारण करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होने की संभावना बढ़ जाती है। यह परंपरा महादेव की सहजता और उनके प्रति अटूट श्रद्धा को दर्शाती है, जहां भक्त अपने आराध्य के साथ रंगों के इस पर्व का संचालन बड़ी ही श्रद्धा के साथ करते हैं।
 
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