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Holashtak 2026: कल से शुरू होलाष्टक, जानें होली से पहले ये 8 दिन क्यों माने जाते हैं अशुभ

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति मेहरा Updated Mon, 23 Feb 2026 03:41 PM IST
सार

Holashtak 2026: परंपरा के अनुसार होलाष्टक से लेकर होलिका दहन तक किसी भी प्रकार के शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। आइए जानते हैं कि होली से पहले आने वाले ये 8 दिन अशुभ क्यों माने जाते हैं। 

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होलाष्टक 2026 - फोटो : amar ujala

Why Holashtak Is Inauspicious: फाल्गुन शुक्ल पक्ष की सप्तमी 24 फरवरी 2026, मंगलवार को सुबह 7:01 बजे तक रहेगी। इसके बाद जैसे ही फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी, उसी क्षण से होलाष्टक की शुरुआत मानी जाएगी। परंपरा के अनुसार होलाष्टक से लेकर होलिका दहन तक किसी भी प्रकार के शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। हालांकि इस संबंध में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं, और कई विद्वान इनके पीछे मौसमी व सामाजिक कारण भी मानते हैं। आइए जानते हैं कि होली से पहले आने वाले ये 8 दिन अशुभ क्यों माने जाते हैं। 



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होलाष्टक क्या है? - फोटो : amar ujala

होलाष्टक क्या है?
धर्मशास्त्रों में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होलिका दहन तक के आठ दिनों को ‘होलाष्टक’ कहा गया है। ज्योतिष ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि इन आठ दिनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण जैसे मांगलिक कार्यों से परहेज करना चाहिए। ‘होलाष्टक’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है, ‘होला’ अर्थात होली और ‘अष्टक’ यानी आठ। इस तरह होली से पहले के आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में नई वस्तु खरीदना या कोई बड़ा शुभ कार्य शुरू करना टाल देना चाहिए।

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होलाष्टक की उत्पत्ति से जुड़ी मान्यता - फोटो : अमर उजाला

होलाष्टक की उत्पत्ति से जुड़ी मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार होलाष्टक की शुरुआत एक विशेष घटना से जुड़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि जब भगवान शिव ने क्रोधित होकर कामदेव को भस्म कर दिया था, उसी समय से इन आठ दिनों को विशेष माना जाने लगा। इन दिनों को संयम, साधना और आत्मचिंतन का समय माना जाता है। यही कारण है कि सोलह संस्कारों में से अधिकांश संस्कार इस अवधि में नहीं किए जाते। यदि कोई आवश्यक कार्य करना भी पड़े, तो पहले शांति पाठ या विशेष पूजन का विधान बताया गया है।
 

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होलाष्टक की उत्पत्ति से जुड़ी मान्यता - फोटो : adobe stock

एक अन्य कथा के अनुसार, इन्हीं आठ दिनों में असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति छोड़ने के लिए अत्याचार किए थे। लेकिन अपार कष्टों के बाद भी प्रह्लाद अपनी भक्ति में अडिग रहे। आखिर में उनकी रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन मनाया जाता है। 

भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने होली से पहले आठ दिनों तक गोपियों के साथ रंगोत्सव मनाया था। दुलहंडी के दिन रंगों से भीगे वस्त्र अग्नि को अर्पित किए गए, जिसके बाद यह परंपरा उत्सव के रूप में स्थापित हो गई। इस प्रकार होलाष्टक केवल वर्जनाओं का समय नहीं है, बल्कि यह भक्ति, तैयारी और आत्मसंयम का भी काल है, जो हमें होली के उल्लासपूर्ण पर्व के लिए मानसिक और सामाजिक रूप से तैयार करता है।

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होलाष्टक का महत्व - फोटो : amar ujala

होलाष्टक का महत्व
होलाष्टक को होली पर्व की औपचारिक शुरुआत भी माना जाता है। जैसे ही यह काल आरंभ होता है, वैसे ही गांव-शहरों में होलिका दहन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। यह समय केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्रकृति के बदलाव के कारण भी खास माना जाता है। इस अवधि में मौसम बदलने लगता है, सर्दी धीरे-धीरे विदा लेती है और गर्मी का प्रभाव दिखाई देने लगता है। बदलते मौसम में स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां जरूरी होती हैं, इसलिए भी बड़े आयोजनों से बचने की परंपरा रही है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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