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Holashtak 2026: भक्त प्रह्लाद की कथा से जुड़ा होलाष्टक, जानिए शुभ कार्यों पर क्यों लगती है रोक ?
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 21 Feb 2026 12:25 PM IST
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सार
Holashtak 2026: होली से पहले 8 दिन होलाष्टक का समय होता है, जिसे शुभ नहीं माना जाता है। होलाष्टक में शुभ और मांगलिक कार्य करना वर्जित होता है।
होलाष्टक 2026
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
Holashtak 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से लेकर पूर्णिमा तक के आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। यह वही समय है जब होली का उत्सव निकट होता है, किंतु धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इन आठ दिनों को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है। पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में होलाष्टक 24 फरवरी से शुरू होकर 3 मार्च तक रहेंगे। 3 मार्च को होलिका दहन के साथ ही यह अशुभ अवधि समाप्त हो जाएगी।
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क्यों माने जाते हैं ये दिन अशुभ ?
पौराणिक कथा के अनुसार होलाष्टक का संबंध भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा से जुड़ा है। जब हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति से रोकने के लिए अनेक यातनाएँ दीं, तब फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक उसे विभिन्न प्रकार के कष्ट दिए गए। अंततः पूर्णिमा की रात्रि में होलिका अग्नि में भस्म हुई और भक्त प्रह्लाद की भक्ति की विजय हुई। इसी कारण इन आठ दिनों को उग्र और अशांत ऊर्जा का समय माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में भी कहा गया है कि इस अवधि में ग्रहों की स्थिति कुछ अस्थिर मानी जाती है, जिससे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण जैसे मांगलिक कार्य टाल दिए जाते हैं।
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किन कार्यों से बचने की परंपरा ?
धार्मिक मान्यता है कि होलाष्टक के दौरान नए कार्यों की शुरुआत, सगाई-विवाह, भूमि पूजन, नया व्यापार प्रारंभ करना अथवा कोई बड़ा निवेश करने से बचना चाहिए। विशेष रूप से उत्तर भारत में इस परंपरा का अधिक पालन किया जाता है। हालांकि यह भी सत्य है कि किसी अत्यावश्यक कार्य को पूरी श्रद्धा और उचित मुहूर्त में किया जाए तो उसका फल प्रतिकूल नहीं होता। शास्त्रों में ‘भाव’ को प्रधानता दी गई है।
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साधना और उपासना का श्रेष्ठ समय
जहां एक ओर होलाष्टक को मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित माना गया है, वहीं दूसरी ओर इसे साधना, जप, तप और भक्ति के लिए अत्यंत उत्तम समय बताया गया है। इन दिनों भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और नरसिंह भगवान की उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है। भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति हमें यह संदेश देती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी ईश्वर पर विश्वास अडिग रखना चाहिए। होलाष्टक आत्ममंथन और नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्यागने का अवसर भी प्रदान करता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि
होलाष्टक केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें संयम और धैर्य का पाठ भी पढ़ाता है। यह आठ दिन हमें याद दिलाते हैं कि उत्सव से पहले आत्मशुद्धि आवश्यक है। होली जैसे रंगों के पर्व से पहले यह समय मन के विकारों को जलाने और सकारात्मकता को अपनाने का प्रतीक है। जब पूर्णिमा की रात्रि में होलिका दहन होता है, तब यह केवल लकड़ियों का दहन नहीं, बल्कि अहंकार, अन्याय और नकारात्मकता का अंत भी माना जाता है। इस प्रकार होलाष्टक आस्था, अनुशासन और साधना का संगम है। यह हमें सिखाता है कि हर उत्सव से पहले आत्मसंयम और श्रद्धा का दीप प्रज्वलित करना आवश्यक है।
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