Parusharam Jayanti Kab Hai: परशुराम जयंती भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को समर्पित माना जाता है। इस दिन भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान परशुराम की पूजा-अर्चना करते हैं और उनके निमित्त व्रत भी रखते हैं। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भगवान परशुराम का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था, लेकिन उन्होंने अधर्म और अन्याय के खिलाफ शस्त्र उठाकर धर्म की रक्षा की। इसलिए उन्हें धर्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय माना जाता है। उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि धर्म की रक्षा के लिए सही समय पर साहस और शक्ति दोनों आवश्यक होते हैं। परशुराम जयंती के अवसर पर भक्त भगवान विष्णु के इस अवतार का स्मरण करते हैं और उनकी पूजा कर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शक्ति की कामना करते हैं।
Parashuram Jayanti: कब है परशुराम जयंती? जानें सही तिथि, पूजा विधि और महत्व
Parusharam Jayanti Date: परशुराम जयंती भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को समर्पित माना जाता है। परशुराम जयंती के अवसर पर भक्त भगवान विष्णु के इस अवतार का स्मरण करते हैं और उनकी पूजा कर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शक्ति की कामना करते हैं।
कब मनाई जाएगी परशुराम जयंती
तृतीया तिथि आरंभ 19 अप्रैल, प्रातः 10:50 मिनट पर
तृतीया तिथि समाप्त 20 अप्रैल, प्रातः 7:28 मिनट तक
चूंकि 19 अप्रैल को तृतीया तिथि पूरे दिन रहेगी, इसलिए इसी दिन अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती दोनों मनाई जाएगी।
क्यों मनाई जाती है परशुराम जयंती
भगवान परशुराम का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया के प्रदोष काल में हुआ था। इसलिए परंपरा के अनुसार जिस दिन प्रदोष काल में यह तिथि व्याप्त होती है, उसी दिन परशुराम जयंती मनाना अधिक शुभ माना जाता है। इसी आधार पर इस वर्ष 19 अप्रैल को ही परशुराम जयंती का पर्व मनाने का विधान बन रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम का स्मरण करने से व्यक्ति को साहस, शक्ति और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना ही सच्चा धर्म है।
भगवान परशुराम को परशु किसने दिया था?
भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे। इसलिए उन्हें जामदग्न्य भी कहा जाता है। वे भगवान शिव के परम भक्त और उनके शिष्य माने जाते हैं। परशुराम जी की गहरी भक्ति, तपस्या और योग्यता से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक दिव्य शस्त्र प्रदान किया था जिसे ‘परशु’ कहा जाता है। इसी दिव्य परशु का नाम विद्युदभि बताया जाता है। इसे भगवान शिव ने परशुराम जी को दिया था। परशुराम जी हमेशा इस परशु को अपने साथ रखते थे और इसी कारण वे परशुराम नाम से प्रसिद्ध हो गए। उनका जीवन धर्म, शक्ति और न्याय का प्रतीक माना जाता है, और यह परशु उनके साहस और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक बन गया।
परशुराम जयंती पूजा विधि
- परशुराम जयंती के दिन भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान परशुराम की पूजा करते हैं। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद पूजा करने का संकल्प लेना चाहिए और मन को शांत रखते हुए भगवान की आराधना की तैयारी करनी चाहिए।
- इसके बाद घर या मंदिर में भगवान परशुराम की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ स्थान पर स्थापित किया जाता है। पूजा की शुरुआत में भगवान परशुराम को तिलक लगाया जाता है और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है। इसके बाद अक्षत, पुष्प और तुलसी अर्पित कर विधिवत पूजा की जाती है।
- पूजा के दौरान भगवान परशुराम के मंत्रों का जप किया जाता है या फिर भगवान विष्णु की स्तुति की जाती है, क्योंकि परशुराम जी को विष्णु का अवतार माना जाता है। इसके बाद श्रद्धापूर्वक उनकी आरती की जाती है और उनसे जीवन में सुख, शांति और शक्ति की कामना की जाती है।
- चूंकि इस दिन अक्षय तृतीया भी होती है, इसलिए दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना बहुत शुभ माना जाता है, जिससे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
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