धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: श्वेता सिंह
Updated Sat, 18 Jul 2026 11:23 AM IST
सार
Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक पर्व है। साल 2026 में राखी की तारीख को लेकर कई लोगों के मन में 27 और 28 अगस्त को लेकर भ्रम है। ऐसे में आइए जानते हैं पंचांग के अनुसार रक्षाबंधन की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और भद्रा काल से जुड़ी पूरी जानकारी।
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रक्षाबंधन 2026
- फोटो : amar ujala
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Rakshabandhan 2026 Date: सनातन परंपरा में भाई-बहन के पावन स्नेह-बंधन का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व सावन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। शास्त्रों में इस दिन को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है, जब बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधकर उसकी दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करती है, और भाई अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है। किंतु इस वर्ष सावन पूर्णिमा तिथि दो दिनों में विभाजित होने के कारण भक्तों के मध्य 27 या 28 अगस्त, किस दिन रक्षाबंधन मनाया जाए, इसे लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। आइए पंचांग की गणना के आधार पर इस भ्रम को दूर करें और जानें कि राखी बांधने का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा।
रक्षाबंधन 2026 की सही तिथि
ज्योतिष गणना के अनुसार, सावन पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 27 अगस्त 2026, गुरुवार को प्रातः 9 बजकर 8 मिनट पर होगा, तथा इसका समापन अगले दिन अर्थात 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को प्रातः 9 बजकर 48 मिनट पर होगा। सनातन धर्म में किसी भी व्रत-पर्व के निर्धारण में उदयातिथि को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है, अर्थात जिस तिथि में सूर्योदय हो, वही तिथि पर्व के लिए मान्य होती है। इसी सिद्धांत के अनुसार,चूंकि 28 अगस्त को सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी, अतः रक्षाबंधन का पावन पर्व 28 अगस्त 2026, शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। इस दिन संपूर्ण भारतवर्ष में भाई-बहन के स्नेह का यह पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।
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राखी बांधने का शुभ मुहूर्त
- फोटो : Freepik
राखी बांधने का शुभ मुहूर्त
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार रक्षाबंधन पर राखी बांधने से पूर्व भद्रा काल का त्याग करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है, क्योंकि भद्रा काल में किया गया कोई भी शुभ कार्य निष्फल माना जाता है। इस वर्ष शुभ समाचार यह है कि 28 अगस्त को भद्रा सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाएगी, जिससे संपूर्ण दिन राखी बांधने के लिए शुभ रहेगा। राखी बांधने का मुख्य शुभ मुहूर्त प्रातः 5 बजकर 57 मिनट से लेकर प्रातः 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा, अर्थात सूर्योदय से लेकर पूर्णिमा तिथि की समाप्ति तक का यह संपूर्ण काल राखी बांधने हेतु उत्तम माना गया है। इसके पश्चात प्रतिपदा तिथि का आरंभ हो जाएगा। ज्योतिषीय दृष्टि से इस मुहूर्त में बांधा गया रक्षा-सूत्र भाई की आयु, यश और समृद्धि में वृद्धि करने वाला माना जाता है।
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रक्षाबंधन का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
- फोटो : Adobe stock
रक्षाबंधन का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
रक्षाबंधन का पर्व भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के अटूट स्नेह-बंधन का प्रतीक माना जाता है। इस शुभ दिन बहनें अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं, आरती उतारती हैं और उसकी कलाई पर राखी बांधती हैं, जिसके प्रत्युत्तर में भाई अपनी बहन को शगुन देते हैं तथा उसकी रक्षा का पवित्र वचन देते हैं। बहनें इस दिन विशेष रूप से अपने भाई की दीर्घायु और सुखी जीवन के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में शिशुपाल वध के समय जब भगवान श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त बहने लगा था, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। इस स्नेहपूर्ण कृत्य से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को सदैव रक्षा करने का वचन दिया था, और आगे चलकर चीरहरण के प्रसंग में उन्होंने अपना यह वचन निभाया भी। इसी पौराणिक प्रसंग को रक्षाबंधन की परंपरा का एक प्रमुख आधार माना जाता है। सदियों से चली आ रही यह पावन परंपरा आज भी भारतीय समाज में भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और रक्षा के भाव को सुदृढ़ करती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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