धार्मिक ग्रंथो के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तक का समय श्राद्ध या महालय पक्ष कहलाता है। इस अवधि के 16 दिन पितरों अर्थात श्राद्ध कर्म के लिए विशेष रूप से निर्धारित किए गए हैं। यही अवधि पितृ पक्ष के नाम से जानी जाती है। पितृ पक्ष में किए गए श्राद्ध कर्म से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। मान्यता है इन 16 तिथियों पर पितर मृत्यु लोक से धरती पर आते हैं। इस अवधि में पितर हमसे और हम पितरों के करीब आ जाते हैं। श्राद्ध पक्ष का संबंध मृत्यु से होता है इसलिए इन तिथियों में शुभ और मांगलिक कार्यों को त्यागकर पितरों के प्रति सम्मान और एकाग्रता रखते हैं।
पितृ पक्ष में क्यों नहीं होते शुभ कार्य? क्या है कौवे और श्वान का महत्व
श्राद्ध में ब्राह्राण, गाय ,कौए और श्वान का महत्व
श्राद्ध पक्ष में पितरों के अलावा ब्राह्राण,गाय, श्वान और कौए को भोजन खिलाने की परंपरा है। गाय में सभी देवी-देवताओं का वास होता है इसलिए गाय का महत्व है। वहीं पितर पक्ष में श्वान और कौए पितर का रूप होते हैं इसलिए उन्हें भोजन खिलाने का विधान है। पितृपक्ष के दौरान इनका खास ध्यान रखने की परंपरा है।
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- घर के आसपास अगर आपको कौए की चोंच में फूल-पत्ती दिखाई दे जाए तो मनोरथ की सिद्धि होती है।
- कौआ गाय की पीठ पर चोंच को रगड़ता हुआ दिखाई तो समझिए आपको उत्तम भोजन की प्राप्ति होगी।
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- कौआ अनाज के ढ़ेर पर बैठा मिले, तो धन लाभ होता है।
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- कौआ मकान की छत पर या हरे-भरे वृक्ष पर जाकर बैठे तो अचानक धन लाभ होता है।
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