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जसपाल राणा की कहानी: मनु भाकर की सफलता के पीछे था गुरु जसपाल का निशानेबाजी के प्रति जुनून, काफी किया संघर्ष
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शोभित चतुर्वेदी
Updated Fri, 12 Jun 2026 10:37 AM IST
सार
Indian Shooter Jaspal Rana: भारतीय टीम के मशहूर निशानेबाजी कोच और एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता जसपाल राणा का शुक्रवार को निधन हो गया। जसपाल का अचानक दुनिया से जाना खेल जगत के लिए गहरी क्षति है। मनु भाकर, सौरव चौधरी और ईशा सिंह जैसे निशानेबाजों को उभारने में जसपाल का बड़ा योगदान रहा। आइए जानते हैं कौन हैं जसपाल राणा...
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मनु भाकर और जसपाल राणा
- फोटो : ANI
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भारत के पूर्व पिस्टल निशानेबाज जसपाल राणा ने असाधारण प्रतिभा के तौर पर सुर्खियों में आने के बाद जूनियर रिकॉर्ड तोड़ा और कई अंतरराष्ट्रीय पदक जीते और उनकी इस यात्रा में उनका निशानेबाजी के प्रति जुनून और इसके प्रति समर्पण उनकी पहचान रही है। ओलंपिक पदक उनकी कैबिनेट में शामिल नहीं हो सका, लेकिन जब पेरिस ओलंपिक 2024 में मनु भाकर पोडियम पर खड़ी हुईं तो उनका सपना साकार हो गया था। जब पोडियम पर कांस्य पदक मनु के गर्दन में दमक रहा था तो जसपाल स्टैंड में तालियां बजा रहे थे। भारतीय निशानेबाजी टीम के कोच जसपाल का शुक्रवार को 49 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।
जसपाल राणा
- फोटो : ANI
हमेशा सुर्खियों में रहे जसपाल
किशोरावस्था से ही अलग-थलग रहने वाले जसपाल हमेशा किसी न किसी मामले में सुर्खियों में रहे हैं। चाहे इनमें कई बार वापसी करना हो, 30 की उम्र के बाद भी अपने करियर को बचाने की कोशिश करना हो, सिस्टम से लड़ाई लड़ना हो या फिर राजनीति में उतरना हो। दोहा 2006 के एशियाई खेलों के दौरान उन्होंने 102 डिग्री बुखार होने के बावजूद तीन स्वर्ण पदक जीते थे जो ऐसा रिकॉर्ड है जिसे कोई भी भारतीय निशानेबाज महाद्वीपीय टूर्नामेंट में कभी नहीं तोड़ पाया।
किशोरावस्था से ही अलग-थलग रहने वाले जसपाल हमेशा किसी न किसी मामले में सुर्खियों में रहे हैं। चाहे इनमें कई बार वापसी करना हो, 30 की उम्र के बाद भी अपने करियर को बचाने की कोशिश करना हो, सिस्टम से लड़ाई लड़ना हो या फिर राजनीति में उतरना हो। दोहा 2006 के एशियाई खेलों के दौरान उन्होंने 102 डिग्री बुखार होने के बावजूद तीन स्वर्ण पदक जीते थे जो ऐसा रिकॉर्ड है जिसे कोई भी भारतीय निशानेबाज महाद्वीपीय टूर्नामेंट में कभी नहीं तोड़ पाया।
जसपाल राणा
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
जसपाल के संघर्ष की कहानी
जसपाल के लंबे बिखरे बाल उनके चेहरे से चिपके हुए थे और पसीना टपक रहा था जैसे किसी ने उन पर पानी की बोतल भर कर डाल दी हो। दोहा से लगभग 12 साल पहले 1994 के हिरोशिमा एशियाई खेलों में वह 25 मीटर सेंटर-फायर पिस्टल में स्वर्ण जीतने वाले चार भारतीयों में से एक थे। इससे ही भारतीय निशानेबाजों में प्रतिभा होने का भरोसा हुआ कि सरकार की थोड़ी सी मदद से वे विश्व विजेता बन सकते हैं। उनकी यात्रा में उन्हें दुनिया के तत्कालीन अग्रणी पिस्टल कोचों में से एक टिबोर गोन्जालो ने सहायता की। वह लंबे समय तक भारत के कोच रहे। जसपाल को शायद गोन्जालो से सावधानी बरतने वाला स्वभाव विरासत में मिला है, जो एक नोटबुक, पेंसिल और गले में एक सीटी लटकाए घूमते थे और हर किसी की ताकत और कमजोरियों को नोट करते थे।
जसपाल के लंबे बिखरे बाल उनके चेहरे से चिपके हुए थे और पसीना टपक रहा था जैसे किसी ने उन पर पानी की बोतल भर कर डाल दी हो। दोहा से लगभग 12 साल पहले 1994 के हिरोशिमा एशियाई खेलों में वह 25 मीटर सेंटर-फायर पिस्टल में स्वर्ण जीतने वाले चार भारतीयों में से एक थे। इससे ही भारतीय निशानेबाजों में प्रतिभा होने का भरोसा हुआ कि सरकार की थोड़ी सी मदद से वे विश्व विजेता बन सकते हैं। उनकी यात्रा में उन्हें दुनिया के तत्कालीन अग्रणी पिस्टल कोचों में से एक टिबोर गोन्जालो ने सहायता की। वह लंबे समय तक भारत के कोच रहे। जसपाल को शायद गोन्जालो से सावधानी बरतने वाला स्वभाव विरासत में मिला है, जो एक नोटबुक, पेंसिल और गले में एक सीटी लटकाए घूमते थे और हर किसी की ताकत और कमजोरियों को नोट करते थे।
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अभिनव बिंद्र, मनु भाकर, जसपाल राणा
- फोटो : Instagram
जसपाल नहीं जीत सके ओलंपिक पदक
जसपाल ने हमेशा ओलंपिक का लक्ष्य बनाया था, लेकिन उन्हें इस बात का अफसोस रहा कि स्टैंडर्ड पिस्टल और सेंटर-फायर पिस्टल ओलंपिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बने। जसपाल को प्रतिभा को आगे लाने का मौका तब मिला जब उन्हें जूनियर राष्ट्रीय कोच नियुक्त किया गया। इसी दौरान उन्होंने मनु और सौरभ चौधरी की प्रतिभा देखी, दोनों ने 2021 में टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, मनु के साथ अनबन के कारण टोक्यो से पहले दोनों के रास्ते अलग हो गए, जिससे हर कोई अनजान रह गया। जब वह 2018 जकार्ता एशियाई खेलों में भारतीय टीम के साथ थे, तो वह एक कठिन टास्कमास्टर थे। तब 16 वर्षीय मनु दबाव के माहौल में नई थी और हार मान ली थी और इससे जसपाल बहुत गुस्से में थे। खुद एक असाधारण प्रतिभा होने के कारण जसपाल को इस बात का अंदेशा हो गया था कि मनु उनकी तरह ही बनेगी। उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि वह अभी भी एक शर्मीली किशोरी थी जो हरियाणा के एक छोटे से जिले से आई थी और खेल की बेहद प्रतिस्पर्धी दुनिया में कदम रख रही थी।
जसपाल ने हमेशा ओलंपिक का लक्ष्य बनाया था, लेकिन उन्हें इस बात का अफसोस रहा कि स्टैंडर्ड पिस्टल और सेंटर-फायर पिस्टल ओलंपिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बने। जसपाल को प्रतिभा को आगे लाने का मौका तब मिला जब उन्हें जूनियर राष्ट्रीय कोच नियुक्त किया गया। इसी दौरान उन्होंने मनु और सौरभ चौधरी की प्रतिभा देखी, दोनों ने 2021 में टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, मनु के साथ अनबन के कारण टोक्यो से पहले दोनों के रास्ते अलग हो गए, जिससे हर कोई अनजान रह गया। जब वह 2018 जकार्ता एशियाई खेलों में भारतीय टीम के साथ थे, तो वह एक कठिन टास्कमास्टर थे। तब 16 वर्षीय मनु दबाव के माहौल में नई थी और हार मान ली थी और इससे जसपाल बहुत गुस्से में थे। खुद एक असाधारण प्रतिभा होने के कारण जसपाल को इस बात का अंदेशा हो गया था कि मनु उनकी तरह ही बनेगी। उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि वह अभी भी एक शर्मीली किशोरी थी जो हरियाणा के एक छोटे से जिले से आई थी और खेल की बेहद प्रतिस्पर्धी दुनिया में कदम रख रही थी।
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मनु भाकर और जसपाल राणा
- फोटो : PTI
टोक्यो ओलंपिक से पहले अलग हुए थे जसपाल और मनु
इसके बाद टोक्यो ओलंपिक से पहले दोनों अलग हो गए थे। तब किस्मत ने मनु को धोखा दिया था। वह 10 मीटर एयर पिस्टल के फाइनल में जगह बनाने के करीब पहुंची, लेकिन पिस्टल की खराबी के कारण उनकी उम्मीदें खत्म हो गईं। टोक्यो के बाद झज्जर की इस शूटर के लिए चीजें खराब होने लगीं और जिस तरह से उनका जसपाल के साथ 'ब्रेकअप' हुआ था, उसी तरह 'पैच-अप' भी हो गया। शायद, उन्होंने जसपाल में एकमात्र कोच देखा जो उनके करियर को आकार दे सकता था। और, शायद, जसपाल ने उनमें एक प्रतिभा देखी थी जिसे वह सुधार कर अगले स्तर पर ले जा सकते थे। हर सत्र, हर परीक्षण में वह मनु पर पैनी नजर रखने लगे और किसी भी विशेषज्ञ, कोच या प्रशिक्षक को अपने वार्ड के करीब नहीं आने देते थे।
व्यक्तिगत प्रशिक्षकों के लिए राष्ट्रीय महासंघ के कड़े नियमों के कारण वह दर्शक दीर्घा तक ही सीमित थे, लेकिन उन्होंने जो सांकेतिक भाषा गढ़ी थी वह पर्याप्त थी। कमांड को जसपाल ने स्टैंड से रिले किया और फायरिंग बे पर मनु ने इसे स्वीकार भी किया। सब कुछ 'टी' पर प्लॉट किया गया है, चाहे वह पिस्तौल की लकड़ी की पकड़ हो, जिसे जसपाल ने मनु के लिए सावधानीपूर्वक तैयार किया हो, या उसकी पिस्तौल की फाइन-ट्यूनिंग हो। अब चूंकि जसपाल हम सबके बीच नहीं रहे तो यह भारतीय निशानेबाजी के लिए एक बड़ा झटका है।
इसके बाद टोक्यो ओलंपिक से पहले दोनों अलग हो गए थे। तब किस्मत ने मनु को धोखा दिया था। वह 10 मीटर एयर पिस्टल के फाइनल में जगह बनाने के करीब पहुंची, लेकिन पिस्टल की खराबी के कारण उनकी उम्मीदें खत्म हो गईं। टोक्यो के बाद झज्जर की इस शूटर के लिए चीजें खराब होने लगीं और जिस तरह से उनका जसपाल के साथ 'ब्रेकअप' हुआ था, उसी तरह 'पैच-अप' भी हो गया। शायद, उन्होंने जसपाल में एकमात्र कोच देखा जो उनके करियर को आकार दे सकता था। और, शायद, जसपाल ने उनमें एक प्रतिभा देखी थी जिसे वह सुधार कर अगले स्तर पर ले जा सकते थे। हर सत्र, हर परीक्षण में वह मनु पर पैनी नजर रखने लगे और किसी भी विशेषज्ञ, कोच या प्रशिक्षक को अपने वार्ड के करीब नहीं आने देते थे।
व्यक्तिगत प्रशिक्षकों के लिए राष्ट्रीय महासंघ के कड़े नियमों के कारण वह दर्शक दीर्घा तक ही सीमित थे, लेकिन उन्होंने जो सांकेतिक भाषा गढ़ी थी वह पर्याप्त थी। कमांड को जसपाल ने स्टैंड से रिले किया और फायरिंग बे पर मनु ने इसे स्वीकार भी किया। सब कुछ 'टी' पर प्लॉट किया गया है, चाहे वह पिस्तौल की लकड़ी की पकड़ हो, जिसे जसपाल ने मनु के लिए सावधानीपूर्वक तैयार किया हो, या उसकी पिस्तौल की फाइन-ट्यूनिंग हो। अब चूंकि जसपाल हम सबके बीच नहीं रहे तो यह भारतीय निशानेबाजी के लिए एक बड़ा झटका है।