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AI Cost: क्या कर्मचारियों से भी महंगा पड़ने लगा है AI? माइक्रोसॉफ्ट-उबर की कहानी खोल देगी आपकी आंखें
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitish Kumar
Updated Wed, 27 May 2026 03:29 PM IST
सार
AI को लेकर लंबे समय से दावा किया जा रहा था कि यह कंपनियों का खर्च घटाएगा और कर्मचारियों पर निर्भरता कम करेगा। लेकिन अब बड़ी टेक कंपनियों के अनुभव अलग तस्वीर दिखा रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट, उबर और एनवीडिया के उदाहरण बताते हैं कि AI की बढ़ती लागत कई जगह कर्मचारियों की सैलरी से भी भारी पड़ने लगी है।
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कंपनियों पर बढ़ रहा है एआई का बोझ
- फोटो : एआई जनरेटेड
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पिछले कुछ वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को टेक इंडस्ट्री का सबसे बड़ा गेमचेंजर बताया गया। कंपनियां इसे भविष्य की ऐसी तकनीक मानती हैं जो कम कर्मचारियों से ज्यादा काम करा सकती हैं। निवेशकों को भी यह कहानी खूब पसंद आई। जिस कंपनी ने AI अपनाने की बात की, उसके शेयरों में तेजी देखने को मिली।
लेकिन अब जब AI का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू हुआ है, तो कंपनियों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। सवाल अब यह नहीं रह गया कि AI कितना ताकतवर है, बल्कि यह है कि क्या AI का खर्च कंपनियों के लिए नियंत्रण से बाहर जा रहा है?
माइक्रोसॉफ्ट को क्यों बदलनी पड़ी रणनीति?
दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में शामिल Microsoft ने अपने इंजीनियरों को कोडिंग, डिबगिंग और कोड रिव्यू के लिए एडवांस AI टूल्स इस्तेमाल करने की खुली छूट दी थी। इंजीनियरों ने इन टूल्स का तेजी से इस्तेमाल शुरू कर दिया क्योंकि इससे काम की रफ्तार काफी बढ़ गई थी।
शुरुआत में सबकुछ शानदार लग रहा था। लेकिन कुछ महीनों बाद जब कंपनी के सामने AI उपयोग का वास्तविक बिल आया, तो तस्वीर बदल गई। हजारों इंजीनियर जो लगातार AI मॉडल चला रहे थे और हर क्वेरी, हर कोड जनरेशन और हर टेस्टिंग के लिए एआई का सहारा ले रहे थे, उनसे कंपनी पर भारी कंप्यूटिंग लागत जुड़ रही थी।
स्थिति यहां तक पहुंच गई कि माइक्रोसॉफ्ट को अपने कर्मचारियों को महंगे बाहरी AI टूल्स से हटाकर अपने इन-हाउस सिस्टम और GitHub Copilot स्टैक की तरफ शिफ्ट करना पड़ा। यह कदम साफ दिखाता है कि AI की लागत अब कंपनियों के लिए गंभीर मुद्दा बनती जा रही है।
उबर का सालभर का AI बजट कुछ महीनों में खत्म
कैब एग्रीगेटर Uber का अनुभव भी कम चौंकाने वाला नहीं रहा। कंपनी ने अपने इंजीनियरों के बीच AI को तेजी से अपनाने के लिए आंतरिक स्तर पर प्रतिस्पर्धा जैसा माहौल बना दिया था। कुछ ही महीनों में हजारों इंजीनियर AI आधारित कोडिंग टूल्स इस्तेमाल करने लगे। कंपनी के भीतर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट का बड़ा हिस्सा AI की मदद से तैयार होने लगा। इससे काम तेज हुआ, लेकिन लागत भी तेजी से बढ़ने लगी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ इंजीनियरों का AI उपयोग खर्च हर महीने हजारों डॉलर तक पहुंच गया। उबर के CTO ने माना कि कंपनी ने पूरे साल के लिए जो AI बजट तय किया था, वह तय समय से काफी पहले खत्म हो गया।
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एनवीडिया की चेतावनी ने बढ़ाई चिंता
- फोटो : अमर उजाला
आखिर AI इतना महंगा क्यों पड़ रहा है?
AI की लागत का सबसे बड़ा कारण “टोकन खपत” है। AI मॉडल को हर निर्देश देने या सवाल पूछने पर टोकन जनरेट होता है। एआई कंपनियां इन्हीं टोकन के हिसाब से ही बिल जनरेट करती हैं। एआई जवाब को प्रोसेस करने के लिए कंप्यूटिंग पावर इस्तेमाल करते हैं। जितना बड़ा मॉडल और जितना जटिल काम होगा, उतना ज्यादा डेटा प्रोसेस होगा और उतना ही बड़ा बिल बनेगा।
इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे पुराने समय में फोन कॉल का मीटर चलता था। जितनी लंबी बात चलती थी उतनी बार आपको सिक्के डालने पड़ते थे। AI में भी हर प्रॉम्प्ट, हर कोड रिव्यू और हर चैट के साथ लागत बढ़ती जाती है। जब कुछ लोग AI इस्तेमाल करते हैं तो खर्च संभालने लायक रहता है, लेकिन जब हजारों कर्मचारी लगातार इसका उपयोग करने लगें, तो कुल बिल करोड़ों तक पहुंच जाता है।
एनवीडिया की चेतावनी ने बढ़ाई चिंता
AI चिप्स और GPU बनाने वाली दिग्गज कंपनी NVIDIA ने भी इस मुद्दे पर बड़ी चेतावनी दी है। कंपनी के अधिकारियों ने माना कि कई मामलों में कंप्यूटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर पर होने वाला खर्च कर्मचारियों की सैलरी से भी ज्यादा हो रहा है।
यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि एनवीडिया खुद AI इन्फ्रास्ट्रक्चर की सबसे बड़ी सप्लायर कंपनियों में शामिल है। अगर AI सिस्टम चलाने की लागत इतनी तेजी से बढ़ रही है, तो आने वाले समय में यह पूरी इंडस्ट्री के लिए चुनौती बन सकती है।
क्या AI सच में इंसानों से महंगा है?
हालांकि इस बहस का दूसरा पक्ष भी है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ AI के बिल को देखकर फैसला नहीं किया जा सकता। असली सवाल यह है कि AI किसी कर्मचारी की उत्पादकता कितनी बढ़ा रहा है।
अगर कोई इंजीनियर AI की मदद से पहले से कई गुना तेजी से काम कर पा रहा है, ज्यादा कोड लिख पा रहा है और कम समय में समस्याएं सुलझा रहा है, तो कंपनियां AI पर होने वाला अतिरिक्त खर्च स्वीकार कर सकती हैं।
यानी AI की सफलता का असली पैमाना सिर्फ लागत नहीं, बल्कि उससे मिलने वाला आउटपुट और बिजनेस वैल्यू है।
कंपनियां सीख रही हैं AI कॉस्ट गवर्नेंस
टेक इंडस्ट्री अब AI को रोकने की नहीं, बल्कि उसे नियंत्रित तरीके से इस्तेमाल करने की दिशा में बढ़ रही है। कंपनियां अब कर्मचारियों को बेहतर “प्रॉम्प्ट डिसिप्लिन” सिखा रही हैं ताकि गैरजरूरी क्वेरी और टोकन की बर्बादी कम हो।
साथ ही यह भी तय किया जा रहा है कि कौन-से काम के लिए महंगे AI मॉडल जरूरी हैं और कहां सस्ते या ओपन-सोर्स मॉडल इस्तेमाल किए जा सकते हैं। कम लागत वाले AI मॉडल्स और बेहतर ऑप्टिमाइजेशन तकनीकों पर भी तेजी से काम हो रहा है ताकि AI भविष्य में कंपनियों के लिए बोझ नहीं, बल्कि फायदे का सौदा बन सके।
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