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EU: क्या जानबूझकर जल्दी खराब किए जाते हैं स्मार्टफोन? यूरोपियन यूनियन ने पकड़ा फोन कंपनियों का ये सिक्रेट गेम
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitish Kumar
Updated Thu, 23 Apr 2026 12:08 PM IST
सार
Planned Obsolescence of Smartphones: क्या आपको भी लगता है कि आपका स्मार्टफोन धीरे-धीरे स्लो हो गया है, बैटरी जल्दी खत्म होने लगी है और उसे बार-बार चार्ज करना पड़ रहा है? तो ये कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि फोन कंपनियों की सोची-समझी चाल हो सकती है। यूरोपीय यूनियन अब इस ट्रेंड को चुनौती देने जा रहा है, जिससे फोन की लाइफ और रिपेयर आसान हो सकती है।
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क्यों स्लो हो जाता है नया स्मार्टफोन?
- फोटो : एआई जनरेटेड
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अक्सर ऐसा होता है कि नया स्मार्टफोन शुरू में बेहद तेज काम करते हैं, लेकिन कुछ समय बाद उसकी परफॉर्मेंस गिरने लगती है। बैटरी जल्दी खत्म होती है, चार्जिंग बार-बार करनी पड़ती है और कुल मिलाकर अनुभव पहले जैसा नहीं रहता। डिवाइस पूरी तरह खराब नहीं होता, लेकिन इतना असुविधाजनक जरूर हो जाता है कि यूजर नया फोन लेने के बारे में सोचने लगता है। अब तक फोन में इस तरह के बदलाव को सामान्य माना जाता रहा है, लेकिन यूरोपीय यूनियन (EU) के नीति-निर्माताओं का मानना है कि यह पूरी तरह स्वाभाविक नहीं है।
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प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस क्या है?
- फोटो : एआई जनरेटेड
क्या कंपनियां अपना रहीं हैं 'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस' की नीति
'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस’ का मतलब है प्रोडक्ट को इस तरह डिजाइन करना कि वह समय के साथ कम उपयोगी होता जाए। हालांकि, डिवाइस अचानक बंद नहीं होते, बल्कि धीरे-धीरे उन्हें इस्तेमाल करना इतना मुश्किल होने लगता है की नई की जरूरत पड़ने लगती है। फोन के बैटरी की क्षमता घटने लगती है, सॉफ्टवेयर अपडेट बंद हो जाते हैं और रिपेयर के लिए पार्ट्स ही नहीं मिलते। नतीजा यह होता है कि नया फोन लेना मजबूरी जैसा लगने लगता है।
यूरोपियन यूनियन के आंकड़ों के मुताबिक, लोग आमतौर पर 2 से 3 साल में स्मार्टफोन बदल देते हैं, जिसमें बैटरी, परफॉर्मेंस और रिपेयर कॉस्ट अहम भूमिका निभाते हैं। कई मामलों में फोन काम कर रहा होता है, लेकिन उपयोग के लायक नहीं लगता।
'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस’ का मतलब है प्रोडक्ट को इस तरह डिजाइन करना कि वह समय के साथ कम उपयोगी होता जाए। हालांकि, डिवाइस अचानक बंद नहीं होते, बल्कि धीरे-धीरे उन्हें इस्तेमाल करना इतना मुश्किल होने लगता है की नई की जरूरत पड़ने लगती है। फोन के बैटरी की क्षमता घटने लगती है, सॉफ्टवेयर अपडेट बंद हो जाते हैं और रिपेयर के लिए पार्ट्स ही नहीं मिलते। नतीजा यह होता है कि नया फोन लेना मजबूरी जैसा लगने लगता है।
यूरोपियन यूनियन के आंकड़ों के मुताबिक, लोग आमतौर पर 2 से 3 साल में स्मार्टफोन बदल देते हैं, जिसमें बैटरी, परफॉर्मेंस और रिपेयर कॉस्ट अहम भूमिका निभाते हैं। कई मामलों में फोन काम कर रहा होता है, लेकिन उपयोग के लायक नहीं लगता।
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स्मार्टफोन बैटरी
- फोटो : एआई जनरेटेड
बैटरी क्यों बनती है सबसे बड़ी वजह?
स्मार्टफोन की बैटरी एक ऐसा पार्ट है, जो समय के साथ जरूर खराब होता है। 2017 में एक बड़ा विवाद तब सामने आया था जब Apple ने माना कि वह पुराने iPhones की स्पीड कम कर रहा था ताकि बैटरी खराब होने पर फोन अचानक बंद न हो। हालांकि, कंपनी ने इसे सुरक्षा से जोड़ा, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि बैटरी की हालत सीधे फोन के अनुभव को प्रभावित करती है। इसके बाद बैटरी हेल्थ फीचर शुरू किए गए, लेकिन मूल समस्या अब भी बनी हुई है।
क्यों गायब हो गई रिमूवेबल बैटरी?
पहले स्मार्टफोन में बैटरी बदलना आसान होता था, लेकिन अब ज्यादातर फोन सील्ड डिजाइन में आते हैं। इसके पीछे पतले डिजाइन, वॉटरप्रूफिंग और बेहतर बिल्ड जैसे कारण दिए जाते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि ऐसे फोन खोलना मुश्किल होता है, रिपेयर महंगा हो जाता है और यूजर को कंपनी के सर्विस सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर Google के Pixel डिवाइस में बैटरी से जुड़ी समस्याओं की शिकायतें सामने आई थीं, जहां कई मामलों में रिप्लेसमेंट ही एकमात्र विकल्प बन गया।
स्मार्टफोन की बैटरी एक ऐसा पार्ट है, जो समय के साथ जरूर खराब होता है। 2017 में एक बड़ा विवाद तब सामने आया था जब Apple ने माना कि वह पुराने iPhones की स्पीड कम कर रहा था ताकि बैटरी खराब होने पर फोन अचानक बंद न हो। हालांकि, कंपनी ने इसे सुरक्षा से जोड़ा, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि बैटरी की हालत सीधे फोन के अनुभव को प्रभावित करती है। इसके बाद बैटरी हेल्थ फीचर शुरू किए गए, लेकिन मूल समस्या अब भी बनी हुई है।
क्यों गायब हो गई रिमूवेबल बैटरी?
पहले स्मार्टफोन में बैटरी बदलना आसान होता था, लेकिन अब ज्यादातर फोन सील्ड डिजाइन में आते हैं। इसके पीछे पतले डिजाइन, वॉटरप्रूफिंग और बेहतर बिल्ड जैसे कारण दिए जाते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि ऐसे फोन खोलना मुश्किल होता है, रिपेयर महंगा हो जाता है और यूजर को कंपनी के सर्विस सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर Google के Pixel डिवाइस में बैटरी से जुड़ी समस्याओं की शिकायतें सामने आई थीं, जहां कई मामलों में रिप्लेसमेंट ही एकमात्र विकल्प बन गया।
रिपेयर से ज्यादा रिप्लेसमेंट पर फोकस
- फोटो : अमर उजाला
रिपेयर से ज्यादा रिप्लेसमेंट पर फोकस
आज के स्मार्टफोन बाजार में ऐसा सिस्टम बन गया है, जहां नया फोन खरीदना ज्यादा आसान लगता है, जबकि रिपेयर करना मुश्किल और महंगा होता है। कंपनियां स्पेयर पार्ट्स, सॉफ्टवेयर और सर्विस पर कंट्रोल रखती हैं, जिससे डिवाइस की लाइफ सीमित हो जाती है।
यूरोपियन यूनियन क्या बदलना चाहता है?
आज के स्मार्टफोन बाजार में ऐसा सिस्टम बन गया है, जहां नया फोन खरीदना ज्यादा आसान लगता है, जबकि रिपेयर करना मुश्किल और महंगा होता है। कंपनियां स्पेयर पार्ट्स, सॉफ्टवेयर और सर्विस पर कंट्रोल रखती हैं, जिससे डिवाइस की लाइफ सीमित हो जाती है।
यूरोपियन यूनियन क्या बदलना चाहता है?
- यूरोपियन यूनियन के नीति निर्माता इस पूरे ट्रेंड को बदलना चाहते हैं। इसके तहत डिवाइस की डिजाइन में बदलाव किए जाएंगे, ताकि वे ज्यादा टिकाऊ हों और आसानी से रिपेयर किए जा सकें।
- नए नियमों के तहत बैटरी ज्यादा समय तक चलने वाली होनी चाहिए, स्पेयर पार्ट्स लंबे समय तक उपलब्ध रहेंगे और सॉफ्टवेयर सपोर्ट भी बढ़ाया जाएगा। साथ ही, थर्ड-पार्टी रिपेयर करने वालों को भी जरूरी टूल्स और जानकारी मिल सकेगी।
- इन नियमों के लागू होने से पहले ही कुछ कंपनियां बदलाव करने लगी हैं। Apple ने नए डिवाइस में बैटरी हटाना थोड़ा आसान किया है, जबकि रिपेयर प्लेटफॉर्म iFixit के स्कोर भी सुधार दिखा रहे हैं।
- हालांकि, फोल्डेबल फोन जैसे कुछ डिवाइस अभी भी रिपेयर के लिहाज से काफी जटिल हैं।
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भारत जैसे बाजारों पर क्या असर होगा?
- फोटो : X
भारत जैसे बाजारों पर क्या असर होगा?
- यूरोपियन यूनियन के नियम यूरोप तक सीमित हैं, लेकिन उनका असर वैश्विक स्तर पर पड़ सकता है। कंपनियां आमतौर पर अलग-अलग देशों के लिए अलग डिजाइन नहीं बनातीं, इसलिए बदलाव दूसरे बाजारों तक भी पहुंच सकते हैं।
- भारत में भी ‘राइट टू रिपेयर’ और रिपेयरबिलिटी इंडेक्स जैसे कदमों पर काम शुरू हो चुका है, जो भविष्य में बड़े बदलाव ला सकते हैं।

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