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Loan Guarantor Legal Rights: Know When and Under Which Law Banks Can File a Case Against You
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Know Your Rights: बैंक लोन गारंटर के खिलाफ कब और किस कानून के तहत कर सकता है केस? जानें अपने अधिकार
यूटिलिटी डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Shikhar Baranawal
Updated Sun, 12 Jul 2026 12:38 PM IST
सार
SARFAESI Act Property Attachment: किसी के भी लोन गारंटर बनने का मतलब होता है कि मुख्य कर्जदार अगर लोन नहीं चुका पाएगा तो उसे गारंटर को चुकाना पड़ेगा। लोन गारंटर और बैंक के बीच में इसी से जुड़े कुछ नियम कानून होते हैं, जिसके बारे में सभी लोग गारंटर को जानना चाहिए।
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लोन गारंटर के नियम
- फोटो : AI
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Loan Guarantor Legal Rights: अक्सर लोग बिना ज्यादा सोचे-समझे अपने मित्र या रिस्तेदार के बैंक लोन में गारंटर बन जाते हैं। बता दें कि बैंक लोन में 'गारंटर' बनना सिर्फ एक कागजी औपचारिकता नहीं होती है, बल्कि एक बड़ी कानूनी जिम्मेदारी होती है। बहुत से लोग बिना सोचे-समझे साइन कर देते हैं, लेकिन जब मुख्य कर्जदार लोन चुकाने में डिफॉल्ट करता है, तो बैंक सीधे गारंटर पर शिकंजा कसता है। भारतीय कानून के तहत गारंटर की जिम्मेदारी मुख्य देनदार के बराबर ही मानी जाती है।
ऐसे जब मुख्य कर्जदार लोन नहीं चुका पाता है तो कुछ गारंटर को ही परेशान करने लगते हैं, जानकारी के आभाव में लोग बैंक को शोषण करने का मौका देते हैं। आइए इस लेख में समझते हैं कि मुख्य कर्जदार के लोन न चुकाने पर बैंक आपके खिलाफ कब और किस कानून के तहत कानूनी कार्रवाई या केस कर सकता है।
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सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act) के तहत संपत्ति की कुर्की
- फोटो : अमर उजाला
सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act) के तहत संपत्ति की कुर्की
जब कोई लोन एनपीए(NPA) नॉन-पर्फामिंग एसेट हो जाता है, तो बैंक सरफेसी अधिनियम, 2002 के तहत कार्रवाई करता है। इस कानून के तहत बैंक को यह अधिकार है कि वह मुख्य कर्जदार के साथ-साथ गारंटर को भी 60 दिनों का डिमांड नोटिस भेज सकता है। अगर इस अवधि में लोन नहीं चुकाया जाता, तो बैंक बिना कोर्ट गए गारंटर की बंधक रखी गई संपत्ति (घर या जमीन) को जब्त और नीलाम कर सकता है।
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डीआरटी कोर्ट में रिकवरी का केस
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
डीआरटी कोर्ट में रिकवरी का केस
अगर लोन की रकम 20 लाख रुपये या उससे अधिक है, तो बैंक बकाया पैसे की वसूली के लिए डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल का रुख करता है। रिकवरी ऑफ डेट्स एंड बैंकरप्ट्सी एक्ट के तहत बैंक मुख्य देनदार और गारंटर दोनों के खिलाफ एक साथ मुकदमा दायर कर सकता है। इस कानून के तहत अदालत गारंटर के अन्य बैंक खातों को फ्रीज करने या उसकी निजी संपत्ति बेचने का आदेश भी दे सकती है।
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चेक बाउंस होने पर धारा 138 के तहत जेल की सजा
- फोटो : Adobe Stock
चेक बाउंस होने पर धारा 138 के तहत जेल की सजा
अगर लोन लेते समय गारंटर ने सुरक्षा के तौर पर अपने हस्ताक्षर किए हुए चेक बैंक को दिए थे, तो बैंक लोन डिफॉल्ट होने पर उन चेकों को क्लियरेंस के लिए लगा सकता है। अगर वे चेक खाते में पैसा न होने के कारण बाउंस हो जाते हैं, तो बैंक गारंटर के खिलाफ निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत क्रिमिनल केस दर्ज करा सकता है, जिसमें दो साल तक की जेल हो सकती है।
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गारंटर के पास मौजूद कानूनी अधिकार और बचाव
- फोटो : Adobe Stock
गारंटर के पास मौजूद कानूनी अधिकार और बचाव
कानूनन गारंटर के पास भी कुछ अधिकार होते हैं, जिन्हें 'राइट ऑफ सब्रोगेशन' कहा जाता है। अगर बैंक गारंटर से लोन की पूरी वसूली कर लेता है, तो गारंटर को मुख्य कर्जदार की जगह मिल जाती है। इसके बाद गारंटर कानूनी रूप से उस मुख्य कर्जदार के खिलाफ अदालत में केस करके अपने द्वारा चुकाई गई पाई-पाई वापस वसूल करने का हकदार बन जाता है।
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