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आखिर कैसे कोई इंसान बन जाता है हत्यारा

Wed, 18 May 2016 02:36 PM IST
मेलिसा हॉगेनबूम/बीबीसी फ्यूचर
मेलिसा हॉगेनबूम/बीबीसी फ्यूचर Updated Wed, 18 May 2016 02:36 PM IST
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कैसे कोई इंसान बन जाता है हत्यारा - फोटो : BBC

दुनिया में ऐसे बहुत कम जीव हैं, जो अपनी ही नस्ल का कत्ल करते हैं। इन गिने-चुने जीवों में इंसान और चिम्पैंजी भी आते हैं। आखिर क्या वजह है कि इंसान या चिम्पैंज़ी, अपनी प्रजाति के हत्यारे बन जाते हैं? हमने मशहूर ब्रिटिश मानवशास्त्री रिचर्ड रैंघम से इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की। वो कहते हैं कि चिम्पैंज़ी अक्सर खोज-खोजकर लड़ाई करते हैं। और अपने पड़ोस में रहने वाले दूसरे चिम्पैंज़ियों को मार डालते हैं। रिचर्ड रैंघम कहते हैं कि चिम्पैंज़ी अपने-अपने ठिकाने तय किए होते हैं। अक्सर वो अपनी सीमा के पास जाकर देखते हैं कि कहीं उनके इलाक़े में कोई दूसरा चिम्पैंज़ी दख़ल तो नहीं दे रहा। ऐसा होता है तो वो अपने पूरे गिरोह के साथ, घुसपैठिए पर हमला बोल देते हैं। अक्सर ये हमला छापामार तरीक़े से होता है। कई बार दर्जन भर चिम्पैंज़ी मिलकर एक विरोधी पर हमला करते हैं। कभी उसकी बांह मरोड़ते हैं, तो कभी गला दबाते हैं। कुल मिलाकर, ये ग़ैर इरादतन नहीं, पूरी तरह से योजना बनाकर की गई हत्या है। एक बात और है, चिम्पैंज़ी के झुंड में अगर नर ज़्यादा हैं तो हिंसा भी ज़्यादा होनी तय है।

आखिर कैसे कोई इंसान बन जाता है हत्यारा

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कैसे कोई इंसान बन जाता है हत्यारा - फोटो : BBC

इसके मुक़ाबले, जब माहौल अपने अनुकूल नहीं होता। ख़ुद को नुक़सान होने का डर होता है, तब मनुष्य, लड़ाई करने से कतराता है। चिम्पैंज़ियों में ये आदत नहीं देखने को मिलती। वो बड़े झगड़ालू होते हैं। जंगल में चिम्पैंज़ियों के झुंड के बीच अक्सर झगड़े देखने को मिलते हैं। इसकी वजह ये है कि वो बात-बेबात झगड़े करते हैं। वो हार-जीत का पहले से अंदाज़ा नहीं लगाते। उनके मुक़ाबले इंसान इतना नहीं लड़ते। डॉक्टर रिचर्ड के मुताबिक़, इसकी वजह है इंसान के अंदर बेहतर समझ होना। लोग तभी लड़ाई करते हैं जब उन्हें अपनी जीत का अंदाज़ा होता है। चिम्पैंज़ी के रिश्तेदार बोनोबो बंदरों का बर्ताव भी उतना हिंसक नहीं होता, जितना कि चिम्पैंज़ी का होता है। डॉक्टर रिचर्ड कहते हैं कि इसकी वजह ये है कि लाखों सालों से अलग जाति के तौर पर विकसित हुए बोनोबो में आक्रामक जीन कमज़ोर पड़ गए हैं। ठीक उसी तरह जैसे कि इंसानों में 'रिएक्टिव एग्रेशन' के जीन्स। जब हमें कोई बुरा-भला करता है तो हम हर बार उसका मुंहतोड़ जवाब नहीं देते। कई बार चुप्पी साध जाते हैं। ये हमारी चिम्पैंज़ी से अलग विकास प्रक्रिया का हिस्सा है। तो, क्या आगे चलकर इंसान का हिंसक बर्ताव और भी कमज़ोर होगा?

आखिर कैसे कोई इंसान बन जाता है हत्यारा

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कैसे कोई इंसान बन जाता है हत्यारा - फोटो : BBC
डॉक्टर रिचर्ड कहते हैं कि इंसान और चिम्पैंज़ी उन गिने-चुने जीवों में हैं, जो अपने रिश्तेदारों के साथ छोटे-छोटे समूह बनाकर रहते हैं। और फिर पड़ोसियों पर हमले करके उन्हें नुक़सान पहुंचाते हैं, मार डालते हैं। आज की तारीख़ में चिम्पैंज़ी, इंसानों के सबसे क़रीबी रिश्तेदार हैं। आज से क़रीब साठ लाख साल पहले हमारे पुरखे एक ही थे। वहीं से इंसानों और चिम्पैंज़ियों की जीन में बदलाव आया और दोनों अलग-अलग जातियों में बंट गए। इस बात से साफ़ है कि इंसान शायद तब से ही, यानी आज से साठ लाख साल पहले से ही अपनी बिरादरी के लोगों का क़त्ल करता रहा है। डॉक्टर रिचर्ड कहते हैं कि हिंसा इंसान के ज़ेहन में बसी है। लेकिन, मनुष्य लड़ाई तभी करते हैं, मार-काट तभी मचाते हैं, जब इंसानों को ये दिखता है कि वो सामने वाले से लड़ाई जीत सकते हैं, उसे नुक़सान पहुंचा सकते हैं, विरोधी को आसानी से मार सकते हैं, वरना इंसान ऐसा करने से बचते हैं।
 
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आखिर कैसे कोई इंसान बन जाता है हत्यारा

human turns killer
कैसे कोई इंसान बन जाता है हत्यारा - फोटो : BBC

इस सवाल के जवाब में डॉक्टर रिचर्ड कहते हैं कि इंसान का हिंसक रवैया पहले से काफ़ी कमज़ोर हुआ है। आज भले ही दुनिया में ज़्यादा हिंसा हो रही है। मगर जनसंख्या के अनुपात में देखें तो ये हमारी सभ्यता के तमाम दौर में सबसे कम हिंसक दौर है। समाज में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जो दो लोगों या फिर दो गुटों के बीच झगड़ा होने की सूरत में बीच-बचाव करते हैं। उन्हें मार-काट से रोकते हैं। आज समाज में तमाम ऐसे तरीक़े आ गए हैं जिनके ज़रिए हिंसा को रोका जाता है। फिर भी जो लोग मार-काट करते हैं, उन्हें क़ानूनी तौर पर सज़ा देकर दूसरों के लिए मिसाल बनाया जाता है। ताकि लोगों को ये समझाया जा सके कि हिंसा, मार-काट ख़राब चीज़ है। इसे नहीं करना चाहिए।

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