Lohri: विद्रोह और वीरता की साझी विरासत है लोहड़ी... स्वाभिमान की आग, जिसे वक्त की आंधियां भी न बुझा सकीं
पंजाब का सामाजिक ढांचा संयुक्त परिवार और बुजुर्गों के आशीर्वाद पर टिका है। लोहड़ी के अवसर पर घर की पुत्रवधुएं सास-ससुर और अन्य बुजुर्गों को लोई, शॉल या गर्म कपड़े भेंट करती हैं। यह रस्म पीढ़ियों के बीच सम्मान, कृतज्ञता और स्नेह का सेतु है। संदेश साफ है- जिस घर में बुजुर्गों का मान, वहां खुशहाली का वास।
विस्तार
पंजाब के गांवों और शहरों में घर के आंगन में दहकती लोहड़ी केवल लकड़ियों का अलाव नहीं है। यह उस सामाजिक चेतना का जीवंत प्रतीक है जिसमें वीरता, विद्रोह, किसान का संघर्ष और बुजुर्गों के प्रति सम्मान की लौ सदियों से जलती आ रही है।
लोहड़ी की अग्नि में पंजाब का इतिहास, लोक-परंपराएं और जीवन मूल्य एक साथ सिमट आते हैं। यही कारण है कि यह पर्व महज उत्सव नहीं, बल्कि संस्कारों की विरासत बन चुका है।
लोहड़ी का उत्सव लोकगीत सुंदर-मुंदरिए के बिना अधूरा है। यह गीत केवल सामूहिक गायन नहीं बल्कि मुगलकालीन पंजाब के जननायक दुल्ला भट्टी के विद्रोह और नारी सम्मान की कथा है। उस दौर में जब गरीब परिवारों की बेटियों को जबरन दास बनाया जा रहा था दुल्ला भट्टी ने न केवल उन्हें मुक्त कराया बल्कि पिता बनकर उनका कन्यादान भी किया। यही कारण है कि लोकगीतों में उनका नाम आज भी श्रद्धा से लिया जाता है। यह गीत याद दिलाता है कि पंजाब की मिट्टी में अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस रचा-बसा है।
बदलती सोच: बेटियों की लोहड़ी
कभी लोहड़ी को केवल पुत्र-प्राप्ति से जोड़कर देखा जाता था लेकिन समय के साथ समाज की सोच में बदलाव आया है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की भावना अब पर्व की परंपराओं में भी झलकने लगी है। आज कई घरों में बेटियों की लोहड़ी भी पूरे उत्साह से मनाई जाती है। लोकगीतों के बोलों में भी परिवर्तन दिखता है, जहां अब मुंडे के साथ धी की लंबी उम्र और उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है। हालांकि यह बदलाव अभी सभी तबकों तक पूरी तरह नहीं पहुंचा लेकिन यह संकेत है कि समाज प्रगतिशील दिशा में बढ़ रहा है।
किसान और प्रकृति का पर्व
लोहड़ी का सीधा संबंध किसान और उसकी फसल से है। माघी के आगमन से पहले मनाया जाने वाला यह पर्व रबी की फसल की उम्मीदों से जुड़ा है। अलाव में तिल, गुड़, रेवड़ी और मूंगफली अर्पित कर किसान प्रकृति के प्रति आभार जताता है। कड़ाके की ठंड में खेतों में मेहनत करने वाले किसान के लिए यह उत्सव परिश्रम और आशा का प्रतीक बन जाता है।
संस्कृति का संदेश
पंजाब की गलियों से लेकर हर गांव-शहर तक गूंजते लोहड़ी के गीत अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देते हैं। यह पर्व सिखाता है कि इस संस्कृति में बगावत भी पूजनीय है और बुजुर्गों का सम्मान भी अनिवार्य है। बशर्ते इरादा नेक हो और समाजहित सर्वोपरि।
दुल्ला भट्टी: पंजाब का रॉबिनहुड
पंजाब की लोक-चेतना में राय अब्दुल्ला खान भट्टी यानी दुल्ला भट्टी का स्थान अद्वितीय है। सांदल बार (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मे दुल्ला भट्टी के पिता और दादा ने मुगल सत्ता के खिलाफ संघर्ष करते हुए शहादत दी थी। अकबर के शासनकाल में जब किसानों पर भारी लगान थोपा गया तब दुल्ला भट्टी ने विद्रोह का बिगुल फूंका। वे अमीरों से लूटी संपत्ति गरीबों में बांटते थे इसी कारण उन्हें पंजाब का रॉबिनहुड कहा गया।
उनकी सबसे बड़ी पहचान नारी सम्मान के रक्षक के रूप में है। सुंदरी और मुंदरी नाम की दो कन्याओं को मुगल अधिकारियों से छुड़ाकर उन्होंने जंगल में अग्नि साक्षी मानकर उनका कन्यादान किया। यही घटना सुंदर-मुंदरिए लोकगीत की आत्मा है। मुगल सत्ता ने अंततः उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर लाहौर में फांसी दे दी लेकिन उनकी शहादत ने उन्हें अमर बना दिया। आज भी लोहड़ी की आग के चारों ओर गूंजता उनका नाम पंजाब के स्वाभिमान और साहस की पहचान है। लोहड़ी केवल पर्व नहीं, बल्कि पंजाब की आत्मा का उत्सव है जहां विद्रोह, वीरता और संस्कार एक साथ प्रज्ज्वलित होते हैं।
सिर्फ जश्न नहीं, जेंडर स्टेटमेंट भी है लोहड़ी
पंजाब की लोक संस्कृति का प्रमुख पर्व लोहड़ी अब केवल आग के चारों ओर गाए जाने वाले गीतों और पारंपरिक जश्न तक सीमित नहीं रह गया है। समय के साथ यह पर्व समाज में आ रहे वैचारिक बदलाव और जेंडर समानता की अभिव्यक्ति का मंच भी बनता जा रहा है। खासतौर पर बेटियों की पहली लोहड़ी मनाने का बढ़ता चलन इस बदलाव की सबसे मजबूत तस्वीर पेश करता है।
पारंपरिक रूप से लोहड़ी को पुत्र जन्म, विवाह या परिवार में नई शुरुआत से जोड़कर देखा जाता रहा है। बेटे की पहली लोहड़ी बड़े आयोजन, रिश्तेदारों की मौजूदगी और खुले उत्सव के रूप में मनाई जाती थी। इसके उलट, बेटियों के जन्म पर यह पर्व या तो नहीं मनाया जाता था या बेहद सीमित दायरे में सिमट जाता था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर बदलने लगी है। शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ अब कई ग्रामीण इलाकों में भी बेटियों की पहली लोहड़ी उसी उत्साह और सार्वजनिकता के साथ मनाई जा रही है, जैसी पहले केवल बेटों के हिस्से आती थी।
समाजशास्त्री प्रो. बीबी यादव के अनुसार, बेटियों की लोहड़ी मनाना सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि एक सामाजिक संदेश है। यह संकेत देता है कि बेटा-बेटी में फर्क की सोच धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। कई परिवार इस मौके को प्रतीकात्मक रूप से भी इस्तेमाल कर रहे हैं। समारोह में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे संदेश, पोस्टर और लोकगीत शामिल किए जा रहे हैं, जो सोच में आए बदलाव को रेखांकित करते हैं।
बदलाव के साथ मौजूद सीमाएं
हालांकि सकारात्मक संकेतों के बावजूद असमानता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई परिवारों में बेटी की लोहड़ी तो मनाई जाती है लेकिन आयोजन का दायरा छोटा रखा जाता है। जहां बेटे की लोहड़ी में बड़े स्तर पर खर्च और भीड़ देखने को मिलती है। वहीं बेटियों के लिए सादगी को ही प्राथमिकता दी जाती है। कुछ मामलों में यह उत्सव समानता की भावना से ज्यादा परंपरा निभाने तक सीमित रह जाता है।
महिलावादी संगठन रासो की नेता कमलजीत कौर मानती हैं कि त्योहार सामाजिक सोच बदलने का अवसर जरूर देते हैं लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब यह समानता शिक्षा, संपत्ति के अधिकार और पारिवारिक निर्णयों में भी दिखाई दे। इसके बावजूद बेटियों की पहली लोहड़ी का बढ़ता चलन यह बताता है कि समाज सही दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। लोहड़ी की आग में अब सिर्फ तिल, रेवड़ी और मूंगफली नहीं, बल्कि बराबरी और सम्मान की उम्मीदें भी सुलगने लगी हैं। संवाद
अर्थव्यवस्था की धड़कन, एक हफ्ते में लाखों का कारोबार
लोहड़ी पंजाब में सिर्फ सांस्कृतिक उत्सव नहीं बल्कि एक मजबूत मौसमी इकोनॉमी भी खड़ी करती है।
जनवरी के पहले पखवाड़े में मनाए जाने वाले इस पर्व से मूंगफली, रेवड़ी, गजक, गुड़, तिल, लकड़ी, ढोल, टेंट और डीजे जैसे कारोबारों को खासा लाभ होता है। अनुमान के मुताबिक लोहड़ी से पहले और बाद के करीब एक हफ्ते में ही शहरों और कस्बों में लाखों रुपये का कारोबार होता है।
बाजारों में मूंगफली और रेवड़ी की अस्थायी रेहड़ियों से लेकर थोक दुकानों तक भीड़ उमड़ पड़ती है। दुकानदारों के अनुसार सामान्य दिनों की तुलना में इस दौरान बिक्री तीन से चार गुना तक बढ़ जाती है। सबसे अधिक मांग मूंगफली, रेवड़ी, पॉपकॉर्न और गच्चक की रहती है, जबकि तिल और गुड़ से बने उत्पाद भी खूब बिकते हैं।
लोहड़ी की आग के लिए लकड़ी की मांग भी तेजी से बढ़ती है। हालांकि प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के कारण कई जगह सीमित मात्रा में ही लकड़ी खरीदी जा रही है, फिर भी कारोबार सामान्य दिनों की तुलना में लगभग दोगुना हो जाता है।
ढोल वादक, टेंट हाउस और डीजे संचालकों के लिए भी लोहड़ी राहत लेकर आती है। विवाह के ऑफ-सीजन में यह पर्व उन्हें काम और आमदनी दोनों देता है। छोटे दुकानदारों का कहना है कि महंगाई और मंदी के बीच लोहड़ी की एक हफ्ते की कमाई साल की शुरुआत को संभालने में मदद करती है। लोहड़ी आज पंजाब में केवल परंपरा नहीं, बल्कि बदलती सोच और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों की प्रतीक बन चुकी है। जहां एक ओर यह बेटियों के सम्मान का मंच बन रही है, वहीं दूसरी ओर हजारों परिवारों की रोजी-रोटी में गर्माहट घोल रही है।