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मनप्रीत के सहारे मालवा पर नजर: भाजपा के लिए ब्रिज बने बादल, शिअद के लिए चुनौती; पंजाब के चेहरों को जिम्मेदारी
Tue, 18 Aug 2026 12:31 PM IST
Sharukh Khan
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
Published by: Sharukh Khan
Updated Tue, 18 Aug 2026 12:31 PM IST
सार
भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नई राष्ट्रीय टीम में पंजाब को अहम जिम्मेदारियां दी हैं। यह कदम 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में ग्रामीण और सिख राजनीति में विस्तार की भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। मनप्रीत सिंह बादल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि तरुण चुघ को राष्ट्रीय महामंत्री और राष्ट्रीय कार्यालय प्रभारी का अतिरिक्त दायित्व मिला है। सौदान सिंह को राष्ट्रीय सह-महामंत्री संगठन की जिम्मेदारी दी गई है।
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मनप्रीत बादल को अहम जिम्मेदारी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व पंजाब वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है। यह नियुक्ति पंजाब में भाजपा की ग्रामीण और विशेष रूप से मालवा क्षेत्र में राजनीतिक पैठ बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है।
मनप्रीत बादल की राजनीतिक पूंजी में बादल परिवार से संबंध, लंबा प्रशासनिक अनुभव और मालवा की राजनीति की समझ शामिल है। वह अकाली दल, अपनी पार्टी और कांग्रेस में रहने के बाद अब भाजपा में महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय जिम्मेदारी तक पहुंचे हैं।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. कुणाल के अनुसार, मनप्रीत बादल की नियुक्ति असंतुष्ट नेताओं तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी। उनके पुराने अकाली संपर्क, खासकर मालवा क्षेत्र में, भाजपा को उन कार्यकर्ताओं तक पहुंचा सकते हैं जो अकाली दल से संतुष्ट नहीं हैं।
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मनप्रीत बादल की राजनीतिक पूंजी में बादल परिवार से संबंध, लंबा प्रशासनिक अनुभव और मालवा की राजनीति की समझ शामिल है। वह अकाली दल, अपनी पार्टी और कांग्रेस में रहने के बाद अब भाजपा में महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय जिम्मेदारी तक पहुंचे हैं।
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राजनीतिक विश्लेषक प्रो. कुणाल के अनुसार, मनप्रीत बादल की नियुक्ति असंतुष्ट नेताओं तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी। उनके पुराने अकाली संपर्क, खासकर मालवा क्षेत्र में, भाजपा को उन कार्यकर्ताओं तक पहुंचा सकते हैं जो अकाली दल से संतुष्ट नहीं हैं।
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मनप्रीत बादल भाजपा को पंजाब की ग्रामीण सिख राजनीति समझने और उसमें प्रवेश करने में भी सहायता कर सकते हैं। भाजपा को एक अनुभवी और प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाले पंजाबी चेहरे का लाभ मिलेगा क्योंकि मनप्रीत बादल नौ बार बजट पेश करने का कीर्तिमान रखते हैं।
अकाली दल पर संभावित असर
डॉ. जसबीर रिशी का मानना है कि मनप्रीत बादल यदि भाजपा में रहते हुए अकाली दल के पुराने नेताओं से संपर्क बढ़ाते हैं तो शिअद पर सीधा दबाव पड़ सकता है। मालवा क्षेत्र में भाजपा की आक्रामक रणनीति कई स्थानीय नेताओं को भाजपा का विकल्प तलाशने पर मजबूर कर सकती है। हालांकि इसे तत्काल बड़ी छेदमारी मानना जल्दबाजी होगी। डॉ. रिशी के अनुसार 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के गिद्दड़बाहा उपचुनाव में मनप्रीत बादल की हार बताती है कि चुनावी वोट में प्रभाव बदलना अभी चुनौती है।
डॉ. जसबीर रिशी का मानना है कि मनप्रीत बादल यदि भाजपा में रहते हुए अकाली दल के पुराने नेताओं से संपर्क बढ़ाते हैं तो शिअद पर सीधा दबाव पड़ सकता है। मालवा क्षेत्र में भाजपा की आक्रामक रणनीति कई स्थानीय नेताओं को भाजपा का विकल्प तलाशने पर मजबूर कर सकती है। हालांकि इसे तत्काल बड़ी छेदमारी मानना जल्दबाजी होगी। डॉ. रिशी के अनुसार 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के गिद्दड़बाहा उपचुनाव में मनप्रीत बादल की हार बताती है कि चुनावी वोट में प्रभाव बदलना अभी चुनौती है।
प्रो. कुणाल के अनुसार, मनप्रीत बादल भाजपा और अकाली दल के संभावित रिश्तों के बीच संवाद का माध्यम बन सकते हैं। यदि भविष्य में दोनों दल दोबारा गठबंधन करते हैं तो मनप्रीत बादल विश्वास बहाली में भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, सीटों के बंटवारे और दोनों दलों की बदली हुई राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बड़ी अड़चन होंगी। भाजपा अब पंजाब में अधिक संगठनात्मक विस्तार चाहती है, जिससे पुराने फार्मूले पर गठबंधन आसान नहीं होगा।
मनप्रीत बादल का राजनीतिक सफर
26 जुलाई 1962 को मुक्तसर में जन्मे मनप्रीत बादल पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे हैं। उन्होंने 1990 के दशक में शिरोमणि अकाली दल से राजनीति शुरू की और 1995, 1997, 2002 और 2007 में विधायक बने। 2007 में उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया लेकिन 2010 में अकाली दल से बाहर कर दिया गया।
26 जुलाई 1962 को मुक्तसर में जन्मे मनप्रीत बादल पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे हैं। उन्होंने 1990 के दशक में शिरोमणि अकाली दल से राजनीति शुरू की और 1995, 1997, 2002 और 2007 में विधायक बने। 2007 में उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया लेकिन 2010 में अकाली दल से बाहर कर दिया गया।
2011 में उन्होंने पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब बनाई पर 2012 के चुनाव में हार गए। जनवरी 2016 में उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय किया और 2017 में बठिंडा शहरी सीट से जीतकर दोबारा वित्त मंत्री बने। 2022 के चुनाव में हार के बाद जनवरी 2023 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा। 2024 के गिद्दड़बाहा उपचुनाव में भी उन्हें सफलता नहीं मिली फिर भी भाजपा ने उनके अनुभव को महत्व दिया है।
भाजपा की राष्ट्रीय टीम में पंजाब का बढ़ा कद
भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नई राष्ट्रीय टीम में पंजाब को अहम जिम्मेदारियां दी हैं। यह कदम 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में ग्रामीण और सिख राजनीति में विस्तार की भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। मनप्रीत सिंह बादल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि तरुण चुघ को राष्ट्रीय महामंत्री और राष्ट्रीय कार्यालय प्रभारी का अतिरिक्त दायित्व मिला है। सौदान सिंह को राष्ट्रीय सह-महामंत्री संगठन की जिम्मेदारी दी गई है।
भाजपा के लिए पंजाब में 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े उत्साहजनक रहे हैं। पार्टी का वोट प्रतिशत 2022 के विधानसभा चुनाव के 6.60 फीसदी से बढ़कर 18.56 फीसदी हो गया। यह लगभग 12 फीसदी अंकों की वृद्धि है, हालांकि भाजपा एक भी सीट नहीं जीत सकी। हालांकि इस उछाल से पार्टी को 2027 के लिए नई उम्मीद जगी है।
अब भाजपा के सामने चुनौती केवल वोट प्रतिशत बढ़ाने की नहीं, बल्कि इसे विधानसभा सीटों में बदलने की है। भाजपा को लंबे समय तक पंजाब में शहरी हिंदू मतदाताओं की पार्टी माना जाता रहा है। अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद ग्रामीण सिख आधार बनाना एक बड़ी चुनौती बन गया।
पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने कैप्टन अमरिंदर सिंह और मनप्रीत सिंह बादल जैसे कई प्रमुख सिख नेताओं को अपने साथ जोड़ा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सिख चेहरों को बड़ी संख्या में मैदान में उतारा गया था।
मालवा पर नजर
मनप्रीत सिंह बादल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाना भाजपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह मालवा की राजनीति से आते हैं और जाट सिख राजनीति में उनकी पहचान है। राष्ट्रीय संगठन में उनका ऊंचा पद ग्रामीण मतदाताओं के लिए एक राजनीतिक संदेश है। इससे पार्टी यह संकेत देना चाहती है कि प्रभावशाली सिख नेताओं को शीर्ष स्तर पर भूमिका मिल सकती है। पंजाब की सत्ता में मालवा क्षेत्र निर्णायक भूमिका निभाता है। भाजपा के लिए यहां विस्तार किए बिना 2027 में प्रभावी चुनौती पेश करना मुश्किल होगा।
भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नई राष्ट्रीय टीम में पंजाब को अहम जिम्मेदारियां दी हैं। यह कदम 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में ग्रामीण और सिख राजनीति में विस्तार की भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। मनप्रीत सिंह बादल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि तरुण चुघ को राष्ट्रीय महामंत्री और राष्ट्रीय कार्यालय प्रभारी का अतिरिक्त दायित्व मिला है। सौदान सिंह को राष्ट्रीय सह-महामंत्री संगठन की जिम्मेदारी दी गई है।
भाजपा के लिए पंजाब में 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े उत्साहजनक रहे हैं। पार्टी का वोट प्रतिशत 2022 के विधानसभा चुनाव के 6.60 फीसदी से बढ़कर 18.56 फीसदी हो गया। यह लगभग 12 फीसदी अंकों की वृद्धि है, हालांकि भाजपा एक भी सीट नहीं जीत सकी। हालांकि इस उछाल से पार्टी को 2027 के लिए नई उम्मीद जगी है।
अब भाजपा के सामने चुनौती केवल वोट प्रतिशत बढ़ाने की नहीं, बल्कि इसे विधानसभा सीटों में बदलने की है। भाजपा को लंबे समय तक पंजाब में शहरी हिंदू मतदाताओं की पार्टी माना जाता रहा है। अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद ग्रामीण सिख आधार बनाना एक बड़ी चुनौती बन गया।
पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने कैप्टन अमरिंदर सिंह और मनप्रीत सिंह बादल जैसे कई प्रमुख सिख नेताओं को अपने साथ जोड़ा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सिख चेहरों को बड़ी संख्या में मैदान में उतारा गया था।
मालवा पर नजर
मनप्रीत सिंह बादल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाना भाजपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह मालवा की राजनीति से आते हैं और जाट सिख राजनीति में उनकी पहचान है। राष्ट्रीय संगठन में उनका ऊंचा पद ग्रामीण मतदाताओं के लिए एक राजनीतिक संदेश है। इससे पार्टी यह संकेत देना चाहती है कि प्रभावशाली सिख नेताओं को शीर्ष स्तर पर भूमिका मिल सकती है। पंजाब की सत्ता में मालवा क्षेत्र निर्णायक भूमिका निभाता है। भाजपा के लिए यहां विस्तार किए बिना 2027 में प्रभावी चुनौती पेश करना मुश्किल होगा।
भाजपा की पंजाब रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू हिंदू और सिख नेतृत्व का संतुलन है। मनप्रीत बादल जैसे सिख चेहरे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। वहीं, तरुण चुघ जैसे पुराने संगठनात्मक नेता को राष्ट्रीय महामंत्री का दायित्व मिला है। इससे पार्टी अपने पारंपरिक शहरी हिंदू आधार को भी मजबूत संदेश दे रही है। भाजपा एक ऐसा राजनीतिक ढांचा तैयार करना चाहती है जिसमें शहरी हिंदू और ग्रामीण सिख नेतृत्व दोनों साथ दिखें। 2027 में भाजपा को सिख मतदाताओं में भरोसा, ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत संगठन और स्थानीय स्तर पर जीतने वाले चेहरों पर काम करना होगा।
73 में से मात्र दो ही सीटों पर मिली थी जीत
2024 का 18.56 फीसदी वोट भाजपा के लिए उत्साहजनक है लेकिन विधानसभा चुनाव का गणित अलग होता है। 2022 में भाजपा 73 सीटों पर चुनाव लड़कर केवल दो सीटें जीत सकी थी, तब उसका वोट प्रतिशत 6.60 रहा था। भाजपा को अब अपने लगभग 19 फीसदी लोकसभा वोट को विधानसभा सीटों में बदलने की रणनीति बनानी होगी। इसके लिए पार्टी का नया फॉर्मूला पुराना हिंदू-शहरी आधार बरकरार रखना, प्रभावशाली सिख नेताओं को जोड़ना और मालवा में जड़ें मजबूत करना है। अकाली दल के बिना अपना स्वतंत्र संगठन खड़ा करना भी इसमें शामिल है। 2027 के चुनाव में भाजपा की असली राजनीतिक परीक्षा इसी सवाल का जवाब देगी।
2024 का 18.56 फीसदी वोट भाजपा के लिए उत्साहजनक है लेकिन विधानसभा चुनाव का गणित अलग होता है। 2022 में भाजपा 73 सीटों पर चुनाव लड़कर केवल दो सीटें जीत सकी थी, तब उसका वोट प्रतिशत 6.60 रहा था। भाजपा को अब अपने लगभग 19 फीसदी लोकसभा वोट को विधानसभा सीटों में बदलने की रणनीति बनानी होगी। इसके लिए पार्टी का नया फॉर्मूला पुराना हिंदू-शहरी आधार बरकरार रखना, प्रभावशाली सिख नेताओं को जोड़ना और मालवा में जड़ें मजबूत करना है। अकाली दल के बिना अपना स्वतंत्र संगठन खड़ा करना भी इसमें शामिल है। 2027 के चुनाव में भाजपा की असली राजनीतिक परीक्षा इसी सवाल का जवाब देगी।