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Punjab: ‘जीरो टॉलरेंस’ की परीक्षा, आप सरकार ने अपने ही नेताओं पर कार्रवाई; कई मंत्री-विधायक विवादों में
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
Published by: Nivedita
Updated Mon, 23 Mar 2026 03:58 PM IST
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सार
सबसे पहला और बड़ा मामला सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद सामने आया, जब तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. विजय सिंगला को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि स्वास्थ्य विभाग में हर टेंडर और काम के बदले 1 फीसदी कमीशन मांगा जा रहा था।
सीएम मान की प्रेस कांफ्रेंस
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब में 2022 में सत्ता में आई आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक एजेंडा बनाया था। लेकिन बीते चार वर्षों के कार्यकाल में पार्टी के कई विधायक और मंत्री खुद ही भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और अन्य गंभीर आरोपों में घिरते नजर आए। हालांकि इन मामलों में सरकार द्वारा अपने ही नेताओं पर कार्रवाई किए जाने को आप ने अपनी पारदर्शिता और सख्ती का प्रमाण बता रही है, वहीं विपक्ष इसे शासन व्यवस्था की विफलता करार दे रहा है।
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सबसे पहला और बड़ा मामला सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद सामने आया, जब तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. विजय सिंगला को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि स्वास्थ्य विभाग में हर टेंडर और काम के बदले 1 फीसदी कमीशन मांगा जा रहा था। यह कार्रवाई न सिर्फ पंजाब बल्कि पूरे देश में चर्चा का विषय बनी और आप ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का उदाहरण बताया। बाद में सिंगला को जमानत मिल गई और वे राजनीतिक गतिविधियों में फिर सक्रिय हो गए।
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इसके बाद बठिंडा ग्रामीण से विधायक अमित रतन कोटफत्ता पर रिश्वत मांगने का आरोप लगा। विजिलेंस ब्यूरो की जांच में सामने आया कि उन्होंने अपने करीबी के जरिए 25 लाख की सरकारी ग्रांट जारी करवाने के बदले 4 लाख की रिश्वत मांगी थी। इस मामले में गिरफ्तारी के बाद उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से जमानत मिली, लेकिन केस अब भी अदालत में लंबित है, जिससे यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तर पर जारी है।
तीसरा प्रमुख मामला अमरगढ़ से विधायक जसवंत सिंह गज्जनमाजरा का रहा, जिन्हें प्रवर्तन निदेशालय ने 41 करोड़ रुपये के बैंक धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तार किया। यह मामला तारा कॉर्पोरेशन लिमिटेड से जुड़ा बताया गया। गज्जनमाजरा को करीब छह महीने जेल में रहना पड़ा, जिसके बाद उन्हें 2024 में हाईकोर्ट से जमानत मिली। इस केस ने आप की ईमानदार राजनीति की छवि पर सवाल खड़े किए।
जालंधर सेंट्रल के विधायक रमन अरोड़ा का मामला भी काफी सुर्खियों में रहा। विजिलेंस की जांच में आरोप लगा कि नगर निगम अधिकारियों के साथ मिलकर लोगों को अवैध निर्माण के नाम पर झूठे नोटिस भेजे जाते थे और बाद में पैसे लेकर मामलों को ‘सेटल’ किया जाता था। 2025 में उनकी गिरफ्तारी के बाद कथित ‘वसूली नेटवर्क’ के कई पहलू सामने आए, जिससे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे।
इसी क्रम में कैबिनेट मंत्री फौजा सिंह सरारी को एक कथित ऑडियो क्लिप वायरल होने के बाद पद छोड़ना पड़ा। क्लिप में ठेकेदारों से पैसों की वसूली की योजना पर बातचीत का दावा किया गया था। हालांकि सरारी ने आरोपों को सिरे से खारिज किया, लेकिन बढ़ते राजनीतिक दबाव के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
मंत्री हरमीत सिंह पठानमाजरा भी विवादों में घिरे। उनके खिलाफ पटियाला में धोखाधड़ी, शादी का झांसा देकर शोषण और धमकी देने जैसे आरोपों में एफआईआर दर्ज हुई। मामला सामने आने के बाद उन्हें भी मंत्री पद से हटना पड़ा। यह प्रकरण राजनीतिक से ज्यादा आपराधिक आरोपों के कारण चर्चा में रहा।
इसके अलावा कैबिनेट मंत्री लालजीत सिंह भुल्लर भी हालिया राजनीतिक विवादों में चर्चा में रहे हैं। हालांकि उनके खिलाफ आरोपों की प्रकृति अन्य मामलों से अलग बताई जाती है, लेकिन विपक्ष लगातार सरकार पर आरोप लगाता रहा है कि कुछ मामलों में कार्रवाई चयनात्मक है, जिससे राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है।
इसी बीच मंत्री लालचंद कटारूचक पर भी गंभीर आरोप लगे थे, जिनमें एक कथित वीडियो को लेकर विवाद हुआ। मामला बढ़ने पर जांच बैठाई गई और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने भी नोटिस जारी किए। हालांकि बाद में शिकायतकर्ता द्वारा आरोप वापस लेने और पर्याप्त सबूत न मिलने के चलते उन्हें क्लीन चिट दे दी गई और वे अपने पद पर बने रहे।
कुल मिलाकर, पंजाब में आप सरकार का कार्यकाल एक विरोधाभासी तस्वीर पेश करता है। एक तरफ सरकार अपने ही नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर “जीरो टॉलरेंस” की नीति को लागू करने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ लगातार सामने आ रहे मामलों ने यह भी दिखाया है कि सत्ता में आने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण होता है। यही वजह है कि जहां सत्तारूढ़ दल इसे पारदर्शिता और जवाबदेही का उदाहरण बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे सिस्टम की कमजोरी और राजनीतिक असफलता के रूप में पेश कर रहा है।