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अर्शदीप सिंह डांग ने रचा इतिहास: ब्रिटेन की रॉयल एयर फोर्स में बने फाइटर पायलट, चंडीगढ़ में हुआ था जन्म
Sun, 16 Aug 2026 04:29 PM IST
शाहिल शर्मा
संवाद न्यूज एजेंसी, लुधियाना
संवाद न्यूज एजेंसी, लुधियाना
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Sun, 16 Aug 2026 04:29 PM IST
सार
अर्शदीप अपनी उपलब्धि को केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं मानते। उनका कहना है कि वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं।
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अर्शदीप सिंह, ब्रिटिश रॉयल एयरफोर्स में फाइटर पायलट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
पंजाब की मिट्टी में पले-बढ़े सपनों ने एक बार फिर दुनिया के आसमान में अपनी पहचान दर्ज कराई है। भारतीय मूल के फ्लाइट लेफ्टिनेंट अर्शदीप सिंह डांग ने ब्रिटेन की रॉयल एयर फोर्स (आरएएफ) में फाइटर पायलट बनकर इतिहास रच दिया है। 14 अगस्त को उत्तर वेल्स स्थित आरएएफ वैली में आयोजित फास्ट जेट पायलट ग्रेजुएशन समारोह में उन्हें फाइटर पायलट के पंख मिले। रॉयल एयरफोर्स के अनुसार, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद किसी सिख का आरएएफ की फाइटर स्क्वाड्रन से विंग हासिल करने का यह पहला मामला है।
लुधियाना के पिता, अमृतसर की मां और चंडीगढ़ में जन्म
28 वर्षीय अर्शदीप का जन्म वर्ष 1998 में चंडीगढ़ में हुआ। उनके पिता जगदीप सिंह डांग लुधियाना के रहने वाले हैं, जबकि उनकी मां गगनदीप कौर अमृतसर से हैं। अर्शदीप के दादा सरदार संतोख सिंह डांग का सपना था कि उनका बेटा पायलट बने। लेकिन दादा का निधन तब हो गया था, जब अर्शदीप के पिता केवल छह साल के थे। संसाधनों की कमी के कारण वह सपना पूरा नहीं हो सका। यही सपना आगे चलकर अर्शदीप की प्रेरणा बना। अर्शदीप के अनुसार, उनके माता-पिता ने उन्हें पायलट बनने के लिए प्रोत्साहित किया और धीरे-धीरे उन्हें विश्वास हुआ कि वे इस सपने को सच कर सकते हैं।
छह साल की उम्र में ब्रिटेन पहुंचे
अर्शदीप महज छह वर्ष की उम्र में माता-पिता के साथ ब्रिटेन चले गए थे। उन्होंने मोहाली के एक स्कूल में करीब दो वर्ष पढ़ाई की, लेकिन बचपन की यादें उन्हें ज्यादा याद नहीं हैं। ब्रिटेन में उनका परिवार साउथॉल, इंग्लैंड में रहता है। पंजाब से उनका रिश्ता हालांकि कभी टूटा नहीं। परिवार आज भी पंजाब आता-जाता है और रिश्तेदारों से जुड़ा हुआ है। दो वर्ष पहले अर्शदीप अमृतसर और लुधियाना भी आए थे इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अर्शदीप ब्रिटेन पढ़ाई करने के लिए गए थे। उनका परिवार उनके बचपन में ही वहां चला गया था। हां, उच्च शिक्षा उन्होंने ब्रिटेन में ही हासिल की।
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ब्रिस्टल विश्वविद्यालय से गणित और दर्शनशास्त्र की पढ़ाई
अर्शदीप ने यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल से गणित और दर्शनशास्त्र में बीएससी ऑनर्स की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने फरवरी 2022 में अधिकारी प्रशिक्षण पूरा किया। वर्ष 2023 में उन्होंने प्रारंभिक उड़ान प्रशिक्षण पूरा किया। साइप्रस में सेवा देने के बाद 2024 में उन्हें फास्ट जेट प्रशिक्षण के लिए चुना गया। मार्च 2025 में उन्होंने फास्ट जेट लीड-इन ट्रेनिंग शुरू की और जुलाई 2025 में बेसिक फास्ट जेट प्रशिक्षण में पहुंचे।
अक्टूबर 2025 में उन्हें अकेले प्रशिक्षण उड़ान के लिए अमेरिका के टेक्सास भेजा गया। जुलाई 2026 में उन्होंने विंग्स टेस्ट पास किया। हालांकि फाइटर पायलट बनने के बाद भी उनका प्रशिक्षण पूरा नहीं हुआ है। अब उन्हें करीब एक वर्ष का और कठिन प्रशिक्षण लेना होगा, जिसके बाद वे अग्रिम मोर्चे पर फाइटर जेट उड़ाने की जिम्मेदारी संभाल सकेंगे।
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लुधियाना के पिता, अमृतसर की मां और चंडीगढ़ में जन्म
28 वर्षीय अर्शदीप का जन्म वर्ष 1998 में चंडीगढ़ में हुआ। उनके पिता जगदीप सिंह डांग लुधियाना के रहने वाले हैं, जबकि उनकी मां गगनदीप कौर अमृतसर से हैं। अर्शदीप के दादा सरदार संतोख सिंह डांग का सपना था कि उनका बेटा पायलट बने। लेकिन दादा का निधन तब हो गया था, जब अर्शदीप के पिता केवल छह साल के थे। संसाधनों की कमी के कारण वह सपना पूरा नहीं हो सका। यही सपना आगे चलकर अर्शदीप की प्रेरणा बना। अर्शदीप के अनुसार, उनके माता-पिता ने उन्हें पायलट बनने के लिए प्रोत्साहित किया और धीरे-धीरे उन्हें विश्वास हुआ कि वे इस सपने को सच कर सकते हैं।
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छह साल की उम्र में ब्रिटेन पहुंचे
अर्शदीप महज छह वर्ष की उम्र में माता-पिता के साथ ब्रिटेन चले गए थे। उन्होंने मोहाली के एक स्कूल में करीब दो वर्ष पढ़ाई की, लेकिन बचपन की यादें उन्हें ज्यादा याद नहीं हैं। ब्रिटेन में उनका परिवार साउथॉल, इंग्लैंड में रहता है। पंजाब से उनका रिश्ता हालांकि कभी टूटा नहीं। परिवार आज भी पंजाब आता-जाता है और रिश्तेदारों से जुड़ा हुआ है। दो वर्ष पहले अर्शदीप अमृतसर और लुधियाना भी आए थे इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अर्शदीप ब्रिटेन पढ़ाई करने के लिए गए थे। उनका परिवार उनके बचपन में ही वहां चला गया था। हां, उच्च शिक्षा उन्होंने ब्रिटेन में ही हासिल की।
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ब्रिस्टल विश्वविद्यालय से गणित और दर्शनशास्त्र की पढ़ाई
अर्शदीप ने यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल से गणित और दर्शनशास्त्र में बीएससी ऑनर्स की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने फरवरी 2022 में अधिकारी प्रशिक्षण पूरा किया। वर्ष 2023 में उन्होंने प्रारंभिक उड़ान प्रशिक्षण पूरा किया। साइप्रस में सेवा देने के बाद 2024 में उन्हें फास्ट जेट प्रशिक्षण के लिए चुना गया। मार्च 2025 में उन्होंने फास्ट जेट लीड-इन ट्रेनिंग शुरू की और जुलाई 2025 में बेसिक फास्ट जेट प्रशिक्षण में पहुंचे।
अक्टूबर 2025 में उन्हें अकेले प्रशिक्षण उड़ान के लिए अमेरिका के टेक्सास भेजा गया। जुलाई 2026 में उन्होंने विंग्स टेस्ट पास किया। हालांकि फाइटर पायलट बनने के बाद भी उनका प्रशिक्षण पूरा नहीं हुआ है। अब उन्हें करीब एक वर्ष का और कठिन प्रशिक्षण लेना होगा, जिसके बाद वे अग्रिम मोर्चे पर फाइटर जेट उड़ाने की जिम्मेदारी संभाल सकेंगे।
‘मैं पहला हूं, लेकिन आखिरी नहीं बनना चाहता’
अर्शदीप अपनी उपलब्धि को केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं मानते। उनका कहना है कि वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं। उन्होंने इच्छा जताई कि वे इस उपलब्धि के बाद पहले सिख तो हैं, लेकिन आखिरी नहीं बनना चाहते। वे चाहते हैं कि उनकी सफलता दूसरे युवाओं को भी बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने की प्रेरणा दे।
ब्रिटेन में भी नहीं छूटी पंजाबी जड़ें
अर्शदीप की कहानी की सबसे खास बात उनकी उपलब्धि जितनी ही उनकी भारतीय-पंजाबी पहचान भी है। उन्होंने बताया कि उनके घर में एक सख्त नियम है—परिवार के सदस्य आपस में पंजाबी में ही बात करते हैं। परिवार गुरुद्वारा जाता है, लंगर की परंपरा से जुड़ा रहता है और सिख मूल्यों को जीवन का हिस्सा मानता है। कठिन उड़ानों के दौरान भी उन्हें पंजाबी भावना ‘चढ़दी कला’ से ताकत मिलती रही।
अर्शदीप की मां गगनदीप कौर को वे अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। उनके मुताबिक, आर्थिक मुश्किलों के दौर में भी मां ने परिवार को संभाले रखा, बच्चों को जमीन से जोड़े रखा और भारत से मिली पंजाबी-सिख विरासत को ब्रिटेन में भी जीवित रखा।
भारतीय विरासत की उड़ान कोई पहली उड़ान नहीं
अर्शदीप की सफलता इतिहास की एक पुरानी कड़ी को भी जोड़ती है। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय मूल के लेफ्टिनेंट इंद्र लाल राय ब्रिटिश सैन्य विमानन में भारत के पहले और एकमात्र ‘फ्लाइंग ऐस’ बने थे और उन्हें 10 हवाई जीत का श्रेय मिला था। सिखों में हार्डिट सिंह मलिक, जिन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ कहा गया, ने भी ब्रिटिश सैन्य विमानन में बाधाएं तोड़ी थीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान स्क्वाड्रन लीडर मोहिंदर सिंह पुज्जी ने आरएएफ में सिख फाइटर पायलट के रूप में सेवा की और बहादुरी के लिए डिस्टिंगुइशेड फ्लाइंग क्रॉस प्राप्त किया।
अर्शदीप अपनी उपलब्धि को केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं मानते। उनका कहना है कि वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं। उन्होंने इच्छा जताई कि वे इस उपलब्धि के बाद पहले सिख तो हैं, लेकिन आखिरी नहीं बनना चाहते। वे चाहते हैं कि उनकी सफलता दूसरे युवाओं को भी बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने की प्रेरणा दे।
ब्रिटेन में भी नहीं छूटी पंजाबी जड़ें
अर्शदीप की कहानी की सबसे खास बात उनकी उपलब्धि जितनी ही उनकी भारतीय-पंजाबी पहचान भी है। उन्होंने बताया कि उनके घर में एक सख्त नियम है—परिवार के सदस्य आपस में पंजाबी में ही बात करते हैं। परिवार गुरुद्वारा जाता है, लंगर की परंपरा से जुड़ा रहता है और सिख मूल्यों को जीवन का हिस्सा मानता है। कठिन उड़ानों के दौरान भी उन्हें पंजाबी भावना ‘चढ़दी कला’ से ताकत मिलती रही।
अर्शदीप की मां गगनदीप कौर को वे अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। उनके मुताबिक, आर्थिक मुश्किलों के दौर में भी मां ने परिवार को संभाले रखा, बच्चों को जमीन से जोड़े रखा और भारत से मिली पंजाबी-सिख विरासत को ब्रिटेन में भी जीवित रखा।
भारतीय विरासत की उड़ान कोई पहली उड़ान नहीं
अर्शदीप की सफलता इतिहास की एक पुरानी कड़ी को भी जोड़ती है। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय मूल के लेफ्टिनेंट इंद्र लाल राय ब्रिटिश सैन्य विमानन में भारत के पहले और एकमात्र ‘फ्लाइंग ऐस’ बने थे और उन्हें 10 हवाई जीत का श्रेय मिला था। सिखों में हार्डिट सिंह मलिक, जिन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ कहा गया, ने भी ब्रिटिश सैन्य विमानन में बाधाएं तोड़ी थीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान स्क्वाड्रन लीडर मोहिंदर सिंह पुज्जी ने आरएएफ में सिख फाइटर पायलट के रूप में सेवा की और बहादुरी के लिए डिस्टिंगुइशेड फ्लाइंग क्रॉस प्राप्त किया।