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पश्चिम एशिया विवाद: निर्यातकों के तमाम समीकरण गड़बड़ाए, समुद्री मार्ग बाधित; भुगतान चक्र टूटा
राजीव शर्मा, संवाद, लुधियाना (पंजाब)
Published by: Nivedita
Updated Tue, 03 Mar 2026 12:02 PM IST
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सार
उद्योग संगठनों का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख बंदरगाहों, विशेषकर जेबल अली पर अभूतपूर्व देरी और भीड़भाड़ की स्थिति है। यह बंदरगाह भारतीय परिधान, धागा और ऑटो कंपोनेंट्स के लिए महत्वपूर्ण री-एक्सपोर्ट और वितरण केंद्र है। समुद्री बीमा कंपनियों द्वारा वार रिस्क प्रीमियम बढ़ाए जाने और जहाजों के रूट बदले जाने से लागत और समय दोनों में भारी वृद्धि हुई है।
ईरान
- फोटो : ANI/File
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विस्तार
अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब भारत के निर्यात आधारित उद्योगों पर साफ दिखाई देने लगा है। विशेषकर पंजाब के एमएसएमई आधारित टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और संबद्ध क्षेत्रों के लिए हालात चिंताजनक हो गए हैं।
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चैंबर ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कॉमर्शियल अंडरटेकिंग्स (सीआईसीयू) ने केंद्र सरकार से आयकर अधिनियम की धारा 43बी (एच) से मध्य-पूर्व देशों को निर्यात करने वाले निर्यातकों को तत्काल छूट देने की मांग उठाई है।
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चैंबर ने वित्त मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय और वस्त्र मंत्रालय को कहा है कि मौजूदा भू-राजनीतिक संकट के कारण शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और भुगतान चक्र बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। ऐसे में 45 दिनों के भीतर घरेलू एमएसएमई आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान की अनिवार्यता व्यावहारिक नहीं रह गई है।
हालिया घटनाक्रम में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई और उसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई से वैश्विक समुद्री व्यापार मार्ग प्रभावित हुए हैं। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मूज जहां से विश्व के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और ऊर्जा आपूर्ति गुजरती है। तनाव का सीधा असर शिपिंग गतिविधियों पर पड़ा है।
उद्योग संगठनों का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख बंदरगाहों, विशेषकर जेबल अली पर अभूतपूर्व देरी और भीड़भाड़ की स्थिति है। यह बंदरगाह भारतीय परिधान, धागा और ऑटो कंपोनेंट्स के लिए महत्वपूर्ण री-एक्सपोर्ट और वितरण केंद्र है। समुद्री बीमा कंपनियों द्वारा वार रिस्क प्रीमियम बढ़ाए जाने और जहाजों के रूट बदले जाने से लागत और समय दोनों में भारी वृद्धि हुई है। चैंबर के अध्यक्ष उपकार सिंह आहूजा ने कहा कि समुद्री मार्गों में बाधा और लॉजिस्टिक अनिश्चितता के चलते आयकर अधिनियम की धारा 43बी (एच) के तहत 45 दिनों में भुगतान की शर्त का पालन करना असंभव हो गया है, जबकि फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) और रिजर्व बैंक के नियमों के तहत निर्यात प्राप्ति की अवधि 15 माह तक हो सकती है।
आहूजा ने कहा कि एक ओर विदेशी मुद्रा कानून निर्यात आय की प्राप्ति के लिए लंबी समयसीमा देता है, वहीं आयकर अधिनियम की धारा 43बी (एच) 45 दिन के बाद किए गए भुगतान को कर कटौती योग्य नहीं मानती। इससे निर्यातकों पर अनावश्यक कर बोझ पड़ता है और नकदी प्रवाह संकट गहरा सकता है। चैंबर ने डायरेक्टर जनरल फॉरेन ट्रेड (डीजीएफटी) सहित संबंधित विभागों के समक्ष भुगतान समयसीमा को फेमा के अनुरूप समायोजित करने तथा मध्य-पूर्व प्रभावित निर्यातकों को धारा 43बी (एच) से स्थायी छूट देने की मांग रखी है।
उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार रेड-सी और पर्शियन गल्फ जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से बचने के लिए कई जहाजों को केप ऑफ गुड होप जैसे लंबे मार्ग से भेजा जा रहा है जिससे ट्रांजिट समय और लागत में भारी बढ़ोतरी हो रही है। इसका सबसे अधिक असर पंजाब के एमएसएमई आधारित टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग क्लस्टरों पर पड़ सकता है, जो पहले ही लागत और प्रतिस्पर्धा के दबाव से जूझ रहे हैं।
तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत
चैंबर के महासचिव हनी सेठी ने कहा कि यदि तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप नहीं हुआ तो एमएसएमई निर्यातकों को गंभीर वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ सकता है जिससे उत्पादन, रोजगार और भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा प्रभावित होगी। उन्होंने केंद्र सरकार से शीघ्र और व्यावहारिक समाधान निकालने की अपील की है ताकि अंतरराष्ट्रीय संकट के बावजूद देश की औद्योगिक वृद्धि बाधित न हो।