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Political News: पंचायत-निकाय चुनाव से पहले बीजेपी का बड़ा दांव: दिव्यांगों को 4% आरक्षण की मांग से सियासत गरम

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Sourabh Bhatt Updated Wed, 01 Apr 2026 05:03 PM IST
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सार

राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव से पहले बीजेपी ने दिव्यांगों को 4% क्षैतिज आरक्षण देने की मांग उठाई है। इसे सामाजिक न्याय के साथ चुनावी रणनीति माना जा रहा है। इस मुद्दे पर सियासी बहस तेज हो गई है।

BJP pushes 4% quota for divyang voters ahead of Rajasthan local polls
पंचायत चुनाव। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

राजस्थान में आगामी पंचायती राज और शहरी निकाय चुनावों से पहले बीजेपी ने एक बड़ा सियासी कार्ड खेल  दिया है। बीजेपी ने पंचायत और शहरी निकाय चुनावों में दिव्यांगों को 4 प्रतिशत क्षतिज आरक्षण दिए जाने की मांग कर इन चुनावों में एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है।  बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ और सतीश पूनियां इस मुद्दे को लेकर सीएम भजनलाल शर्मा को पत्र भी लिख दिया है। दोनों नेताओं ने अपने पत्र में दिव्यांग अधिकार महासंघ के ज्ञापन का हवाला देते हुए पंचायत राज संस्थाओं और शहरी निकायों में दिव्यांगजनों के लिए 4% क्षैतिज आरक्षण लागू करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजन शिक्षा, प्रशासन, खेल और व्यापार जैसे क्षेत्रों में अपनी क्षमता साबित कर चुके हैं, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उनकी भागीदारी बेहद सीमित है।

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क्या है सियासी मायने

राजस्थान में करीब 15.63 लाख दिव्यांगजन हैं, जो स्थानीय चुनावों में एक महत्वपूर्ण मतदाता वर्ग माने जाते हैं। ऐसे में इस पहल को सामाजिक न्याय के साथ-साथ चुनावी रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी इस मुद्दे के जरिए समावेशी राजनीति का संदेश देना चाहती है और अपने जनाधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। प्रस्ताव के अनुसार, यह आरक्षण मौजूदा आरक्षण ढांचे के भीतर ही लागू किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी वर्ग के लिए 100 सीटें आरक्षित हैं, तो उनमें से 4 सीटें उसी वर्ग के दिव्यांगजनों के लिए तय की जा सकती हैं। इससे वर्तमान व्यवस्था प्रभावित हुए बिना प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकता है।

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दिव्यांग अधिकार महासंघ बोला सशक्तिकरण के लिए जरूरी
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि 2009, 2018 और 2021 में भी इस प्रकार की सिफारिशें की गई थीं, लेकिन अब तक उन्हें लागू नहीं किया गया है। ऐसे में राज्य सरकार से जल्द नीतिगत निर्णय लेने की मांग की गई है। दिव्यांग अधिकार महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हेमंत भाई गोयल ने कहा कि दिव्यांगजन हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध कर चुके हैं, लेकिन राजनीतिक भागीदारी के बिना उनका सशक्तिकरण अधूरा है।  उन्होंने कहा कि राजनीतिक भागीदारी एक संवैधानिक अधिकार है और इसके लिए अनुच्छेद 14, 15 और 41 समानता, भेदभाव निषेध और कमजोर वर्गों के लिए राज्य के दायित्व को सुनिश्चित करते हैं।


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राजस्थान में 15.63 लाख दिव्यांग

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 2.68 करोड़ दिव्यांगजन हैं, जबकि राजस्थान में इनकी संख्या करीब 15.63 लाख है। हाल के वर्षों में दिव्यांगता की श्रेणियां 7 से बढ़ाकर 21 कर दी गई हैं, जिससे समावेशन का दायरा भी व्यापक हुआ है। आधिकारिक तौर पर जहां लगभग 3% आबादी दिव्यांग श्रेणी में आती है, वहीं परिवारों को शामिल करने पर इसका सामाजिक प्रभाव करीब 12% आबादी तक पहुंचता है।

गौरतलब है कि 2021 में राजस्थान सरकार ने शहरी निकायों में एक दिव्यांग व्यक्ति को पार्षद के रूप में नामित करने का प्रावधान किया था। हालांकि, संगठनों का मानना है कि केवल नामांकन पर्याप्त नहीं है और वास्तविक राजनीतिक भागीदारी के लिए आरक्षण के माध्यम से निर्वाचित प्रतिनिधित्व जरूरी है।

कांग्रेस बोली-निकायों में हमने किया था प्रावधान

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा कि दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण की दिशा में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने काम किया था और स्थानीय निकायों में नामित पार्षद का प्रावधान किया था। उन्होंने कहा कि इस दिशा में उठाए जाने वाले किसी भी सकारात्मक कदम का स्वागत किया जाएगा।



 
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