पुष्कर का 27वां शक्तिपीठ: जहां गिरी थीं माता सती की कलाइयां, नवरात्रि में उमड़ती है आस्था की भीड़; जानें महत्व
राजस्थान के पुष्कर में स्थित 27वां शक्तिपीठ वह स्थान माना जाता है, जहां माता सती की कलाइयाँ गिरी थीं। चामुंडा रूप में पूजित यह धाम खासकर नवरात्रि में श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है।
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राजस्थान के पवित्र तीर्थराज पुष्कर में स्थित 52 शक्तिपीठों में से एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ को माता सती का 27वां शक्तिपीठ माना जाता है। यह दिव्य स्थल श्री राजराजेश्वरी पुरुहूता मणिवैदिका शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध है, हालांकि स्थानीय श्रद्धालु इसे चामुंडा माता मंदिर के रूप में पूजते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी स्थान पर माता सती की कलाइयाँ (मणिबंध) गिरी थीं, जिससे यह स्थल अत्यंत पवित्र और आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया। यह शक्तिपीठ पुष्कर में नाग पहाड़ी और सावित्री माता की पहाड़ी के बीच स्थित पुरुहूता पर्वत पर माना जाता है।

मंदिर के महंत दिगंबर ओमेंद्र पुरी के अनुसार, जहां सती की कलाइयाँ गिरी थीं, वहां एक गहरा गड्ढा बन गया था। पहाड़ी तक पहुंचना कठिन होने के कारण श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए तलहटी में ही माता की प्रतिमा स्थापित की गई, जहां आज भक्त सरलता से दर्शन कर सकते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में भगवान ब्रह्मा ने पुष्कर में यज्ञ किया था। इस यज्ञ की पूर्णता के लिए भगवान शिव की उपस्थिति आवश्यक थी। यज्ञ में दंपत्ति के रूप में बैठने की परंपरा के चलते भगवान शिव ने इस शक्तिपीठ से माता को स्वरूप प्रदान किया और अपनी अर्धांगिनी के साथ यज्ञ को पूर्ण कराया। इससे इस स्थल का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
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एक अन्य कथा के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव का अपमान हुआ, जिससे आहत होकर माता सती ने यज्ञ वेदी में आत्मदाह कर लिया। इसके बाद भगवान शिव सती के शरीर को लेकर रौद्र रूप में ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए। जहां-जहां ये अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। पुष्कर में सती की कलाइयाँ गिरने से यह स्थान मणिवेदिका या मणिबंध शक्तिपीठ कहलाया।
यह स्थल गायत्री शक्तिपीठ और मणिदेविका मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां दो प्रमुख मूर्तियाँ स्थापित हैं—एक देवी सती की, जिन्हें गायत्री रूप में पूजा जाता है, और दूसरी भगवान शिव की, जिन्हें सर्वानंद कहा जाता है। गायत्री को ज्ञान की देवी सरस्वती का स्वरूप भी माना जाता है, जिससे यह स्थान साधना और आध्यात्मिक साधकों के लिए विशेष महत्व रखता है।
हालांकि सदियों से पुष्कर में लाखों श्रद्धालु आते रहे हैं, लेकिन इस शक्तिपीठ की जानकारी लंबे समय तक सीमित ही रही। स्थानीय लोग माता की पूजा चामुंडा रूप में करते रहे, जिससे यह स्थल अपेक्षित पहचान नहीं पा सका। अब धीरे-धीरे इसके महत्व का प्रचार-प्रसार बढ़ रहा है और श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि हो रही है।

विशेषकर नवरात्रि के दौरान यहां हजारों भक्त पहुंचते हैं और माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। तीर्थराज पुष्कर का यह शक्तिपीठ आस्था, पौराणिकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम है, जो हर श्रद्धालु को अपनी ओर आकर्षित करता है।