Ajmer: पीएम की सभा में ख्वाजा गरीब नवाज का नाम न लेने पर भड़के सैयद सरवर चिश्ती, कहा- उनकी मानसिकता हुई उजागर
Syed Sarwar Chishti Enraged On PM Modi: अजमेर में प्रधानमंत्री की जनसभा के दौरान ख्वाजा गरीब नवाज का नाम न लेने पर सैयद सरवर चिश्ती ने आपत्ति जताई। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री की मानसिकता से जोड़ते हुए परंपरा, ‘सबका साथ, सबका विकास’ और धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में सवाल खड़े किए।
विस्तार
अजमेर की कायड़ विश्राम स्थली पर आयोजित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा के दौरान ख्वाजा गरीब नवाज का नाम नहीं लिए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे पर अजमेर दरगाह के गद्दीनशीन एवं अंजुमन सैयद जादगान के पूर्व सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा ख्वाजा गरीब नवाज का उल्लेख न किया जाना उनकी मानसिकता को दर्शाता है और यह कोई नई बात नहीं है।
उर्स की परंपरा का भी किया उल्लेख
सैयद सरवर चिश्ती ने कहा कि उर्स के अवसर पर इस बार भी जो चादर आई, वह प्रधानमंत्री प्रोटोकॉल के तहत नहीं आई। उन्होंने बताया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय से यह परंपरा चली आ रही थी कि उर्स पर प्रधानमंत्री का संदेश पढ़ा जाता था। उनके अनुसार इस बार न तो प्रधानमंत्री का संदेश पढ़ा गया और न ही ख्वाजा साहब का नाम लिया गया।
दरगाह की प्रतिष्ठा पर नहीं पड़ेगा प्रभाव
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी के नाम लेने या न लेने से ख्वाजा गरीब नवाज की शान और दरगाह की अस्मत में कोई कमी नहीं आती। उन्होंने कहा कि अजमेर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला के नाम से जाना जाता है और पुष्कर तीर्थराज के नाम से प्रसिद्ध है। प्रधानमंत्री द्वारा नाम न लिए जाने को उन्होंने आश्चर्यजनक नहीं बताया और कहा कि पिछले 12 वर्षों से जिस प्रकार की सरकार चल रही है, उससे पूरा देश परिचित है।
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‘सबका साथ, सबका विकास’ पर उठाए सवाल
सैयद सरवर चिश्ती ने कहा कि सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करती है, लेकिन व्यवहार में तस्वीर इसके विपरीत दिखाई देती है। उन्होंने इसे विरोधाभास और पाखंड करार दिया। उनके अनुसार दरगाह की जमीन पर स्थित विश्राम स्थली पर भाषण देना और ख्वाजा गरीब नवाज का जिक्र न करना अपने आप में विचार का विषय है।
‘आइडिया ऑफ इंडिया’ का हवाला
उन्होंने ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह देश गांधी, नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद और सुभाष चंद्र बोस का है और यह ख्वाजा का हिंदुस्तान है। उन्होंने कहा कि जो लोग गोडसे और सावरकर की विचारधारा में विश्वास रखते हैं, उनसे इसी प्रकार की अपेक्षा की जा सकती है।
समर्थकों के लिए भी बताया सोचने का विषय
सैयद सरवर चिश्ती ने अंत में कहा कि यह उन लोगों के लिए भी सोचने का विषय है जो मोदी-मोदी के नारे लगाते हैं। उनके अनुसार एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री द्वारा ख्वाजा गरीब नवाज का नाम तक न लिया जाना क्या संदेश देता है, इस पर विचार किया जाना चाहिए।
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