जयपुर: क्या एफआईआर की लड़ाई में कांग्रेस ने बीजेपी के लिए मैदान खुला छोड़ दिया ? जानिए क्या है 'डबल चैलेंज'
रितु बराला की एफआईआर पर आर-पार का ऐलान करके कांग्रेस ने का दौहरी मुसिबत मौल ले ली है? पंचातय चुनावों के बीच कांग्रेस का धरने में फंसना कहीं बड़ी रणनीतिक चूक तो नहीं? जानिए पीसीसी चीफ डोटासरा के लिए क्या है दौहरी चुनौती...
विस्तार
रितु बराला के मामले में अलग एफआईआर दर्ज कराने की मांग को लेकर जयपुर पुलिस कमिश्नरेट में कांग्रेस का धरना जारी है। प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली समेत कई नेता पुलिस पर दबाव बनाने में जुटे हैं। लेकिन पार्टी के सामने चुनौती सिर्फ एफआईआर दर्ज कराने की नहीं है।
पंचायत चुनावों का कार्यक्रम भी ऐसे मोड़ पर है, जहां टिकट तय करने, नामांकन कराने और स्थानीय समीकरण साधने में एक दिन की देरी भी मुश्किल बढ़ा सकती है। 22 अक्टूबर को जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के पहले चरण का मतदान है, 23 अक्टूबर को तीसरे चरण की 17 जिला परिषदों के लिए नामांकन की अंतिम तारीख है और 24 अक्टूबर को पहले चरण की 3,261 ग्राम पंचायतों में सरपंच-पंच के चुनाव होने हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या कांग्रेस जयपुर के धरने और गांवों के चुनावी मोर्चे को एक साथ संभाल पा रही है? सूत्रों की मानें तो अब कांग्रेस जैसे-तैसे इस उलझन से बाहर निकलने के लिए बीच का रास्ता तलाश रही है।
एफआईआर पर आर-पार, लेकिन चुनावी तारीखें भी करीब
कांग्रेस की मांग है कि रितु बराला की शिकायत पर जयपुर में अलग एफआईआर दर्ज की जाए। पुलिस का कहना है कि 13 अक्टूबर की घटना को लेकर दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में पहले से मामला दर्ज है और रितु बराला की शिकायत को उसी जांच में शामिल किया जा रहा है। कांग्रेस दिल्ली में दर्ज एफआईआर और रितु बराला की शिकायत में अंतर है, इसलिए जयपुर में अलग या जीरो एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। सूत्र यह भी बता रहे हैं कि कांग्रेस बीएनएस की धारा 173(1) की व्याख्या के लिए कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाने पर विचार कर रही है।
जयपुर में एफआईआर की मांग को लेकर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सोमवार शाम से पुलिस कमिश्नरेट में डेरा डाल रखा है। मंगलवार रात पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की हुई। पुलिस ने हल्का बल प्रयोग करने की बात कही, जबकि कांग्रेस ने लाठीचार्ज का आरोप लगाया।
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अगले कुछ दिन में चुनावी मोर्चे पर लगातार हलचल
पंचायत चुनावों के कार्यक्रम पर नजर डालें तो धरने के आसपास की तारीखें कांग्रेस के लिए काफी अहम हैं।
22 अक्टूबर: जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के पहले चरण का मतदान निर्धारित है। इस चरण में 16 जिला परिषदों के चुनाव कार्यक्रम शामिल हैं। पार्टी के लिए यह अपने चुनावी प्रदर्शन और स्थानीय संगठन की ताकत परखने का पहला अहम पड़ाव है।
23 अक्टूबर: तीसरे चरण की 17 जिला परिषदों के लिए नामांकन की अंतिम तारीख है। उम्मीदवारों को दोपहर तीन बजे तक नामांकन पत्र जमा करने हैं। इसी दिन सरपंच और वार्ड पंच के पहले चरण के चुनाव के लिए नामांकन, जांच, नाम वापसी और चुनाव चिह्न आवंटन की प्रक्रिया भी निर्धारित है।
24 अक्टूबर: जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के तीसरे चरण के उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों की जांच होगी। इसी दिन सरपंच और वार्ड पंच के पहले चरण में 16 जिलों की 102 पंचायत समितियों की 3,261 ग्राम पंचायतों में मतदान होगा।
26 अक्टूबर: तीसरे चरण की जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्य सीटों के लिए नाम वापसी और चुनाव चिह्न आवंटन की प्रक्रिया पूरी होगी।
यानी कांग्रेस के लिए यह केवल एक-दो दिनों का राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। एक तरफ तीसरे चरण के उम्मीदवारों के नामांकन और उनकी जांच की प्रक्रिया है, दूसरी तरफ हजारों ग्राम पंचायतों में मतदान की तैयारी है।
दूसरे चरण में भी कम नहीं है चुनावी दबाव
पंच-सरपंच चुनावों का दूसरा चरण 30 अक्टूबर को होगा। इस चरण में 22 जिलों की 122 पंचायत समितियों की 3,589 ग्राम पंचायतों में मतदान निर्धारित है। इसके बाद तीसरे चरण में पांच नवंबर को 27 जिलों की 115 पंचायत समितियों की 3,704 ग्राम पंचायतों और चौथे चरण में 16 नवंबर को 25 जिलों की 115 पंचायत समितियों की 3,726 ग्राम पंचायतों में मतदान होना है।
इस तरह चार चरणों में कुल 14,280 ग्राम पंचायतों में मतदान का कार्यक्रम दिया गया है। यह संख्या आपके उपलब्ध चरणवार आंकड़ों का जोड़ है। जिला परिषद सदस्यों के चुनाव चार चरणों में होंगे। पहले चरण में 16, दूसरे में सात, तीसरे में 17 और चौथे में एक जिला परिषद शामिल है।
इन आंकड़ों से साफ है कि कांग्रेस के लिए चुनावी चुनौती केवल किसी एक तारीख तक सीमित नहीं है। आने वाले दिनों में अलग-अलग जिलों में उम्मीदवारों के चयन, नामांकन, स्थानीय तालमेल और चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी लगातार बढ़ेगी।
जिला पर्यवेक्षक धरने में अटके
कांग्रेस ने पंचायत चुनावों के लिए जिला पर्यवेक्षक नियुक्त किए हैं। इनकी जिम्मेदारी स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल, टिकट के दावेदारों के बीच सहमति और चुनावी रणनीति को आगे बढ़ाने की है। लेकिन सूची में शामिल पर्यवेक्षकों में से बहुत से पर्यवेक्षक जयपुर में धरने पर बैठे हैं। जिन पर्यवेक्षकों को अपने जिलों में चुनावी जिम्मेदारी संभालनी थी वे कमिश्नरेट में मोर्चा संभाल रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रदेश के वरिष्ठ नेता जयपुर में धरने पर बने रहने के साथ जिलों में चुनावी गतिविधियों किस तरह नजर रख पाएंगे ? अगर पर्यवेक्षक अपने क्षेत्रों में सक्रिय हैं और स्थानीय नेतृत्व को जरूरी फैसले लेने की छूट मिली हुई है, तो धरने के बावजूद चुनावी कामकाज जारी रह सकता है। लेकिन अगर टिकट और नामांकन से जुड़े फैसले प्रदेश नेतृत्व की अनुपस्थिति के कारण अटकते हैं, तो पार्टी के सामने मुश्किल बढ़ सकती है।
ये पर्यवेक्षक धरने में शामिल :
रफीक खान: (पर्यवेक्षक- डूंगरपुर और बांसवाड़ा)
डॉ. कृष्णा पूनिया: ( पर्यवेक्षक- नागौर और डीडवाना-कुचामन)
सुखराम विश्नोई : (पर्यवेक्षक- अजमेर)
वैभव गहलोत: (पर्यवेक्षक- अलवर)
अमीन कागजी : (पर्यवेक्षक- दौसा)
शकुंतला रावत: (पर्यवेक्षक- करौली)
प्रताप सिंह खाचरियावास : (पर्यवेक्षक- बारां)
सारिका चौधरी: (पर्यवेक्षक-चूरू)
धर्मेंद्र राठौड़: (पर्यवेक्षक- खैरथल-तिजारा)
सुमित भगासरा: (पर्यवेक्षक-प्रतापगढ़)
BJP के हमले से कांग्रेस पर दोहरा दबाव
धरने को लेकर भाजपा कांग्रेस पर निशाना साध रही है। कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने इसे राजनीतिक दिखावा बताते हुए कहा कि दिल्ली में मामला दर्ज है और जांच चल रही है।
धरने पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता न्याय की मांग से ज्यादा राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में प्रदर्शन कर रहे हैं।
क्या कांग्रेस दो मोर्चों पर संतुलन बना पाएगी?
रितु बराला के मामले में अलग एफआईआर की मांग कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है। लेकिन पंचायत चुनावों में टिकट वितरण, नामांकन और स्थानीय समीकरण भी पार्टी के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। 22 से 26 अक्टूबर के बीच मतदान, नामांकन की अंतिम तारीख, जांच और नाम वापसी जैसे कई अहम पड़ाव हैं।