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Rajasthan: कब-कब आमने-सामने हुए गहलोत और पायलट, इन बिंदुओं में समझें तकरार की कहानी; कैसे डिप्टी CM से हटे थे?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Sabahat Husain Updated Thu, 11 Jun 2026 11:15 AM IST
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सार

Ashok Gehlot-Sachin Pilot Controversy: गहलोत ने पायलट से जुड़े किस मुद्दे को फिर से उठाया? पायलट किस बात को लेकर नाराज रहे? दोनों नेताओं के बीच मतभेद और कड़वाहट की शुरुआत कब हुई? गहलोत के तंज पर पायलट का क्या रुख है? आइए, जानते हैं इस पूरे घटनाक्रम से जुड़ी हर अहम बात।

Rajasthan Politics Crisis Ashok Gehlot Vs Sachin Pilot Dispute Explained in Hindi
अशोक गहलोत और सचिन पायलट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

राजस्थान की राजनीति में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चला आ रहा सियासी टकराव अब भी पूरी तरह खत्म होता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस के भीतर की यह खींचतान समय-समय पर फिर सामने आ जाती है और राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन जाती है। इसी कड़ी में रविवार (7 जून) को अशोक गहलोत के एक बयान ने पुराने विवाद को फिर चर्चा में ला दिया।

गहलोत ने 25 सितंबर 2022 के उस बहुचर्चित घटनाक्रम का उल्लेख किया, जब उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा तेज थी और राजस्थान की कमान सचिन पायलट को सौंपे जाने की संभावनाएं जताई जा रही थीं। उसी दौरान कांग्रेस के कई विधायकों ने बगावती रुख अपनाया था। गहलोत का कहना है कि उस समय विधायकों का विरोध पार्टी हाईकमान के खिलाफ नहीं था, बल्कि उस नेतृत्व परिवर्तन के खिलाफ था, जिसके तहत सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की तैयारी की जा रही थी। ऐसे में सवाल उठता है कि कब-कब गहलोत और पायलट के बीच खींचतान की खबरें सामने आईं।, आइए जानते हैं। 

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कब-कब सामने हुए गहलोत-पायलट?
बात साल 2014 से शुरू होती है। माना जाता है कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच राजनीतिक कड़वाहट के बीज इसी दौर में पड़ने लगे थे। दरअसल, 2014 में सचिन पायलट राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के अध्यक्ष बने। इसके बाद उनके समर्थकों ने उन्हें राजस्थान कांग्रेस का नया भविष्य बताना शुरू कर दिया। स्थिति यह थी कि कई जगहों पर लगने वाले कांग्रेस के पोस्टरों में सचिन पायलट की तस्वीरें प्रमुखता से दिखाई देने लगीं, जबकि अशोक गहलोत की तस्वीरें कई बार नदारद रहने लगीं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यहीं से गहलोत और पायलट के बीच मतभेद और टकराव का दौर शुरू हुआ।

अब इस कड़वाहट के क्रम को बिंदुवार तरीके समझें

  • 2018 कांग्रेस सरकार के गठन के समय मुख्यमंत्री पद के लिए अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों के नाम पर चर्चा हुई। लंबे विचार-विमर्श और गहलोत की वरिष्ठता को देखते हुए कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया, जबकि सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री नियुक्त किया गया।
     
  • राजस्थान विधानसभा चुनाव पायलट के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (पीसीसी) रहते हुए हुए थे। आलाकमान ने उन पर भरोसा जताया और टिकट वितरण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। हालांकि, सरकार गठन के समय अधिकांश विधायकों ने अशोक गहलोत के नाम का समर्थन किया। इसके बाद पायलट और उनके समर्थकों में नाराजगी बढ़ी और कांग्रेस दो खेमों गहलोत और पायलट में बंटती दिखाई दी।
     
  • उपमुख्यमंत्री बनने के बाद सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) वाली इमारत में अपना कार्यालय लेने की इच्छा जताई, लेकिन अशोक गहलोत ने इसकी अनुमति नहीं दी। इसके बजाय पायलट को सचिवालय के मुख्य भवन में पूरा एक फ्लोर आवंटित किया गया। इसके बाद राजस्थान में गहलोत सरकार के सामने भाजपा के अलावा सचिन पायलट के रूप में भी एक राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई।
     
  • सत्ता और संगठन में अपनी भूमिका सीमित होती देख सचिन पायलट ने खुलकर बगावत का रास्ता अपनाया। कोविड-19 महामारी के दौरान वह 30 से अधिक विधायकों के साथ हरियाणा के मानेसर चले गए। इसके बाद राजस्थान में पायलट और उनके समर्थकों के खिलाफ सरकार गिराने की साजिश का मामला दर्ज किया गया। चूंकि हरियाणा में भाजपा की सरकार थी, इसलिए पायलट पर भाजपा से मिलकर सरकार गिराने की कोशिश के आरोप भी लगे।
     
  • समय के साथ मानेसर में पायलट खेमे की एकजुटता कमजोर पड़ने लगी और उनके कई समर्थक वापस राजस्थान लौटकर अशोक गहलोत के खेमे में शामिल हो गए। कुछ विधायकों ने आरोप लगाया कि उन्हें 30-30 करोड़ रुपये के प्रस्ताव दिए गए थे।
     
  • इसके बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ओएसडी द्वारा चर्चित ऑडियो टेप जारी किया गया। इस कथित टेप में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम सामने आया। गहलोत ने आरोप लगाया कि सचिन पायलट ने गजेंद्र सिंह शेखावत और धर्मेंद्र प्रधान के साथ मिलकर उनकी सरकार गिराने की साजिश रची थी। इस पूरे घटनाक्रम के बाद सचिन पायलट पर ‘बागी’ होने का ठप्पा लग गया। उनसे उपमुख्यमंत्री पद के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद भी वापस ले लिया गया। इसके बाद गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई। माना गया कि पायलट आलाकमान का भरोसा खो बैठे।
     
  • कांग्रेस में प्रियंका गांधी का खेमा लगातार सचिन पायलट को आगे बढ़ाने के पक्ष में माना जाता रहा। कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान पार्टी नेतृत्व चाहता था कि अशोक गहलोत राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें और राजस्थान की कमान सचिन पायलट को सौंप दी जाए। इसी मुद्दे पर गहलोत खेमे की नाराजगी खुलकर सामने आई। मल्लिकार्जुन खड़गे और राजस्थान प्रभारी अजय माकन पर्यवेक्षक के रूप में जयपुर पहुंचे, लेकिन गहलोत समर्थक विधायकों ने उनकी योजना को सफल नहीं होने दिया।
     
  • अशोक गहलोत समर्थक विधायकों ने मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन के सामने अलग रुख अपनाया। निर्धारित बैठक में शामिल होने के बजाय करीब 100 विधायक कैबिनेट मंत्री शांति धारीवाल के आवास पर पहुंचे और अलग बैठक की। इसके बाद उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी को अपने इस्तीफे सौंप दिए।
     
  • विधायकों के इस रुख को कांग्रेस आलाकमान के लिए चुनौती माना गया। इसके बाद अशोक गहलोत सोनिया गांधी से माफी मांगने पहुंचे। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, उन्होंने सचिन पायलट से जुड़ी अपनी शिकायतें भी उनके समक्ष रखीं। इससे यह संकेत मिला कि दोनों नेताओं के बीच मतभेद चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
     
  • अक्तूबर 2022 में गहलोत और पायलट गुट का विवाद राजस्थान हाई कोर्ट तक पहुंच गया। एक याचिका में मांग की गई कि राजनीतिक संकट के दौरान पायलट समर्थक 19 विधायकों को भेजे गए अयोग्यता नोटिस पर शीघ्र सुनवाई की जाए। वहीं पायलट समर्थकों का कहना था कि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण इस पर सुनवाई नहीं होनी चाहिए।
     
  • दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच भी विवाद बढ़ता गया। पायलट खेमे के विधायक रामनिवास गावड़िया ने अशोक गहलोत के करीबी धर्मेंद्र राठौड़ पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए उन्हें ‘दलाल’ बताया और कहा कि मुख्यमंत्री ने “जूते-चप्पल उठाने वाले व्यक्ति” को आरटीडीसी का चेयरमैन बना दिया है। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर धर्मेंद्र राठौड़ का नाम नहीं लिया था।
     
  • मानगढ़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अशोक गहलोत की प्रशंसा किए जाने के बाद सचिन पायलट ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि गहलोत दूसरे गुलाम नबी आजाद बनते दिखाई दे रहे हैं। इससे पहले गहलोत पायलट पर भाजपा से निकटता के आरोप लगाते रहे थे, लेकिन इस बार पायलट ने गहलोत पर ही भाजपा के प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया।
     
  • इसके बाद सचिन पायलट ने यह भी कहा कि सितंबर 2022 की कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) बैठक में शामिल नहीं होने वाले विधायकों को नोटिस जारी किए गए हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

तकरार की वो पांच जड़ें जिन्हें आसानी से समझिए
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कड़वाहट का एक और उदाहरण देखने को मिला
गहलोत और पायलट के बीच की दूरियां कम होते नहीं दिखी। इसका ताजा उदाहरण बुधवार यानी 10 जून को देखने को मिला है। करौली में सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट की मूर्ति का अनावरण हो रहा है। यहां किसान सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन के पोस्टर में कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेताओं के चेहरे हैं पर अशोक गहलोत का चेहरा गायब है।  



पोस्टर में और कौन-कौन शामिल था?
सम्मेलन के प्रचार-प्रसार के लिए जारी पोस्टर में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और के.सी. वेणुगोपाल की तस्वीरें प्रमुखता से लगाई गई हैं। इसके अलावा राजस्थान कांग्रेस प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली को भी पोस्टर में स्थान दिया गया है।  

पढ़ें: गहलोत-पायलट अनबन: सचिन पायलट के किसान सम्मेलन से गायब अशोक गहलोत का चेहरा; कांग्रेस की फूट उजागर!

गहलोत के तंज पर पायलट का क्या रुख?
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा कांग्रेस नेता सचिन पायलट पर एक बार फिर निशाना साधे जाने के बीच पायलट के करीबी सूत्रों ने कहा कि उन्होंने इन टिप्पणियों पर चुप्पी साधने का फैसला किया है। इसके बजाय वे नीट पेपर लीक, सीबीएसई विवाद और बढ़ती महंगाई जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर भाजपा को घेरने की रणनीति बना रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, पायलट ने पहले भी गहलोत के हमलों का जवाब नहीं दिया और हमेशा कटु बयानबाजी के बजाय शालीनता को प्राथमिकता दी है। उनका मानना है कि वर्तमान समय में नीट पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं। सूत्रों ने कहा कि पायलट राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार को उसके अधूरे वादों को लेकर घेरने पर ध्यान दे रहे हैं। सरकार को सत्ता में आए ढाई साल से अधिक समय हो चुका है, लेकिन उसके कई वादे अभी तक पूरे नहीं हुए हैं।
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