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Rajasthan News: सरकार ने माउंट आबू, जहाजपुर और कामां के नाम बदले, जानें क्या है इन जगहों की एतिहासिक विरासत?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Himanshu Priyadarshi Updated Sun, 01 Mar 2026 03:35 PM IST
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सार

Rajasthan City Name Change: राजस्थान सरकार ने माउंट आबू, जहाजपुर और कामां के नाम बदलने की घोषणा की है। सरकार इसे एतिहासिक और सांस्कृतिक आधार से जोड़ रही है। इस खबर में जानें इन जगहों का पौराणिक, धार्मिक और मध्यकालीन इतिहास...।

Rajasthan Renames Mount Abu, Jahazpur and Kaman Exploring Their Historical and Cultural Legacy
माउंट आबू, जहाजपुर और कामां का महत्व - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

राजस्थान में भजनलाल शर्मा सरकार ने प्रतीकों की राजनीति की दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए तीन प्रमुख नगरों के नाम बदलने की घोषणा की है। विधानसभा में विनियोग विधेयक पर उत्तर देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि माउंट आबू का नाम ‘आबू राज’, जहाजपुर का ‘यज्ञपुर’ और कामां का ‘कामवन’ किया जाएगा। सरकार के अनुसार यह निर्णय स्थानीय मांग, ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक महत्व को ध्यान में रखकर लिया गया है। इससे पहले भी भजनलाल सरकार में पिछली सरकार की जगहों और कई योजनाओं के नाम बदले जा चुके हैं। इस घोषणा के बाद इन स्थानों के एतिहासिक और सांस्कृतिक आधार को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

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माउंट आबू (अर्बुद पर्वत) का बहुआयामी इतिहास
सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू अरावली पर्वतमाला का सर्वोच्च भाग है। प्राचीन ग्रंथों में इसे अर्बुद पर्वत कहा गया है। स्कन्द पुराण के अर्बुद खंड में इसका उल्लेख मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यह ऋषियों की तपोभूमि रहा है। कथा है कि ऋषि वशिष्ठ ने यहां यज्ञ किया, जिसके अग्निकुंड से प्रतिहार, परमार, सोलंकी और चौहान वंश उत्पन्न हुए और इन्हें अग्निकुल राजपूत कहा गया।
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अचलगढ़ क्षेत्र में स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर को भी पवित्र माना जाता है। मध्यकाल में यह क्षेत्र परमार वंश और बाद में देवड़ा चौहानों के अधीन रहा। महाराणा कुम्भा ने अचलगढ़ किला का पुनर्निर्माण कराया, जिससे इसका सामरिक महत्व बढ़ा।


 
माउंट आबू जैन स्थापत्य कला के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच निर्मित हुए। 1031 ईस्वी में विमल शाह द्वारा निर्मित विमल वसाही मंदिर और 1230 ईस्वी में वास्तुपाल-तेजपाल द्वारा निर्मित लूण वसाही मंदिर अपनी संगमरमर नक्काशी के लिए विश्वप्रसिद्ध हैं। औपनिवेशिक काल में इसकी जलवायु के कारण अंग्रेजों ने इसे राजपूताना एजेंसी का मुख्यालय बनाया और इसे स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित किया।

पढ़ें- Rajasthan Politics: नाम बदले, क्या बदलेगी तस्वीर; राजस्थान में नाम बदलने की सियासत के पीछे मायने क्या?
 
जहाजपुर (यज्ञपुर) की प्राचीन और मध्यकालीन विरासत
भीलवाड़ा जिले में स्थित जहाजपुर का संबंध भी प्राचीन धार्मिक परंपराओं से जोड़ा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इसका प्राचीन नाम यज्ञपुर या यज्ञपुरी माना जाता है। पौराणिक परंपरा के अनुसार राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की तक्षक नाग द्वारा मृत्यु के प्रतिशोध में यहां सर्पसत्र यज्ञ कराया था, जिससे इसका नाम यज्ञपुर पड़ा। समय के साथ यह नाम अपभ्रंश होकर जहाजपुर प्रचलित हुआ।
 
मध्यकाल में जहाजपुर मेवाड़ राज्य का एक महत्वपूर्ण दुर्ग-नगर बना। यहां का किला ऊंची पहाड़ी पर स्थित है और दूर से देखने पर विशाल जहाज जैसा प्रतीत होता है, जिससे इसके वर्तमान नाम की व्याख्या भी की जाती है। राणा कुम्भा के शासनकाल में इस दुर्ग का महत्व बढ़ा।



क्षेत्र में जैन, वैष्णव और शैव परंपराओं के मंदिर मिलते हैं, जो इसकी सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं। मुगल और मराठा काल में यह क्षेत्र राजनीतिक परिवर्तन का केंद्र रहा, जबकि ब्रिटिश काल में यह मेवाड़ रियासत का हिस्सा था। स्वतंत्रता के बाद यह भीलवाड़ा जिले में सम्मिलित हो गया।


 
कामां (कामवन) का पौराणिक और सांस्कृतिक आधार
भरतपुर जिले में स्थित कामां को प्राचीन काल में कामवन या काम्यवन कहा जाता था। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह ब्रज मंडल के द्वादश वनों में से एक माना जाता है। भागवत पुराण और स्कन्द पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि यह क्षेत्र भगवान कृष्ण की बाल और किशोर लीलाओं से जुड़ा रहा है, जिसका वर्णन ब्रज साहित्य और पुराणों में मिलता है।
 
ब्रज संस्कृति में कामवन का विशेष महत्व है। यहां स्थित विमल कुंड को अत्यंत पवित्र माना जाता है और श्रद्धालु इसकी परिक्रमा करते हैं। क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिर और धार्मिक स्थल मौजूद हैं, जो कृष्ण भक्ति परंपरा से जुड़े हैं।



इतिहासकारों के अनुसार यह स्थान वैष्णव धर्म और कृष्ण भक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। मध्यकाल में संत चैतन्य महाप्रभु की ब्रज यात्रा में भी कामवन का उल्लेख मिलता है, जिससे इसके धार्मिक महत्व की पुष्टि होती है। यहां की स्थापत्य शैली में ब्रज और राजस्थानी कला का समन्वय दिखाई देता है।
 
इतिहास और वर्तमान के बीच संतुलन की बहस
राज्य सरकार का कहना है कि इन नाम परिवर्तनों का उद्देश्य प्राचीन पहचान को पुनर्जीवित करना है। दूसरी ओर, इस निर्णय पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। नाम परिवर्तन के साथ इन स्थानों के एतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों को लेकर बहस जारी है। यह जानकारी प्रोफेसर एवं इतिहासकार डॉ. वेद प्रकाश शर्मा द्वारा उपलब्ध कराई गई है।
 

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