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Rajasthan News: आधे बच्चे 12वीं तक नहीं पहुंच रहे; UDISE रिपोर्ट ने खोली शिक्षा व्यवस्था की चुनौती
Fri, 10 Jul 2026 02:52 PM IST
Sourabh Bhatt
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: Sourabh Bhatt
Updated Fri, 10 Jul 2026 02:52 PM IST
सार
UDISE 2025-26 रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले हर 100 में सिर्फ 52 छात्र 12वीं तक पहुंचते हैं। बेहतर सुविधाओं के बावजूद ड्रॉपआउट और घटता नामांकन चिंता का विषय है।
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स्कूल भवन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राजस्थान में स्कूलों में बिजली, पेयजल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन विद्यार्थियों को प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक स्कूल में बनाए रखना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। UDISE 2025-26 रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा-1 में प्रवेश लेने वाले प्रत्येक 100 बच्चों में से केवल 51.8 छात्र ही कक्षा-12 तक पहुंच पाते हैं, जबकि 48.2 प्रतिशत बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती कक्षाओं में बच्चों के स्कूल में बने रहने की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। कक्षा 1-2 के स्तर पर रिटेंशन रेट 93.2 प्रतिशत, कक्षा 3-5 में 82.5 प्रतिशत और कक्षा 6-8 में 77 प्रतिशत है। लेकिन माध्यमिक स्तर (कक्षा 9 से 12) में यह दर घटकर 51.8 प्रतिशत रह जाती है, जो सबसे बड़ी चिंता का विषय है।
यह भी पढें- Jaipur: 'शिक्षिका से मदद मांगती रही मासूम...पर नहीं सुनी बात'; अमायरा केस का नया फुटेज देख रो पड़े माता-पिता
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सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन पढ़ाई जारी रखना चुनौती
रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है। राज्य के 99.2 प्रतिशत स्कूलों में पेयजल, 92.24 प्रतिशत में बिजली और 94.2 प्रतिशत में छात्राओं के लिए शौचालय उपलब्ध हैं। इसके बावजूद सीखने की गुणवत्ता और विद्यार्थियों की निरंतरता (Retention) में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है।
दो साल में 8.4 लाख कम हुए विद्यार्थी
UDISE रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में कुल छात्र नामांकन भी लगातार घट रहा है। वर्ष 2023-24 में 1.67 करोड़ विद्यार्थी स्कूलों में नामांकित थे, जो 2024-25 में 1.63 करोड़ और 2025-26 में घटकर 1.59 करोड़ रह गए। यानी दो वर्षों में करीब 8.4 लाख विद्यार्थियों की कमी दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में 47.56 प्रतिशत विद्यार्थी सरकारी स्कूलों और 51.65 प्रतिशत निजी स्कूलों में अध्ययन कर रहे हैं। सरकारी स्कूलों में 74.5 लाख, जबकि निजी स्कूलों में 83.8 लाख छात्र-छात्राएं नामांकित हैं।
विशेषज्ञों ने बताए कई कारण
शिक्षाविद कुलभूषण कोठारी का कहना है कि विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ने का सबसे बड़ा कारण सरकारी स्कूलों में सीखने की गुणवत्ता का कमजोर होना है। उनके अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के कई अभिभावक सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का अपेक्षित लाभ नहीं देख पाते और बच्चों को रोजगार या अन्य कार्यों में लगा देते हैं। उन्होंने कहा कि ASER रिपोर्ट भी लगातार बुनियादी पढ़ने और गणितीय क्षमता में कमी की ओर संकेत करती रही है।
कोठारी का मानना है कि आज कई विद्यार्थी पारंपरिक स्कूली शिक्षा के बजाय कौशल आधारित और रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों की ओर भी बढ़ रहे हैं। इसलिए शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम को रोजगार से जोड़ने की जरूरत है।
वहीं शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता विजय गोयल का कहना है कि सरकारी शिक्षा से निजी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान भी नामांकन और रिटेंशन पर असर डाल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च कक्षाओं के स्कूलों की दूरी, छात्राओं की सुरक्षा, कम उम्र में विवाह, पलायन और आर्थिक कारण भी ड्रॉपआउट की बड़ी वजह हैं। लड़कों के मामले में रोजगार और परिवार की आय बढ़ाने का दबाव भी पढ़ाई छूटने का कारण बनता है।
NEP के लक्ष्य अभी दूर
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) में सीखने के परिणाम और विद्यार्थियों की निरंतरता बढ़ाने पर जोर दिया गया है, लेकिन UDISE रिपोर्ट संकेत देती है कि राजस्थान में स्कूलों का बुनियादी ढांचा तो मजबूत हुआ है, मगर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बच्चों को 12वीं तक स्कूल में बनाए रखने की चुनौती अभी भी बरकरार है।
रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती कक्षाओं में बच्चों के स्कूल में बने रहने की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। कक्षा 1-2 के स्तर पर रिटेंशन रेट 93.2 प्रतिशत, कक्षा 3-5 में 82.5 प्रतिशत और कक्षा 6-8 में 77 प्रतिशत है। लेकिन माध्यमिक स्तर (कक्षा 9 से 12) में यह दर घटकर 51.8 प्रतिशत रह जाती है, जो सबसे बड़ी चिंता का विषय है।
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सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन पढ़ाई जारी रखना चुनौती
रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है। राज्य के 99.2 प्रतिशत स्कूलों में पेयजल, 92.24 प्रतिशत में बिजली और 94.2 प्रतिशत में छात्राओं के लिए शौचालय उपलब्ध हैं। इसके बावजूद सीखने की गुणवत्ता और विद्यार्थियों की निरंतरता (Retention) में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है।
दो साल में 8.4 लाख कम हुए विद्यार्थी
UDISE रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में कुल छात्र नामांकन भी लगातार घट रहा है। वर्ष 2023-24 में 1.67 करोड़ विद्यार्थी स्कूलों में नामांकित थे, जो 2024-25 में 1.63 करोड़ और 2025-26 में घटकर 1.59 करोड़ रह गए। यानी दो वर्षों में करीब 8.4 लाख विद्यार्थियों की कमी दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में 47.56 प्रतिशत विद्यार्थी सरकारी स्कूलों और 51.65 प्रतिशत निजी स्कूलों में अध्ययन कर रहे हैं। सरकारी स्कूलों में 74.5 लाख, जबकि निजी स्कूलों में 83.8 लाख छात्र-छात्राएं नामांकित हैं।
विशेषज्ञों ने बताए कई कारण
शिक्षाविद कुलभूषण कोठारी का कहना है कि विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ने का सबसे बड़ा कारण सरकारी स्कूलों में सीखने की गुणवत्ता का कमजोर होना है। उनके अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के कई अभिभावक सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का अपेक्षित लाभ नहीं देख पाते और बच्चों को रोजगार या अन्य कार्यों में लगा देते हैं। उन्होंने कहा कि ASER रिपोर्ट भी लगातार बुनियादी पढ़ने और गणितीय क्षमता में कमी की ओर संकेत करती रही है।
कोठारी का मानना है कि आज कई विद्यार्थी पारंपरिक स्कूली शिक्षा के बजाय कौशल आधारित और रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों की ओर भी बढ़ रहे हैं। इसलिए शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम को रोजगार से जोड़ने की जरूरत है।
वहीं शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता विजय गोयल का कहना है कि सरकारी शिक्षा से निजी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान भी नामांकन और रिटेंशन पर असर डाल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च कक्षाओं के स्कूलों की दूरी, छात्राओं की सुरक्षा, कम उम्र में विवाह, पलायन और आर्थिक कारण भी ड्रॉपआउट की बड़ी वजह हैं। लड़कों के मामले में रोजगार और परिवार की आय बढ़ाने का दबाव भी पढ़ाई छूटने का कारण बनता है।
NEP के लक्ष्य अभी दूर
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) में सीखने के परिणाम और विद्यार्थियों की निरंतरता बढ़ाने पर जोर दिया गया है, लेकिन UDISE रिपोर्ट संकेत देती है कि राजस्थान में स्कूलों का बुनियादी ढांचा तो मजबूत हुआ है, मगर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बच्चों को 12वीं तक स्कूल में बनाए रखने की चुनौती अभी भी बरकरार है।