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राजस्थान में 3 सीटों राज्यसभा चुनाव का ऐलान: क्या राजनीति एक बार फिर “बाड़ाबंदी” की तरफ बढ़ेगी?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Sourabh Bhatt Updated Fri, 22 May 2026 11:29 AM IST
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सार

राजस्थान की तीन राज्यसभा सीटों के चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज है। भाजपा दो और कांग्रेस एक सीट जीतने की स्थिति में है, लेकिन बीजेपी तीसरा उम्मीदवार उतारने के विकल्प पर भी मंथन कर रही है। इससे क्रॉस वोटिंग और बाड़ाबंदी की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

Will BJP Field a Third Candidate in Rajasthan Rajya Sabha Polls?
राजस्थान विधानसभा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

राजस्थान की तीन राज्यसभा सीटों पर चुनाव की घोषणा के साथ ही प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार 18 जून को मतदान होगा और उसी दिन परिणाम भी घोषित किए जाएंगे। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू, भाजपा सांसद राजेंद्र गहलोत और कांग्रेस सांसद नीरज डांगी का कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है।

 

मौजूदा विधानसभा गणित को देखें तो भाजपा दो और कांग्रेस एक सीट आसानी से जीतती नजर आ रही है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या भाजपा रणनीतिक तौर पर तीसरा उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बनाएगी या फिर चुनाव निर्विरोध होंगे।

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संख्या बल साफ, लेकिन राजनीति में संभावनाएं बाकी

200 सदस्यीय राजस्थान विधानसभा में भाजपा के पास 118 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास 67 विधायक हैं। इसके अलावा 8 निर्दलीय, 4 भारत आदिवासी पार्टी (BAP), 2 बसपा और 1 आरएलडी विधायक हैं।

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राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 51 प्रथम वरीयता वोटों की आवश्यकता है। इस हिसाब से भाजपा के पास दो सीटें जीतने के लिए पर्याप्त 102 से ज्यादा वोट मौजूद हैं, जबकि कांग्रेस के पास एक सीट निकालने लायक संख्या है।

ऐसे में यदि भाजपा केवल दो उम्मीदवार उतारती है और कांग्रेस एक, तो चुनाव निर्विरोध हो सकते हैं। लेकिन राजस्थान की राजनीति में राज्यसभा चुनाव अक्सर केवल अंकगणित नहीं, बल्कि रणनीति और सियासी संदेश का मंच भी बन जाते हैं।

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क्या बीजेपी उतारेगी तीसरा उम्मीदवार?

भाजपा के भीतर इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि क्या तीसरी सीट पर भी उम्मीदवार उतारा जाए। चर्चा है कि पार्टी किसी उद्योगपति, समाजसेवी या विचार परिवार से जुड़े चेहरे को “थर्ड फैक्टर” के रूप में मैदान में उतार सकती है।

हालांकि पार्टी यह जोखिम तभी ले सकती है जब उसे विपक्षी खेमे में क्रॉस वोटिंग या फूट की संभावना नजर आए। भाजपा “अंतरात्मा फैक्टर” पर भी नजर बनाए हुए है। यानी यदि कुछ विधायक पार्टी लाइन से हटकर मतदान करते हैं तो मुकाबला रोचक हो सकता है।

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने भी हाल ही में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा था कि पार्टी विरोधियों को समर्थक और समर्थकों को कार्यकर्ता बनाने की नीति पर काम कर रही है। राजनीतिक विश्लेषक इसे विपक्ष में संभावित सेंधमारी के संकेत के रूप में भी देख रहे हैं।

फिर लौट सकती है ‘बाड़ाबंदी’ की राजनीति

राजस्थान में राज्यसभा चुनावों के साथ “रिसॉर्ट पॉलिटिक्स” और “बाड़ाबंदी” की यादें भी जुड़ी रही हैं। 2020 और 2022 के चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपने विधायकों को होटल और रिसॉर्ट में ठहराया था, ताकि क्रॉस वोटिंग की संभावना रोकी जा सके।

फिलहाल संख्या बल स्पष्ट होने से खुली बाड़ाबंदी की संभावना कम मानी जा रही है, लेकिन यदि भाजपा तीसरा उम्मीदवार उतारती है या कांग्रेस कोई रणनीतिक चाल चलती है, तो निर्दलीय और छोटे दलों के विधायक अचानक बेहद अहम हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में एक बार फिर रिसॉर्ट राजनीति लौट सकती है।

बीजेपी की नजर सामाजिक समीकरणों पर

भाजपा इस चुनाव को केवल सीट जीतने तक सीमित नहीं रखना चाहती। पार्टी सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने के लिहाज से उम्मीदवार चयन पर विशेष ध्यान दे रही है। माना जा रहा है कि पार्टी एक सीट पर मूल ओबीसी चेहरे को मौका दे सकती है। वहीं केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को दोबारा राज्यसभा भेजे जाने की भी चर्चा है।

विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा आगामी निकाय और पंचायत चुनावों के साथ 2028 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश करेगी।

कांग्रेस में भी दावेदारों की लंबी सूची

कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार चयन पर अंतिम फैसला दिल्ली स्तर पर होना है। पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेताओं और संगठन से जुड़े नाम चर्चा में हैं। कांग्रेस के सामने केवल सीट जीतने की चुनौती नहीं, बल्कि राज्य और केंद्रीय नेतृत्व के बीच संतुलन बनाए रखने की भी जिम्मेदारी है।

सियासी संदेश ज्यादा अहम

संख्या बल के हिसाब से यह चुनाव भले आसान दिखाई दे रहा हो, लेकिन राजस्थान की राजनीति में राज्यसभा चुनाव अक्सर शक्ति प्रदर्शन और रणनीतिक संदेश का मंच बन जाते हैं। यदि चुनाव निर्विरोध होते हैं तो इसे राजनीतिक परिपक्वता माना जाएगा। वहीं मुकाबला होने की स्थिति में क्रॉस वोटिंग, बाड़ाबंदी और रणनीतिक बैठकों की राजनीति फिर सुर्खियों में आ सकती है।

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